लेख
18-Apr-2026
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मार्च की उस मखमली शाम में, जब वसंत की सुनहरी रोशनी महानगर की ऊँची-ऊँची कंक्रीट की दीवारों से टकराकर जैसे अपनी ही चमक खो बैठी थी, सलोनी अपने आठवीं मंज़िल के आलीशान फ्लैट की बालकनी में खड़ी दूर आसमान को निहार रही थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक का शोर, चमकती रोशनियाँ-सब कुछ उसके सामने था, फिर भी उसके भीतर जैसे एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। कोयल की कूक कानों में पड़ती, हवा में फूलों की हल्की सुगंध भी घुली थी, लेकिन उसका मन जैसे किसी अदृश्य बोझ तले दबा हुआ था। उसे लग रहा था कि वह एक ऐसी दौड़ में भाग रही है, जिसका न कोई स्पष्ट लक्ष्य है, न कोई ठहराव। तभी उसके मोबाइल स्क्रीन पर अचानक एक विज्ञापन उभरा- ‘अपराजिता ब्लू टी’। उस गहरे, सम्मोहक नीले रंग ने उसकी आँखों को जैसे बाँध लिया। वह रंग केवल एक पेय का आकर्षण नहीं था, बल्कि उसके अतीत की स्मृतियों का द्वार खोल रहा था।उसका मन अनायास ही बचपन के उस छोटे-से गाँव की ओर लौट गया, जहाँ मिट्टी की सोंधी खुशबू में जीवन की सच्चाई बसती थी। उसे याद आया वह आँगन, जहाँ उसकी दादी अपराजिता की बेल को बड़े स्नेह से हर रोज़ पानी देती थीं और कहती थीं-बिटिया, यह कोई साधारण फूल नहीं, यह अपराजिता है-जो कभी हार नहीं मानती। इसके फूल शरीर ही नहीं, मन को भी शांत करते हैं। उस समय सलोनी को दादी अम्मा की कही यह सब बातें पुरानी और अवैज्ञानिक लगती थीं। वह अक्सर दादी की बातों पर हँस देती और कहती-दादी, ये सब अब पुराने जमाने की बातें हैं। दादी बस मुस्कुरा देतीं, जैसे जानती हों कि समय एक दिन उसे स्वयं उत्तर देगा। लेकिन आज वही पुराना ज्ञान उसे एक नई दृष्टि से दिखाई दे रहा था। वह सोचने लगी कि जिन चीज़ों को उसने कभी महत्व नहीं दिया, वही आज दुनिया के बाज़ार में ‘लक्ज़री’ बनकर बिक रही हैं। दादी के वे सरल नुस्खे, जो बिना किसी दिखावे के जीवन को सहज बनाते थे, आज आधुनिकता की चमक-दमक में कहीं खो गए थे। उस रात सलोनी को नींद नहीं आई। दादी की आवाज़ बार-बार उसके मन में गूँजती रही-अपराजिता सिर्फ शरीर की थकान नहीं, मन की उदासी भी सोख लेती है…। वह सोचती रही-क्या सच में उसने अपने जीवन की सच्ची शांति को पीछे छोड़ दिया है? सुबह होते-होते उसके भीतर एक निर्णय आकार ले चुका था। उसने ठान लिया कि वह इस कृत्रिम चकाचौंध से दूर जाकर अपने असली अस्तित्व को खोजेगी। वह लौटेगी-अपने गाँव, अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों की ओर। जब वह गाँव पहुँची, तो जैसे समय ने उसका स्वागत करते हुए अपनी रफ्तार धीमी कर दी। कच्ची पगडंडियाँ, पेड़ों की छाँव, हवा में घुली मिट्टी की सोंधी खुशबू-सब कुछ वैसा का वैसा ही था, जैसा उसने बचपन में देखा था। दरवाज़े पर खड़ी उसकी दादी उसे देखकर कुछ नहीं बोलीं, पर उनकी आँखों में उमड़ता स्नेह, अपनापन और गर्व सब कुछ कह रहा था। सलोनी ने उनके चरण छुए, और उस स्पर्श में उसे एक ऐसी शांति का अनुभव हुआ, जो वर्षों से उससे दूर थी। कुछ ही दिनों में सलोनी ने अपने मन की बात दादी के सामने रखी। उसने कहा कि वह अपराजिता के फूलों की खेती करना चाहती है। दादी की आँखों में एक चमक उभर आई, मानो वे उसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा-अगर मन सच्चा हो, तो