नई दिल्ली,(ईएमएस)। लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के गिरने के साथ ही देश में एक बार फिर संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक संख्या बल और राजनीतिक सहमति पर बहस छिड़ गई है। विपक्षी दलों ने जहाँ इसे दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा और अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश किया है, वहीं सरकार की ओर से भी इस हार पर मुकम्मल जवाब दिया गया। तकनीकी रूप से देखें तो संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत लाए गए इस विधेयक को पारित कराने के लिए सदन के दो-तिहाई सदस्यों यानी लगभग 360 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता थी, जबकि वर्तमान सरकार के पास गठबंधन सहयोगियों के साथ कुल 293 सदस्य ही हैं। ऐसे में आम सहमति के अभाव में विधेयक का गिरना तय था। भारतीय संसदीय इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि पिछले चार दशकों में भारतीय राजनीति का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। आखिरी बार लोकसभा में किसी एक दल के पास प्रचंड दो-तिहाई बहुमत वर्ष 1984 में था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 414 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। इसी भारी जनादेश के दम पर 1985 में दलबदल विरोधी कानून (52वां संविधान संशोधन) पारित किया गया था। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इतना भारी बहुमत होने के बाद भी राजीव गांधी सरकार 1989 में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिलाने वाला 64वां संशोधन विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं करा सकी थी। यह दर्शाता है कि संविधान संशोधन के लिए केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा का गणित भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राजीव गांधी के बाद भारतीय राजनीति में गठबंधन और अल्पमत सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिसने प्रचंड बहुमत के बजाय व्यापक सहमति को अनिवार्य बना दिया। इसका सबसे सटीक उदाहरण 1992 में देखने को मिला, जब पीवी नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने विभिन्न दलों के बीच आम राय बनाकर 73वां संविधान संशोधन पारित करवाया। जिस पंचायत राज व्यवस्था को राजीव गांधी अपने प्रचंड बहुमत के दौर में अमली जामा नहीं पहना सके थे, उसे नरसिंह राव ने संवाद और समन्वय के जरिए मुमकिन कर दिखाया। मौजूदा महिला आरक्षण कानून से जुड़े संशोधन विधेयक का विफल होना इसी ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि करता है कि 1984 के बाद से संविधान संशोधन अब केवल सत्ता पक्ष की इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संवाद का विषय बन गया है। बिना विपक्षी समर्थन और आम सहमति के, सदन की दहलीज पर बड़े संवैधानिक बदलावों को मूर्त रूप देना आज की गठबंधन राजनीति में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वीरेंद्र/ईएमएस 19 अप्रैल 2026