- वैशाख शुक्ल तृतीया आखातीज के रूप में जाना जाता है वैशाख शुक्ल तृतीया का पावन दिन भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह तिथि अक्षय तृतीया अथवा आखातीज के नाम से जानी जाती है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जो कभी क्षीण न हो, जो सदा बना रहे। यही कारण है कि इस दिन किए गए पुण्य, दान, तप और शुभ कार्यों को अक्षय अर्थात् अविनाशी फल देने वाला माना गया है। यह तिथि केवल ज्योतिषीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत विशिष्ट है। यह दिन अखण्डता, पवित्रता और निरन्तर प्रगति का प्रतीक है। अक्षय तृतीया का एक विशेष महत्त्व यह भी है कि यह तिथि कभी खंडित नहीं होती। अन्य तिथियों की भाँति इसमें घट-बढ़ नहीं होता, इसलिए इसे स्थिरता और अखण्डता का प्रतीक माना गया है। जीवन में भी यही संदेश निहित है कि जो व्यक्ति अखण्डता और एकरूपता के साथ जीवन जीता है, वही सफलता और संतोष प्राप्त करता है। विभाजित और अस्थिर जीवन व्यक्ति को निरन्तर संघर्ष और असंतोष की ओर ले जाता है, जबकि एकाग्रता और एकता जीवन को श्रेष्ठ बनाती है। इस पावन तिथि का गहरा सम्बन्ध जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से है। भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को जीवन जीने की दिशा प्रदान की। उन्होंने असि, मसि और कृषि के माध्यम से मानव को सभ्यता और संस्कृति का मार्ग दिखाया। उनके द्वारा दी गई शिक्षाएँ आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं। अक्षय तृतीया का दिन विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन भगवान ऋषभदेव ने अपनी दीर्घकालीन तपस्या का पारण किया था। भगवान ऋषभदेव की तपस्या अत्यन्त कठोर और अनुकरणीय थी। उन्होंने दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् अखण्ड मौन और कठोर तप का पालन किया। उस समय समाज को श्रमण जीवन की विधियों का ज्ञान नहीं था, इसलिए उन्हें लंबे समय तक शुद्ध आहार प्राप्त नहीं हो सका। लोग श्रद्धा से उन्हें अनेक प्रकार के उपहार और धन अर्पित करते थे, किन्तु भगवान केवल निर्दोष आहार ही ग्रहण करते थे। परिणामस्वरूप वे निरंतर तप में लीन रहे और एक वर्ष से अधिक समय तक निराहार रहे। यह स्थिति तब परिवर्तित हुई जब हस्तिनापुर के युवराज श्रेयांसकुमार ने जातिस्मरण ज्ञान के माध्यम से भगवान की आवश्यकताओं को समझा। उन्होंने पूर्ण श्रद्धा और पवित्र भावना से भगवान को इक्षु रस का दान दिया, जिससे भगवान की तपस्या का पारण सम्पन्न हुआ। यह घटना न केवल भगवान की तपस्या का पूर्णत्व थी, बल्कि संसार में दान की परम्परा का भी प्रारम्भ थी। इस प्रकार अक्षय तृतीया का दिन तप और दान दोनों की महानता का प्रतीक बन गया। तप का महत्त्व भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में अत्यधिक है। तप आत्मशुद्धि का साधन है, जो मनुष्य को उसके कर्मों के बन्धन से मुक्त करता है। तप के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की दुर्बलताओं को दूर करता है और आत्मबल को विकसित करता है। यह केवल शारीरिक कष्ट सहने का नाम नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है। तप ही वह साधन है जो व्यक्ति को उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था तक पहुँचाता है। अक्षय तृतीया के अवसर पर आज भी अनेक साधक वर्षीतप करते हैं। वर्षीतप एक कठिन साधना है, जिसमें एक दिन उपवास और दूसरे दिन पारण का क्रम चलता है। यह तपस्या आत्मसंयम, धैर्य और श्रद्धा का अद्भुत उदाहरण है। ऐसे तपस्वियों का सम्मान और अनुमोदन करना भी एक प्रकार का तप माना गया है। समाज में तप की परम्परा को जीवित रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह जीवन में अनुशासन और पवित्रता का संचार करती है। दान का भी इस तिथि से विशेष सम्बन्ध है। श्रेयांसकुमार द्वारा किए गए प्रथम दान ने यह सिद्ध किया कि दान केवल वस्तु का नहीं, भावना का होता है। शुद्ध भावना से किया गया दान ही श्रेष्ठ होता है। दान समाज में समानता और सहयोग की भावना को बढ़ाता है। यह केवल दूसरों की सहायता नहीं, बल्कि स्वयं के आत्मिक विकास का भी माध्यम है। भारतीय संस्कृति में पर्व और त्यौहारों का विशेष महत्त्व है। यहाँ कहा जाता है कि भारत पर्वों का देश है, जहाँ हर दिन एक नया उत्सव लेकर आता है। ये पर्व जीवन में नवीनता और उत्साह का संचार करते हैं। कुछ पर्व केवल बाह्य उल्लास और मनोरंजन से जुड़े होते हैं, जबकि कुछ पर्व आत्मिक उन्नति और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देते हैं। अक्षय तृतीया ऐसा ही एक पर्व है, जो त्याग, तप और दान की प्रेरणा देता है। इस तिथि को बिना मुहूर्त देखे शुभ कार्य करने की परम्परा भी प्रचलित है। विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आदि कार्य इस दिन विशेष रूप से किए जाते हैं, क्योंकि यह दिन स्वयं में शुभ माना जाता है। यह विश्वास इस बात को दर्शाता है कि यह तिथि सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल प्रदान करने वाली है। अक्षय तृतीया का एक अन्य पहलू यह भी है कि यह हमें पुरुषार्थ का संदेश देती है। भगवान ऋषभदेव ने अपने आचरण से यह सिखाया कि केवल भाग्य पर निर्भर रहना उचित नहीं है, बल्कि निरन्तर प्रयास करना आवश्यक है। उन्होंने स्वयं कठिन तपस्या करके यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि जीवन में सफलता और मुक्ति प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है। अंततः अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में अखण्डता, तप, दान और पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है। यह तिथि हमें यह स्मरण कराती है कि सच्ची प्रगति केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और आत्मबल से होती है। भगवान ऋषभदेव की तपस्या और श्रेयांसकुमार के दान की यह पावन परम्परा हमें सदैव प्रेरित करती रहे, यही इस पर्व का सच्चा संदेश है। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 18 अप्रैल 26