चंबल—एक ऐसा नाम जो दशकों तक खौफ खून और खुरदरी घाटियों का पर्याय बना रहा। इतिहास के पन्नों में यह क्षेत्र उस महान मानवीय प्रयोग के लिए भी जाना जाता है जहाँ प्रतिशोध की आग को संवाद के शीतल जल से शांत किया गया था। 1960 से 1970 के दशक के बीच हुए चंबल के बागियों का आत्मसमर्पण महज़ एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं थीं बल्कि इस बात का जीवंत साक्ष्य थीं कि संवाद की शक्ति सबसे दुर्जेय किलों को भी भेद सकती है और यदि न्याय में सुधार की गुंजाइश हो, तो दुर्दांत से दुर्दांत अपराधी भी मुख्यधारा का हिस्सा बन सकता है। चंबल का संकट हमेशा से जटिल रहा है। वहाँ के गिरोह खुद को डाकू नही बल्कि ओबागी मानते थे। 1960 में जब कुख्यात मान सिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह ने नैनी जेल की कालकोठरी से आचार्य विनोबा भावे को पत्र लिखा, तो वह केवल एक अपराधी की पुकार नहीं थी, बल्कि तंत्र से हारे हुए एक व्यक्ति का संवाद की ओर बढ़ा हाथ था। चंबल की भौगोलिक विषमता और सामंती शोषण ने जिन लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर किया, उनके भीतर कहीं न कहीं न्याय की तीव्र ललक जीवित थी। पत्र पढ़ते ही विनोबा ने निर्णय लिया—चंबल जाएंगे बाग़ियों से मिलेंगे। विनोबा भावे ने पैदल यात्रा कर उन दुर्गम घाटियों में प्रवेश किया जहाँ पुलिस के पैर डगमगाते थे। उन्होंने बदला नहीं बल्कि बदलाव की बात की। उनके प्रभाव में आकर 20 बागियों ने हथियार डाले, जो आधुनिक भारत के इतिहास में अहिंसा का एक अभूतपूर्व प्रयोग था। इस तरह चंबल में हथियार डालने की प्रक्रिया शुरू हुई। बाग़ियों ने धीरे-धीरे अपने हथियार छोड़े और समाज ने उन्हें स्वीकारना शुरू किया। यह केवल अपराधियों का आत्मसमर्पण नहीं था बल्कि भारत में सामाजिक सुधार पुनर्वास और अहिंसक परिवर्तन की एक मिसाल बन गई। दूसरे चरण की पटकथा 1971 में लिखी गई, जब मशहूर डाकू माधो सिंह ने वेश बदलकर जयप्रकाश नारायण (जेपी) से आत्मसमर्पण के लिए संपर्क किया। जेपी के लिए यह अग्निपरीक्षा थी। जेपी इस बात को भली भांति जानते थे कि दमन से केवल नए विद्रोही पैदा होंगे, लेकिन सहानुभूति से एक संस्कृति को बदला जा सकता है। शुरुआती दौर में पुलिस महकमा इस गांधीवादी दृष्टिकोण को लेकर संशय में था। अधिकारियों का मानना था कि अपराधियों के साथ सख्ती ही एकमात्र रास्ता है। हालांकि जब मोहर सिंह और माधो सिंह जैसे इनामी डाकुओं ने जेपी के चरणों में हथियार रखे, तो राज्य तंत्र को भी समझ आया कि जो काम हजारों गोलियां नहीं कर पाईं, वह करुणा के एक स्पर्श ने कर दिखाया। 14 अप्रैल 1972, चंबल के बीहड़ों में ऐतिहासिक क्षण आया। मोहर सिंह और माधो सिंह जैसे इनामी डाकु ने अपने सैकड़ो साथियों के साथ, जौरा तहसील के धोरेरा गांव के आश्रम में जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में महात्मा गांधी के चित्र के सामने अपने हथियार डाल दिए। इस शुरुआत के बाद सैकड़ों बागियों ने आत्मसमर्पण किया। यह दृश्य अद्भुत और प्रेरक था—अहिंसा, प्रेम और करुणा के माध्यम से आत्मशक्ति का जीवंत उदाहरण। इस ऐतिहासिक आत्मसमर्पण में जयप्रकाश नारायण और एस.एन. सुब्बाराव की निर्णायक भूमिका रही। जयप्रकाश नारायण का वह गांधीवादी विश्वास—अपराध से घृणा करो अपराधी से नहींचंबल की धरती पर साकार हुआ। कोई बल प्रयोग नहीं, केवल संवाद, समझ और विश्वास की शक्ति ने घाटियों में शांति की लहर बहा दी। