यह पुस्तक डॉ शिव गोपाल मिश्र जाने माने हिंदी विज्ञान के पुरोधा व विज्ञान के संपादकडॉ शिव गोपाल मिश्र के 75 वें जन्मदिन पर प्रकाशित किया गया लेकिन कुछ समय पहले डॉ शिवगोपाल मिश्र का आकस्मिक निधन 24 मार्च को ही हो गया वे विज्ञान परिषद जो 1913 में स्थापित की गईं उसके प्रधानमंत्री थे भारत की एक ऐतिहासिक संस्था है, जिसकी स्थापना 1913 में प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य का सृजन करना और समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार करना है। यह संस्था हिंदी में विज्ञान लेखन को बढ़ावा देने के लिए जानी जाती है।आज उनके ना रहने से विज्ञान प्रेमी के दिल में दर्द है वो शख्स जिसने विज्ञान परिषद को एक नए मोकाम तक ले गए दरअसल मैं विज्ञान परिषद से 2002 से विज्ञान पत्रिका के माध्यम से जुड़ा और उस समय पत्रिका लाइब्रेरी में देखा तभी हमने एक विज्ञान समाचार भेजा और उस समय वे विज्ञान पत्रिका के संपादक भी थे उनका उदार व्यक्तितव उनके लेटर से झलका और उन्होंने अगले अंक में उसके मुख्य अंश को प्रकाशित करने का निर्णय लिया और प्रकाशित किया और पहली बार विज्ञान में मेरा लेख छपा और पत्रिका भी प्राप्त हुई उसके बाद पृथ्वी की आतंरिक संरचना- एक वैज्ञानिक पहेली पर लेख लिखा और छपा उसके बाद सौर ऊर्जा, अल्ट्रासाउंड, मेम्स, इलेक्ट्रॉनिक, और पुस्तक समीक्षा भी छपी 2003 में मुझे 150 रूपये दो लेख का मिला उस समय सभी पत्रिका से मानदेय अच्छा था,2002 से लेकर 2009 तक हर साल कमसे कम 5-6 लेख छपते रहे और 2009 में विज्ञान में सर्वश्रेष्ठ लेख हेतु डॉ गोरखप्रसाद विज्ञान लेखन पुरस्कार मिला जिससे लगा हिंदी विज्ञान में एक उभरते हुए लेखक का सम्मान जैसा लगा हर साल सभी लेखों का मानदेय भी 400-500 रूपये मिल जाता 2013 तक कई लेख और पुस्तक समीक्षा भी छपी इसी दौरान 2009 में मेरा एक एक्सीडेंट हो गया संयोग से उन्होंने मेरे मोबाइल पर फोन किया मैंने पूछा न कैसे मिला तो उन्होंने कहा विज्ञान प्रगति में एक लेख छपा था उसी में आपका लेख पढ़ा और मोबाइल न मिला यानि वो विज्ञान लेखकों का काफी ख्याल रखते थे और लेखों के प्रकाशन में पूर्व कार्यकारी सचिव स्व देवब्रत द्वीवेदी जी भी अच्छा साथ देते थे व जानकारी देते और उन्होंने ही मुझे 2013 में विज्ञानं परिषद के शताब्दी समारोह में सम्मान उस समय के राज्यपाल डॉ शेखर दत्त के हाथों दिलवाया सचमुच विज्ञान लेखकों के प्रति उनका यह प्यार निश्चित रूप से सभी विज्ञान पत्रिका के संपादको हेतु एक प्रेरणादायक होगा । 1956 में वे विज्ञान परिषद से जुड़े और विज्ञान पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य बने। 1958 में जब विज्ञान परिषद् प्रयाग द्वारा देश की प्रथम हिन्दी शोध पत्रिका विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया तो उसके संपादक डा० सत्यप्रकाश जी ने डा० शिवगोपाल मिश्र को इस पत्रिका का प्रबंध संपादक नियुक्त किया गया । इन्होने ही मुझे विज्ञान लेखन की प्रेरणा दि और परिषद के सतना संगोष्ठी 2011 में मुख्य अथिति के रूप में आए वैज्ञानिक पत्रिका के अगले अंक में इनकी स्मृति कार्य और कुछ यादें को समठते हुए कुछ पेज डालेंगे इन्होने कई पुस्तक भी लिखी डॉ शिवगोपाल मिश्र जी को वैज्ञानिक पत्रिका से काफी लगाव था आदमी को संसार से जाना ही पड़ता है लेकिन क़ोई अंदर की दुनिया को सत्य मानता हैं क़ोई बाहर की मिथ्या को सत्य मानता है जो नश्वर है ऐसा उन्होंने बताया था इसलिए वो अध्यात्मिक भी थे दुःख तो है लेकिन यही जीवन का सत्य है जो भगवान राम है आपके अंदर है आज हिंदी में विज्ञान लेखन के प्रमुख स्तंभ डॉ. शिव गोपाल मिश्र का निधन विज्ञान जगत में में एक अभूतपूर्व क्षति है । हिंदी में विज्ञान लेखन को वैश्विक पहचान देने वाले विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री डॉ. मिश्र ने हिंदी में विज्ञान लेखन की नई पीढ़ी का मार्गदर्शन किया।पहले वे एलाहबाद यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रोफेसर रहे व बाद में विज्ञान परिषद में प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया,उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। डॉ. भगवान प्रसाद पांडेय ने कहा कि डॉ. मिश्र ने विज्ञान परिषद को जो ऊंचाई प्रदान की वह स्मरणीय है। वे शिक्षाविद्, कृषि वैज्ञानिक व महान हिंदी सेवी थे।93 वर्ष तक वो इस दुनिया में रहे लेकिन उनका लम्बा समय में उन्होंने हिंदी विज्ञान की दिशा ही जो प्रेरणास्रोत है ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हूँ। 1956 में आप विज्ञान परिषद से जुड़े और विज्ञान पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य बने। 1958 में जब विज्ञान परिषद् प्रयाग द्वारा देश की प्रथम हिन्दी शोध पत्रिका विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया तो उसके संपादक डा० सत्यप्रकाश जी ने डा० शिवगोपाल मिश्र को इस पत्रिका का प्रबंध संपादक नियुक्त किया।1977 में आपने विज्ञान परिषद् के प्रधानमंत्री का पद संभाला और 1987 तक आपने विज्ञान परिषद् की गतिविधियों का संचालन किया। 1996 में आप एक बार पुनः विज्ञान परिषद् के प्रधानमंत्री बनाए गये और पिछले वर्षों में आपके नेतृत्व में विज्ञान परिषद् ने अनेक उपलब्धियां प्राप्त की हैं। वर्ष 2000 से वें विज्ञान पत्रिका के संपादन का कार्य भी निरंतर संभाले हुए अब तक अपने अंतिम समय भी विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री रहें, निश्चित रूप से नवीन विज्ञान लेखकों के विज्ञान गुरू डॉ शिवगोपाल मिश्र ने हिंदी विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया जिसे लोग सदियों तक याद करेंगे। .../ 16 अप्रैल /2026