नई दिल्ली (ईएमएस)। नई दिल्ली की 37 वर्षीय कलाकार पूजा की कहानी आत्म-खोज, असंतोष और अंततः आंतरिक शांति की एक गहरी यात्रा को दिखाती है। बाहर से उनकी जिंदगी सफल और रचनात्मक दिखती थी वे लिखती थीं, पेंटिंग करती थीं, गाने बनाती और प्रदर्शनियों में हिस्सा लेती थीं। शिमला और पंचकुला में पली-बढ़ी पूजा ने दिल्ली और इंग्लैंड में पढ़ाई की, मुंबई में लेखक के रूप में काम किया और जापान तक कला के लिए गईं। लेकिन इन सबके बावजूद उनके भीतर एक खालीपन बना रहा, जिसे वे भर नहीं पा रही थीं। तभी साल 2019 में उनकी जिंदगी ने मोड़ लिया, जब उन्होंने ‘काशी क्रम यात्रा’ में हिस्सा लिया और पहली बार सद्गुरु को देखा। यह अनुभव उनके लिए भावनात्मक रूप से गहरा था—बिना किसी स्पष्ट कारण के उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। इसके बाद उन्होंने ‘इनर इंजीनियरिंग’ कार्यक्रम किया, जिसने उन्हें भीतर से बदलना शुरू किया। यह किसी नए विश्वास को अपनाने का मामला नहीं था, बल्कि जीवन को देखने का एक नया तरीका था। धीरे-धीरे पूजा इस आध्यात्मिक मार्ग की ओर खिंचती चली गईं और फरवरी 2020 में ईशा योग केंद्र पहुंच गईं। वहां सद्गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने मौन धारण किया। शुरुआती समय चुनौतीपूर्ण था मन भटकता था और भावनाएं अस्थिर रहती थीं। लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने विचारों को दूरी से देखना सीख लिया। आज पूजा की दिनचर्या बेहद अनुशासित है। वे सुबह 3:30–4 बजे उठती हैं, साधना करती हैं और ध्यानलिंग में समय बिताती हैं। ‘सम्यमा’ जैसे गहरे कार्यक्रमों ने उनके अनुभव को और गहन बनाया। पहले जहां वे खुद को व्यस्त रखने के लिए कला का सहारा लेती थीं, अब मौन ने उन्हें धैर्य, स्थिरता और आत्म-स्वीकृति सिखाई है। पूजा अपने जीवन को त्याग नहीं मानतीं, बल्कि इस सचेत चुनाव कहती हैं। उनके लिए मौन कोई खालीपन नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो उन्हें भीतर से स्थिर और संतुलित बनाता है। आशीष/ईएमएस 17 अप्रैल 2026