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों के बीच का समन्वय इस अभियान की प्रशासनिक रीढ़ बना। यह सुनिश्चित किया गया कि आत्मसमर्पण करने वालों के साथ मानवीय व्यवहार हो और उन्हे मृत्युदंड न मिले। सरकार ने बाकियों के परिवारों के देखभाल करने और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने का वादा किया और सभी बागियों को आत्मसमर्पण के बाद मुंगावली और लखीमपुर खीरी जैसी जगहों पर ‘नवजीवन केंद्र’ के रूप में खुली जेल में रखा गया। मकसद उन्हे सजा देना नही बल्कि उन्हें सुधारना था। 8-10 साल की जेल की सजा काटकर जब बागी जेल की सलाखों से बाहर आए तो उन्हें असली चुनौती का सामना करना पड़ा। बाहर की दुनिया जिसे कभी वे भय और हथियारों के नजरिए से जानते थे अब उनके लिए एक नई तरह की जंग थी। बीहड़ों में गुज़ारे गए दिन जहां वह स्वतंत्रता और डर के बीच झूलते थे अब समाज की नजरों और पूर्वाग्रहों के बीच उन्हें खुद को साबित करना था। हर कदम पर सवाल थे हर नजर में संदेह था लेकिन सरकारी मदद और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से उनका पुनर्वास संभव हो पाया। प्रख्यात गांधीवादी राजगोपाल पीवी ने इन डाकुओं के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने का पुल बनाया। उनके प्रयासों के तहत आत्मसमर्पण करने वाले बागियों का पुनर्वास सुनिश्चित किया गया ताकि वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें। उन्हें कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और सामाजिक समर्थन प्रदान कर एक नई शुरुआत का अवसर दिया गया। सरकार द्वारा उन्हे घर और कृषि योग्य जमीन आवंटित की गई। जेल से लौटने के बाद कई पूर्व डाकुओं (जैसे मोहर सिंह, मलखान सिंह) ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। चुनाव लड़े और पंचायत या स्थानीय निकायों में पदों पर रहे। राजगोपाल पीवी का कहना है असली विजय तब हुई जब समाज ने इन पूर्व बागियों को अपनाया। जिन परिवारों ने हिंसा झेली थी उन्होंने प्रतिशोध के बजाय करुणा और क्षमा को चुना। जौरा—वह ऐतिहासिक घाटियाँ, जहाँ दशकों पहले चंबल के बागियों ने अपने हथियार डाल कर आत्मसमर्पण किया था। 14 अप्रैल को बागी आत्मसमर्पण की 54वीं वर्षगांठ के अवसर पर मुरैना जिले के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम में बागी समर्पण दिवस मनाया गया। इस अवसर पर प्रख्यात गांधीवादी और एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल पी वी ने समर्पण दिवस को याद करते हुए कहा कि आज से 54 वर्ष पूर्व चंबल के बीहड़ों में एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने पूरी दुनिया को हृदय परिवर्तन की शक्ति से परिचित कराया। पुनर्वास का यह मॉडल आज केरल के कन्नूर जैसे क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बना है जहाँ संवाद के माध्यम से राजनीतिक हिंसा को कम किया गया। राजगोपाल पी.