लेख
20-Apr-2026
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- प्रदूषण फैलाने वालों से वसूला जाए “पर्यावरण कर” क्या यह स्वीकार्य है कि कुछ लोग स्विमिंग पूल भरने के लिए हजारों लीटर पानी बहाएँ, एसी 24 घंटे चलाएँ, और दूसरी ओर कोई परिवार पीने के पानी के लिए तरसे? क्या यह न्याय है कि एक वर्ग अपनी थाली में जरूरत से तीन गुना कैलोरी बर्बाद करे, जबकि दूसरा कुपोषण से जूझे? और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या यह सही है कि जो सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं, वही सबसे कम कीमत चुकाते हैं? सच्चाई यह है कि आज की अर्थव्यवस्था “अधिक उपभोग करो और बच निकलो” के सिद्धांत पर चल रही है। अब इसे बदलना ही होगा। सीमाएँ क्यों? क्योंकि संसाधन “मौलिक अधिकार” हैं, विलासिता नहीं ऊर्जा, जल और भोजन—ये बाजार की वस्तुएँ नहीं, बल्कि जीवन के आधार हैं। इन्हें “जिसके पास पैसा है, वह जितना चाहे इस्तेमाल करे” के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता। भूजल खत्म हो रहा है शहरों में बिजली की खपत विस्फोटक हो चुकी है भोजन की बर्बादी चरम पर है। ऐसे में “सीमा” कोई तानाशाही नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य की रक्षा का न्यूनतम उपाय है। *सबसे बड़ा सच* असली समस्या “जनसंख्या” नहीं, “असमान उपभोग” है अक्सर कहा जाता है कि जनसंख्या ज्यादा है, इसलिए संकट है। यह आधा सच है। असली समस्या यह है कि: 10% लोग 50–60% संसाधन खा जाते हैं। बाकी 90% न्यूनतम पर जीते हैं।इसलिए अगर सीमा लगेगी, तो सबसे पहले अत्यधिक उपभोग करने वालों पर लगनी चाहिए। *नई नीति का मॉडल:* “कम से कम अधिकार, अधिकतम जिम्मेदारी” 1. न्यूनतम गारंटी (Basic Right) हर नागरिक को मिले: पीने योग्य पानी आवश्यक बिजली संतुलित पोषण यह सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। 2. अधिकतम सीमा एक तय सीमा तक सामान्य दर उसके बाद तेजी से बढ़ती कीमत उदाहरण: 100 यूनिट बिजली तक सस्ती 500 यूनिट के बाद “लक्ज़री टैक्स” यह सीधे-सीधे “ज्यादा उपभोग : ज्यादा भुगतान” का सिद्धांत लागू करेगा। सबसे जरूरी कदम: “प्रदूषण कर” अब बात सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दे की है। आज जो सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं—बड़ी कंपनियाँ, लग्ज़री उपभोग करने वाले वर्ग—वे अक्सर बच निकलते हैं। यह व्यवस्था उलटनी होगी। *क्या होना चाहिए?* जितना अधिक कार्बन उत्सर्जन, उतना अधिक टैक्स पानी की बर्बादी पर अतिरिक्त शुल्क अत्यधिक कचरा पैदा करने वालों पर दंड *किन पर लागू हो?* बड़े उद्योग लग्ज़री वाहन उपयोगकर्ता अत्यधिक ऊर्जा खपत करने वाले घर/संस्थान इसे “दंड” नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय समझा जाना चाहिए। *कैलोरी पर क्या हो?* सीधा नियंत्रण नहीं, लेकिन सख्त संकेत सरकार को यह तय नहीं करना चाहिए कि आप कितनी रोटी खाएँ। लेकिन यह जरूर तय करना चाहिए कि: जंक फूड पर भारी टैक्स लगे खाद्य कंपनियाँ स्पष्ट पोषण जानकारी दें स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में स्वस्थ भोजन अनिवार्य हो यानी स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन गलत विकल्प मंहगे हों। *विरोध की आवाज़ें और उनका जवाब* “यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है” *जवाब:* जब आपका उपभोग दूसरे के जीवन पर असर डालता है, तो यह निजी मामला नहीं रह जाता। “इससे अर्थव्यवस्था धीमी होगी” जवाब: यह अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाएगा, जो लंबे समय में ज्यादा मजबूत होती है। “यह अमीरों को टारगेट करता है” जवाब: यह अमीरों को नहीं, अत्यधिक उपभोग को टारगेट करता है—और वही न्याय है। भारत के लिए यह क्यों अनिवार्य है भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है।तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सीमित प्राकृतिक संसाधन गहराती सामाजिक असमानता अगर अभी भी हमने “सीमा एवं प्रदूषण कर” जैसे कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में पानी युद्ध का कारण बनेगा।ऊर्जा संकट बढ़ेगा और सामाजिक तनाव विस्फोटक हो जाएगा इसलिए अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है। यह बहस अब सैद्धांतिक नहीं रही। यह जीवन और अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। जो ज्यादा लेता है, वह ज्यादा लौटाए जो ज्यादा प्रदूषण फैलाता है, वह ज्यादा भुगतान करे और हर नागरिक को न्यूनतम जीवन की गारंटी मिले। यही है सच्चा लोकतंत्र और पर्यावरणीय न्याय है।क्योंकि अगर आज हमने सीमा तय नहीं की, तो कल प्रकृति हमारी सीमाएँ तय कर देगी—और तब कोई बहस नहीं होगी। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 20 अप्रैल /2026