प्रारंभ से ही सम्मान, संवेदना एवं अनुशासन पुलिस की मूल पहचान है। गणवेश केवल अधिकार नहीं अपितु मर्यादा, अनुशासन, सुरक्षा एवं सेवा का भी प्रतीक है। म.प्र.पुलिस का तो ध्येय वाक्य ही देशभक्ति जनसेवा है। यह अवधारणा राष्ट्र के प्रति समर्पण, नागरिक हित, समाज की सुरक्षा एवम् कर्तव्यनिष्ठा की द्योतक है। यदि वर्दी के भीतर सम्मान टूटता है तो समाज में विश्वास क्षीण होता है। विगत 07 अप्रैल 2026 की थाना मडला जिला पन्ना द्वारा सेवा निवृत अस्वस्थ एवं वयोवृद्ध पुलिस अधिकारी को ड्राइवर के बाजू की सीट पर बगैर सीट बेल्ट के बैठे होने की साधारण सी मानवीय भूल के कारण पत्नि सहित घोर अपमानित कर गिरफ्तार करना उनकी संपूर्ण सेवा की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह है। इसे केवल घटना नहीं अपितु एक चेतावनी के रूप में लेने एवम् पुलिस व्यवस्था के भीतर अनुशासन प्रशिक्षण व भारतीय मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का एक अवसर समझना होगा। घटना से अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं कि -- क्या पुलिस में अयोग्य व्यक्तियों को भर्ती किया जा रहा है? क्या उनका प्रशिक्षण युक्तियुक्त नहीं हो रहा है? पुलिस में आंतरिक अनुशासन का सर्वोपरि होना सिखलाया नहीं जा रहा है? वरिष्टों के प्रति सम्मान का ह्रास न हो, यह परंपरा पुलिस की रीढ़ है। विशेष आयु एवं अनुभव के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है, क्या यह पाठ प्रशिक्षण में या जिला स्तर के सेमिनारों में नहीं पढ़ाया जा रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस में अनुशासन का संकट गहरा रहा है। कुछेक रक्षक मर्यादा भूल रहे हैं, जिनके कारण आंतरिक अनुशासन को चुनौती मिल रही है। यह चिंताजनक संकेत है। यह वर्दी का गौरव नहीं अपितु अहंकार का प्रतीक है। यह कहते हुए अत्यन्त पीड़ा हो रही है कि सम्मान खोती वर्दी पर से समाज का विश्वास टूटा जा रहा है। प्रश्न केवल थाने के समक्ष उपस्थित होकर कानून की ओट में वाहन चेकिंग कर रहे अनाधिकृत पुलिस के आरक्षक स्तर के कर्मचारियों का ही नहीं है अपितु विवाद बढ़ता देख घटना स्थल पर आई महिला थाना प्रभारी ने भी उदण्डता कर रहे अनुशासनहीन अधीनस्थों का न केवल समर्थन किया अपितु स्वयं भी पर्याप्त सम्मानजनक व्यवहार न कर दीर्घ कालीन पुलिस सेवा से निवृत अस्वस्थ दम्पत्ति पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 296, 132, 351, 221, 3(5) सहपठित धारा 27, 30 आयुध अधिनियम 1959 के अंतर्गत प्रकरण पंजीकृत कर बिना किसी अनुसंधान के, गिरफ्तारी के समस्त नियमों एवं विधान में वर्णित प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए, अवैधानिक रूप से, कारण बताये बिना उन्हें गिरफ्तार कर लिया एवम् साशय विलम्ब कर सायं 05.30 बजे जेल भेजने की पूर्ण मंशा से न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। संयोगवश न्यायालय द्वारा जमानत स्वीकार कर ली गई। ग्वालियर जा रहे दंपत्ति की कार भी जप्त कर ली गई जिसे दो दिनों बाद न्यायालय के आदेश से छोड़ा गया। अत्यंत दुखद एवम् आश्चर्य का विषय यह है कि वरिष्ठ सम्माननीय वृद्धा तो मात्र शालीनता पूर्वक उभय पक्षों को समझा रही थी। उनका यह प्रयास आपराधिक कैसे हो गया? उनकी 40 वर्ष पुरानी लाइसेंस युक्त बंदूक भी जप्त कर ली गई। प्रकरण में अधिरोपित आरोपों में 07 वर्ष से अधिक कारावास के दण्ड का प्रावधान नहीं है व प्रकरण प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी के न्यायालय में विचारण योग्य हैं। दृष्टांत प्रकरण अर्नेश कुमार विरुद्ध बिहार राज्य ( 2014 ) में पारित सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के प्रकाश में इस प्रकरण में गिरफ्तारी की आवश्यकता ही नहीं थी। ऐसे प्रकरणों में न्यायालय में अभियोग प्रस्तुत करते समय अभियुक्तों की उपस्थिति मात्र सूचना पत्र देकर सुनिश्चित करना पर्याप्त होता है किन्तु पुलिस के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की स्पष्ट अवहेलना ही नहीं की गई अपितु संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करते