वॉशिंगटन,(ईएमएस)। ईरान और अमेरिका के बीच 40 दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद घोषित युद्धविराम अब गहरे सस्पेंस और तनाव में तब्दील हो गया है। पाकिस्तान में आयोजित शांति वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति धमनी, होर्मुज जलडमरूमध्य, एक बार फिर वैश्विक संघर्ष का केंद्र बन गई है। वार्ता विफल होने का मुख्य कारण इस सामरिक जलमार्ग पर नियंत्रण को लेकर दोनों देशों का अड़ियल रुख रहा। वर्तमान में, अमेरिका ने यहाँ सख्त नौसैनिक घेराबंदी (ब्लॉकेड) कर दी है, जिससे ग्लोबल इकोनॉमी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान वार्ता के विफल होते ही ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी का आदेश दे दिया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के अनुसार, यह ब्लॉकेड पूरी तरह प्रभावी है और अब तक लगभग 10 संदिग्ध जहाजों को वापस मोड़ा जा चुका है। गुरुवार को तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिकी विध्वंसक जेटों ने बंदर अब्बास से निकले एक ईरानी कार्गो जहाज को रोककर वापस भेज दिया। राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि ईरानी अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए यह कदम जरूरी है, जबकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार देते हुए किसी भी शर्त को मानने से इनकार कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य मात्र 21 किलोमीटर चौड़ा रास्ता है, लेकिन वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा यहीं से गुजरता है। इस रास्ते पर कब्जे की जंग ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है और शिपिंग कंपनियां हाई अलर्ट पर हैं। ईरान अपनी भौगोलिक स्थिति और मिसाइल क्षमता के दम पर इस क्षेत्र में दबदबा बनाए रखना चाहता है, वहीं अमेरिकी नौसेना फ्रीडम ऑफ नेविगेशन के नाम पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल ऑपरेशनल स्तर पर अमेरिका का पलड़ा भारी है, लेकिन ईरान की फास्ट अटैक क्राफ्ट और क्षेत्रीय नेटवर्क किसी भी समय स्थिति को पलट सकते हैं। शांति वार्ता के विफल होने से पैदा हुआ यह गतिरोध यदि सैन्य टकराव में बदलता है, तो इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं। फिलहाल, समुद्र में जारी यह शह और मात का खेल भविष्य के एक बड़े फ्लैशपॉइंट की ओर इशारा कर रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस 17 अप्रैल 2026