राज्य
15-Apr-2026


भोपाल(ईएमएस)। कभी खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रही बालाघाट की सुलोचना परिहार के जीवन में अचानक ऐसा दौर आया, जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। कोरोना महामारी के दौरान पति के निधन ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। एक ओर जीवनसाथी का बिछोह और दूसरी ओर परिवार की जिम्मेदारी—ऐसे कठिन समय में कई लोग टूट जाते हैं, लेकिन सुलोचना ने हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। सुलोचना परिहार पहले अपने पति के साथ साधारण लेकिन संतोषपूर्ण जीवन जी रही थीं। पति छोटा व्यवसाय करते थे और सुलोचना सिलाई का काम कर परिवार की आय में सहयोग देती थीं। लेकिन कोविड काल में पति के निधन के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। बेटे की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की चिंता—सब कुछ एक साथ सामने मुसीबत बन कर खड़ी हो गई थी। ऐसे हालात में सुलोचना का हुनर ही उनका सबसे बड़ा सहारा बना। उन्होंने अपने सिलाई के काम को ही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और बालाघाट की मार्डीकर गली वार्ड नंबर -22 में श्रद्धा बुटिक के नाम से एक बुटिक की शुरुआत की। धीरे-धीरे उनका यह छोटा प्रयास एक सफल उद्यम में बदल गया। आज उनके बुटिक में 11 जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। सुलोचना सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को भी संवारने का काम कर रही हैं। उनके बुटिक में काम करने वाली महिलाएं गरीब परिवारों से आती हैं। सुलोचना उन्हें 40 प्रतिशत कमीशन देती हैं, जिससे उनकी आय भी सम्मानजनक बनती है। अपनी मेहनत से ये घर एवं बच्चों की पढ़ाई का खर्च और मकान का किराया दे रही हैं। सुलोचना बताती हैं कि उन्होंने जीवन की कठिनाइयों को बहुत करीब से देखा है, इसलिए वह अपने साथ काम करने वाली महिलाओं की जरूरतों और संघर्ष को समझती हैं। यही संवेदनशीलता उन्हें एक सफल उद्यमी के साथ एक सशक्त और मानवीय व्यक्तित्व बनाती है। सुलोचना परिहार अपने बुटिक से हर माह लगभग 50 से 60 हजार रुपए की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं। वह ब्लाउज, लहंगा, सलवार सूट, फ्रॉक और डिजाइनर ड्रेस तैयार कर अपनी पहचान बना चुकी हैं। उन्होंने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर के साथ पीजीडीसीए की पढ़ाई भी की है। अपने बेटे की शिक्षा को लेकर भी सुलोचना बेहद सजग हैं। उनका बेटा एमसीए की पढ़ाई कर रहा है। श्रद्धा का सपना खुद पीएचडी करने का है, और उनका बेटा भी उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ाने का संकल्प ले चुका है। सुलोचना कहती हैं कि उन्हें कोविड के दौरान पति के निधन पर मिली शासन से सहायता ने कठिन समय में थोड़ी राहत दी। सुलोचना परिहार की यह कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि हिम्मत, आत्मविश्वास और दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो जिंदगी को फिर से संवारना संभव है। हरि प्रसाद पाल / 15 अप्रैल, 2026