हुए एक वरिष्ठ दम्पत्ति के सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार का भी अतिक्रमण किया है। इसमें पुलिस अधीक्षक की असंवेदनशीलता एवं मौन स्वीकृति भी स्पष्ट प्रतीत होती है अतः प्रकरण का स्वतंत्र इकाई से अनुसंधान नितान्त अवश्यक है व दुर्भावनापूर्वक मिथ्या अंकित प्रथम सूचना पत्र का निरस्तीकरण वांछनीय है। एक समय था ! बहुत पुराना नहीं, कुछ ही साल पहले का... हमारा जमाना। यद्यपि यह स्वीकार्य तथ्य है कि पश्चात्वर्ती को पूर्ववर्ती से निंदा का सामना करना पड़ता है किंतु मेरी निसंकोच स्वीकारोक्ति है कि हमसे पहले का समय और भी अच्छा था। वरिष्ठों के अनुसरण से ही हमारे द्वारा थानों में शासकीय विभागों के वर्गीकरण युक्त पेंशनधारियों की पंजी संधारित कर रखी जाती थी एवम् समय समय पर उनसे विमर्श कर उनके अनुभवों का लाभ भी प्राप्त किया जाता था। हम तो एक पखवाड़े के एक निश्चित दिन को सेवानिवृत पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों से संपर्क स्थापित कर उनके साथ चाय पीते व समस्याओं के निराकरण पर मार्गदर्शन प्राप्त किया करते थे। तब जबलपुर का अपराधिक जगत अड़ियल घोड़े के सामान था फिर भी हम वरिष्ठों से प्राप्त सुझावों का अनुसरण कर उसकी सवारी कर नकेल कस देते थे। अब वह घोड़ा बारात का घोड़ा बन गया है, पुलिसिंग अपेक्षाकृत सरल एवम् सुविधा संपन्न हो है किंतु वर्तमान पुलिस का व्यवहार अपने पूर्व वरिष्ठों के प्रति उसी अनुपात में चिंतनीय हो गया है। मंथरा की भांति यह कहकर कि “कोउ नृप होई हमै का हानि हम पल्ला झाड़ भी लें तो भरत सिंह साहब के साथ जैसी उत्पन्न स्थिति से कैसे निपटें? प्रतिकार नही अपितु प्रतिक्रिया करना तो अनिवार्य है, चाहे ऐसा कृत्य पुलिस द्वारा अथवा अन्य विभाग के द्वारा या जनता के द्वारा ही कारित क्यों न हो। ।।।मैं अधिवक्ताओं की एकजुटता, उनके द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले विरोध का अहिंसक रहने की सीमा तक का समर्थक हूँ। ऐसा भी नहीं है कि पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है - इंदौर पुलिस यातायात का एक प्रधान आरक्षक अपने कर्तव्य का पालन आकर्षक प्रकार से करने, एक अन्य प्रधान आरक्षक माइलस्टोन की जानकारी, वरिष्ठ नागरिकों को अपने वाहनों में E लिखवाने के परामर्श देने के एवम् एक निरीक्षक बिना हेलमेट लगाये 90 वर्षीय नॉन आरटीओ दुपहिया वाहन चालक से उनके चरणस्पर्श कर समझाइश देने के तरीके से विख्यात होकर सोशियल मीडिया में अत्यंत लोकप्रियता प्राप्त कर रहे हैं। अधिकांशतः पुलिस कर्मी, पुलिस शब्द यथा पु-पुरुषार्थ, लि-लिप्सा रहित, स- साहसी / सहयोगी को चरितार्थ करते हैं तो दूसरी ओर कुछेक ऐसे कर्मचारी एवं अधिकारी हैं जो वर्दी को लज्जित करते हैं जिनके कारण पूरे प्रदेश में सेवानिवृत पुलिस में असंतोष एवम् रोष में व्याप्त है। पुलिस मानव जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण अवयव है। पुलिस के बिना एक ही दिन में समाज में भारी अराजकता विस्तारित हो जाएगी। प्रत्येक नागरिक की यह अपेक्षा रहती है कि उसके घर के समक्ष खड़ा बंदूकधारी एक पुलिस वाला हो न कि कोई अवांछनीय तत्व। मै स्वतः की पुलिस सेवा पर इतना गर्वांवित हूँ कि श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित पुनर्जन्म की परिकल्पना अनुरूप अगले जन्म में भी पुलिसमेन ही बनना चाहुँगा। इस घटना के परिपेक्ष्य में म.प्र. के सभी सेवा निवृत पुलिस संघों ने एकता, शालीनता, अनुशासन एवम् संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। जो सुखद अनुभूति का कारण है। पुलिस के निरंकुश एवम् अधिनायकवादी प्रवृत्ति के कर्मियों का समय रहते उचित निदान आवश्यक है जिनके कारण पुलिस की धवल छवि मलिन हो रही हैं। इज़्ज़तें...शोहरतें... चाहतें... उल्फतें… . कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं... आज मैं हूँ जहाँ, कल कोई और था... ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था… (पं.नरेश शर्मा, राज्य पुलिस सेवा, नगर पुलिसअधीक्षक(से.नि.), जबलपु(म.प्र.)) ईएमएस / 17 अप्रैल 26