विशेष संसद सत्र में तीखी बहस-महिला आरक्षण बनाम परिसीमन- विपक्ष क़ो महिला आरक्षण क़ा विरोध नहीं परिसीमन के साथ जोड़ने का विरोध? विपक्ष को परिसीमन के बाद संसद में सत्ता संतुलन और अधिक एकतरफा होने की आशंका छाई- सियासी लड़ाई उत्तर बनाम दक्षिण पर आई-पुरे विश्व नें नज़रें लगाई वैश्विक स्तरपर भारत की संसदीय राजनीति एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है,जहाँ एक ओर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक प्रयास दिखाई देता है,वहीं दूसरी ओर परिसीमन (डेलिमिटेशन) के माध्यम से राजनीतिक शक्ति संतुलन में संभावित बदलाव ने व्यापक विवाद को जन्म दिया है। संसद के विशेष सत्र में पेश किए गए तीन प्रमुख विधेयक (1) महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक संशोधन बिल 2026 (2) परिसीमन (डेलिमिटेशन) बिल2026 (3) केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े कानूनों में संशोधन बिल 2026 जहां कानून मंत्री ने संवैधानिक संशोधन और परिसीमन बिल पेश किए, वहीं केंद्रीय गृहमंत्री ने केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ासटीक संशोधन विधेयक पेश किया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक संशोधन,परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े संशोधन ने न केवल राजनीतिक बहस को तेज किया है,बल्कि देश के संघीय ढांचे, प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर गहरे सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यह मुद्दा अब केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर बनाम दक्षिण,जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व और सत्ता बनाम संतुलन की बहस में बदल चुका है। 16 अप्रैल 2026 को विशेष संसद सत्र के पहले दिन सरकार द्वारा पेश किए गए तीनविधेयकों में सबसे अधिक ध्यान महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर केंद्रित रहा। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के तहत लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया है,जिसमें 815 सीटें राज्यों और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की गई हैं। इसके साथ ही लगभग 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। तीनों बिलों को संसद में पेश करने के लिए ध्वनि मत से रखने के लिए विपक्ष तैयार नहीं हुआ इसलिए वोटिंग करानी पड़ी वोटिंग के दौरान सरकार को 251 सांसदों का समर्थन मिला,जबकि 185 सांसदों ने विरोध किया। यह स्पष्ट संकेत है कि संसद में यह मुद्दा केवल नीतिगत नहीं बल्कि गहराई से राजनीतिक और क्षेत्रीय विभाजन का विषय बन चुका है। ध्वनि मत के बजाय डिवीजन की मांग ने इस विवाद को और अधिक औपचारिक और गंभीर बना दिया। साथियों बात अगर हम महिला आरक्षण बनाम परिसीमन असली विवाद कहाँ है? इसको समझने की करें तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा,बल्कि उसका मुख्य विरोध इस बात से है कि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़ा गया है। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जाना चाहिए,न कि इसे जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़कर टाल दिया जाए दरअसल 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए यह आवश्यक शर्त रखी गई थी कि पहले नई जनगणना होगी और उसके बाद परिसीमन के जरिए नई सीटों का निर्धारण किया जाएगा। यहीं से विवाद की जड़ शुरू होती है। विपक्ष इसे एक डिले टैक्टिक यानी देरी करने की रणनीति मानता है,जबकि सरकार इसे संरचनात्मक सुधार का महत्वपूर्ण तथा आवश्यक हिस्सा बताती है। साथियों बात अगर हम विशेष रूप से परिसीमन का गणित: जनसंख्या आधारितप्रतिनिधित्व का सवाल इसको समझने की करें तो, परिसीमन का मूल उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होता है। लेकिन भारत में 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का निर्धारण लंबे समय तक स्थिर रखा गया, ताकि परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाले राज्यों को नुकसान न हो। 1976 में यह तय किया गया कि 2026 तक परिसीमन नहीं होगा। अब जब 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है,तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्याजनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाएगा? यदि ऐसा होता है,तो उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्य प्रदेश को अधिक सीटें मिलेंगी,जबकि दक्षिण भारत के अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों जैसे तमिलनाडु,केरल, कर्नाटक की सीटें घट सकती हैं।यही वह बिंदु है जहाँ यह मुद्दा एक राष्ट्रीय बहस से क्षेत्रीय संघर्ष में बदल जाता है। दक्षिण भारतीय राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है, शिक्षा और स्वास्थ्य में बेहतर प्रदर्शन किया है,और अब उन्हें सजा के रूप में कमप्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।