मिट्टी भी साथ देती है। सलोनी ने खेती शुरू की, पर यह केवल एक व्यवसाय नहीं था; यह उसके लिए एक साधना थी। हर बीज को वह श्रद्धा से बोती, हर पौधे की देखभाल ऐसे करती जैसे वह उसका अपना अंश हो। गाँव के लोग उसकी इस पहल को समझ नहीं पा रहे थे। वे ताने देते-शहर की लड़की खेती करेगी? अपराजिता के फूल उगाकर भी भला कोई अमीर बना है क्या? और फ़िर खेती करना लड़की के वश की तो बात नहीं। यह कोई इतना सरल कार्य थोड़े ही है,जो कोई भी कर लेगा ? पर सलोनी ने इन बातों को अपने रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया। उसने अपराजिता की बेल से ही प्रेरणा ली-जो हर परिस्थिति में बढ़ती है, झुकती है, पर टूटती नहीं। धीरे-धीरे उसके खेतों में नीले फूलों की बहार आने लगी। जब पहली बार उसकी उगाई हुई अपराजिता ने खिलकर नीला रंग बिखेरा, तो उसे लगा जैसे उसकी मेहनत ने रंग पकड़ लिया हो। सलोनी ने उन फूलों से ‘ब्लू टी’ बनाना शुरू किया, पर उसने इसे केवल एक उत्पाद नहीं बनने दिया। उसने उसमें अपनी दादी की सीख, गाँव की मिट्टी की खुशबू और अपनी आत्मा की सच्चाई घोल दी। धीरे-धीरे उसके इस प्रयास को पहचान मिलने लगी। पहले पास के शहरों में, फिर बड़े महानगरों में, और देखते ही देखते उसकी ‘ब्लू टी’ मेट्रो सीटीज के बाज़ारों तक पहुँच गई। लोग उसके उत्पाद की तारीफ करते, उसके ब्रांड की चर्चा होती, लेकिन सलोनी जानती थी कि यह केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि उसकी कहानी का विस्तार है। समय के साथ उसने बहुत कुछ हासिल किया-नाम, सम्मान, आर्थिक सफलता आदि सबकुछ। पर उसके भीतर एक संतुलन भी जन्म ले चुका था। एक शाम वह अपने खेतों के बीच खड़ी थी। सूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी सुनहरी किरणें नीले फूलों पर पड़कर एक अद्भुत दृश्य रच रही थीं-मानो धरती पर आकाश उतर आया हो। उस पल उसे अपने भीतर एक गहरी शांति का अनुभव हुआ। उसे लगा जैसे उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी खोज पूरी कर ली हो। तभी पीछे से दादी की आवाज़ आई- सलोनी, अब समझ आया तुम्हें अपराजिता का अर्थ? सलोनी ने मुड़कर देखा। दादी की आँखों में संतोष और प्रेम झलक रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा-हाँ दादी, अब समझ में आया कि अपराजिता केवल एक फूल नहीं है। यह वह शक्ति है, जो हमें हर कठिनाई में भी हार मानने नहीं देती, बल्कि हमें अपने भीतर झाँकने और खुद को पहचानने की प्रेरणा देती है। दादी ने पास की एक बेल से एक नीला फूल तोड़ा और उसकी हथेली में रखते हुए कहा-और जब इंसान खुद से मिल जाता है, तब उसे कोई हरा नहीं सकता। सलोनी ने उस फूल को अपनी मुट्ठी में कस लिया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर इस बार वे दुख के नहीं, बल्कि आत्मविजय के आँसू थे। उसने महसूस किया कि असली सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस संतोष में है, जो हमें अपने अस्तित्व को स्वीकार करने से मिलता है। अब उसकी कहानी केवल ‘ब्लू टी’ तक सीमित नहीं रही थी; वह एक ऐसी यात्रा बन चुकी थी, जिसमें उसने दुनिया जीतने से पहले स्वयं को जीतना सीख लिया था। और शायद, यही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है-अपने भीतर की अपराजिता को पहचान लेना, जो हर परिस्थिति में हमें अडिग, अजेय और पूर्ण बनाती है। ईएमएस / 18 अप्रैल 26