वी. ने कहा कि जौरा अब सिर्फ इतिहास की गवाही नहीं देगा बल्कि यह युवा और समाज के लिए अहिंसा संवाद और करुणा की जीवंत पाठशाला बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस परिवर्तन की कहानी में महिलाओं की भूमिका निर्णायक होगी—वे घर से लेकर वैश्विक मंच तक शांति का संदेश फैलाएँगी। इस अवसर पर आयोजित सुब्बाराव स्मृति व्याख्यान में सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने व्याख्यान में महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के व्यक्तित्व और विचारों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यदि डॉ. अंबेडकर गांधीजी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए होते, तो वे गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन सकते थे। उनके अनुसार गांधी, लोहिया और अंबेडकर के विचारों के संगम से ही पूंजीवाद को चुनौती दी जा सकती है। रघु ठाकुर ने बताया कि दलितों के पृथक मताधिकार की मांग से डॉ. अंबेडकर को पूना पैक्ट के बाद दोगुनी सीटें मिलीं। पंडित नेहरू की अनिच्छा के बावजूद संविधान सभा की प्रारूप समिति गांधी की पहल से बनी। इसके लिए कांग्रेस के एक नेता से इस्तीफा भी दिलवाया गया। जहां तक वर्ण-व्यवस्था और छुआछूत का सवाल है, गांधी अस्पृश्यता समाप्त करने के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने कहा था कि अगर हिन्दू धर्म से छुआछूत दूर नहीं हो सकती तो अच्छा है कि धर्म ही समाप्त हो जाए। गांधी ने डॉ. अंबेडकर के एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट को अपने अखबार में प्रकाशित भी किया। रघु ठाकुर ने आगे बताया कि गांधी का लक्ष्य केवल देश को स्वतंत्र कराना नहीं था बल्कि समाज से अस्पृश्यता को मिटाना भी था। गांधी समय के साथ अंतर्जातीय विवाहों में ही आशीर्वाद देने लगे। दूसरी ओर अंबेडकर शहरों के समर्थक थे, जबकि गांधी ग्राम स्वराज के पक्षधर थे। अंबेडकर को गांवों में जातिवाद दिखाई देता था। अन्य प्रमुख वक्ताओं में अनुराधा शंकर (पूर्व डीजीपी, मध्य प्रदेश),श्री राकेश दीवान (संपादक, सर्वोदय प्रेस सर्विस, भोपाल), श्री भरत डोगरा (विख्यात पत्रकार, नई दिल्ली), श्री प्रदीप शर्मा (इलाहाबाद विश्वविद्यालय), श्री मनोज झा (भागलपुर, बिहार) और सुश्री जिल कार हैरिस शामिल थे। बागी समर्पण दिवस के आवास पर पूर्व बागियों का सम्मान किया गया और उस ऐतिहासिक घटना को याद किया गया जिसने चंबल क्षेत्र में शांति की नई राह खोली। सभी वक्ताओं ने मौजूदा विश्व के संकट व युद्ध समाप्त करने की दिशा में गांधी के रास्ते पर लौटने व संवाद की जरूरत बताई। उपस्थित लोगों ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि चंबल क्षेत्र, जो कभी बागियों के आतंक के लिए जाना जाता था आज विकास और शांति की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज जब हम नक्सलवाद या अन्य आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों की बात करते हैं, तो चंबल की वह घटना हमारे सामने एक जीवंत मॉडल की तरह है। पचास साल पहले बागियों के आत्मसमर्पण ने यह साबित कर दिया था कि संवाद और विश्वास हिंसा की आग को भी ठंडा कर सकते हैं। उस दौर में समाज और तंत्र के बीच पुल बने और बंदूकें जमीन पर गिर गईं लेकिन आज की तस्वीर कुछ अलग है। नक्सलवाद जैसी समस्या के सामने शांति और अहिंसा की पहल उतनी प्रभावशाली दिखाई नहीं देती। बागियों की समस्याएं हल हो गईं मगर लगभग उसी समय शुरू हुए नक्सली आंदोलनों को उसी समझदारी और धैर्य के साथ नहीं संभाला गया। यह एक चेतावनी भी है कि समाज और तंत्र के बीच जब संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं तब ही बीहड़ जन्म लेते हैं। पुनर्वास ही स्थाई शांति का एकमात्र मार्ग है। ईएमएस / 19 अप्रैल 26