दक्षिण के राजनीतिक दलों, विशेषकर डीएमके और कांग्रेस, ने इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया है। उनका मानना है कि इससे संसद में दक्षिण की आवाज कमजोर हो जाएगी और राष्ट्रीय नीतियों में उनका प्रभाव घट जाएगा। यह स्थिति भारत के संघीय संतुलन को अस्थिर कर सकती है। साथियों बात अगर हम सत्ताधारी पार्टी का दृष्टिकोण: समान वृद्धि और संतुलन का दावा इसको समझने की करें तो,सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार का कहना है कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या समान अनुपात में बढ़ाई जाएगी,जिससे किसी राज्य कावर्तमान प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा।पीएम ने संसद में अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह कदम महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने और लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने के लिए उठाया गया है।सरकार का यह भी दावा है कि परिसीमन आयोग निष्पक्ष रूप से काम करेगा और किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा।उनके अनुसार, यह केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि व्यापक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखकर किया जाएगा। साथियों बात अगर हम राजनीतिक आशंका: क्या यह पोलिटिकल कूप है? इसको समझने की करें तो विपक्ष का आरोप है कि यह पूरा कदम एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है,जिससे उन राज्यों में सीटें बढ़ाई जाएँगी जहाँ सत्ताधारी दल का प्रभाव अधिक है। हिंदी भाषी उत्तर भारतीय राज्यों में बीजेपी की मजबूत पकड़ को देखते हुए विपक्ष को आशंका है कि परिसीमन के बाद संसद में सत्ता संतुलन और अधिक एकतरफा हो सकता है।यह आशंका केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संरचनात्मक भी है, क्योंकि संसद में सीटों का वितरण सीधे तौर पर नीति निर्माण और संसाधनों के आवंटन को प्रभावित करता है। साथियों बात अगर हम जनगणना का सवाल: बिना डेटा के निर्णय? इसको समझने की करें तो एक और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि परिसीमन से पहले जनगणना होनी चाहिए या नहीं। विपक्ष का कहना है कि बिना नई जनगणना के परिसीमन करना तर्कसंगत नहीं है,क्योंकि इससे वास्तविक जनसंख्या का सही प्रतिनिधित्व नहीं होगा।सरकार ने संविधान में जनसंख्या की परिभाषा को संशोधित कर यह प्रावधान किया है कि संसद जिस जनगणना को मान्यता देगी,उसी के आधार पर परिसीमन होगा। इससे सरकार को कुछ हद तक लचीलापन मिल जाता है, लेकिन इससे पारदर्शिता पर सवाल भी उठते हैं। साथियों बात कर हम लोकसभा का विस्तार: प्रतिनिधित्व या जटिलता? इसको समझने की करें तो लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करना एक बड़ा कदम है। यह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था को और भी विशाल बना देगा। इससे प्रतिनिधित्व तो बढ़ेगा,लेकिन साथ ही निर्णय लेने की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है।इतिहास पर नजर डालें तो लोकसभा की सीटें समय-समय पर बढ़ाई गई हैं, लेकिन इस बार का विस्तार अभूतपूर्व है। यह बदलाव न केवल राजनीतिक बल्कि प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। बता दें लोकसभा में कब-कब बढ़ी सांसदों की संख्या, वर्ष /सीटें 1950/ 489, 1956/494, 1962/520, 1973/545 (जिसमें 2 एंग्लो इंडियन नामित) 2020+543 (एंग्लो-इंडियन मनोनयन समाप्त होने से) 2026 /850 (प्रस्तावित) अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि लोकतंत्र का विस्तार या नई असमानता की शुरुआत?महिला आरक्षण और परिसीमन का यह पूरा मुद्दा भारतीय लोकतंत्र के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। एक ओर यह महिलाओं को सशक्त बनाने और प्रतिनिधित्व बढ़ाने का अवसर देता है, वहीं दूसरी ओर यह क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ा सकता है। यह स्पष्ट है कि यह केवल एक विधेयक नहीं बल्कि भारत के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णय है। यदि इसे संतुलित, पारदर्शी और सहमति के साथ लागू किया गया, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। लेकिन यदि इसमें राजनीतिक लाभ-हानि का संतुलन हावी रहा, तो यह उत्तर-दक्षिण विभाजन को और गहरा कर सकता है।इसलिए,यह सवाल केवल यह नहीं है कि महिलाओं को आरक्षण मिले या नहीं, बल्कि यह है कि भारत का लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ेगा समावेशिता की ओर या विभाजन की ओर इस पर सबकी नज़रें लगी हुई है। (-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) ईएमएस/17/04/2026