टोक्यो (ईएमएस)। जापान के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजन के उत्पादन का एक ऐसा तरीका खोज निकाला है, जो इस समस्या का एक क्रांतिकारी समाधान प्रदान कर सकता है। वैज्ञानिकों ने सिर्फ लोहे के आयन और अल्ट्रावायलेट (यूवी) रोशनी की मदद से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस तैयार कर ली है, जिसने पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता खत्म करने की उम्मीद जगा दी है। यह उल्लेखनीय खोज क्यूशू यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर ताकाहिरो मात्सुमोतो और उनकी टीम के एक शोध के दौरान हुई। उनका मूल उद्देश्य सस्ते तत्वों से प्रभावी उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) विकसित करना था। इसी प्रक्रिया के तहत एक नियंत्रित प्रयोग में, उन्होंने मेथेनॉल, आयरन आयन और सोडियम हाइड्रोक्साइड को एक साथ मिलाया। जब इस घोल पर अल्ट्रावायलेट लाइट डाली गई, तो जो परिणाम सामने आया उसने सबको हैरान कर दिया: इस मिश्रण से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकलने लगी। मात्सुमोतो स्वयं कहते हैं, शुरुआत में तो इस पर यकीन करना ही मुश्किल था। वे इसे एक सुखद इत्तेफाक बताते हैं जिसने विज्ञान के एक बिल्कुल नए मार्ग को प्रशस्त कर दिया है। वर्तमान में, अधिकांश हाइड्रोजन का उत्पादन जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) से होता है, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हाइड्रोजन को मेथेनॉल जैसे अल्कोहल से भी निकाला जा सकता है, लेकिन इसके लिए बहुत महंगे और दुर्लभ धातुओं वाले उत्प्रेरकों की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, लोहा पृथ्वी पर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला और अत्यंत सस्ता धातु है। इस नई रिसर्च में लोहे का उपयोग करके उतनी ही रफ्तार से हाइड्रोजन बनाई गई है, जितनी महंगे उत्प्रेरकों से बनती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इसकी हाइड्रोजन उत्पादन दर 921 मिलीमोल प्रति घंटा प्रति ग्राम उत्प्रेरक रही, जो अब तक के सबसे बेहतरीन सिस्टम के बराबर मानी जाती है। इस रिसर्च की सबसे बड़ी खूबी इसकी बहुमुखी प्रतिभा (वर्सेटिलिटी) है। वैज्ञानिकों ने परीक्षण किए और पाया कि यह तरीका केवल मेथेनॉल तक ही सीमित नहीं है। इससे एथेनॉल और प्रोपेनॉल जैसे दूसरे अल्कोहल से भी हाइड्रोजन निकाली जा सकती है। इसके अलावा, बायोमास से संबंधित चीजें जैसे ग्लूकोज, स्टार्च और सेल्युलोज से भी हाइड्रोजन बनाने में सफलता मिली है। हालांकि, अभी ग्लूकोज जैसी चीजों के साथ इसकी दक्षता थोड़ी कम है, लेकिन भविष्य में इसे बेहतर बनाने की पूरी गुंजाइश है। यह तकनीक कचरे से ऊर्जा बनाने की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित हो सकती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। हालांकि, हर बड़ी खोज के साथ कुछ सवाल भी जुड़े होते हैं। मात्सुमोतो की टीम का कहना है कि वे अभी तक इस पूरी प्रतिक्रिया के सटीक मैकेनिज्म को पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं, यानी यह प्रक्रिया आंतरिक तौर पर कैसे काम करती है, इसकी बारीकियों का पता लगाना बाकी है। इसके अलावा, अन्य पदार्थों के साथ इसकी दक्षता को बढ़ाना भी एक चुनौती है। फिर भी, यह तकनीक इतनी सरल है कि इसे कोई भी दोहरा सकता है। प्रोफेसर मात्सुमोतो चाहते हैं कि बच्चे भी इसे ट्राई करें ताकि वे विज्ञान की तरफ आकर्षित हों। भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के लिए यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। हाइड्रोजन का उपयोग जब ईंधन के तौर पर होता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती, यह सिर्फ पानी की भाप छोड़ता है। अगर इस नई और सस्ती विधि को बड़े पैमाने पर लागू किया गया, तो हाइड्रोजन से चलने वाली कार और पावर प्लांट्स को चलाना बहुत सस्ता हो जाएगा। लोहे जैसे सस्ते धातु और रोशनी का उपयोग स्थिरता की दिशा में एक मील का पत्थर है। बता दें कि पूरी दुनिया में स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज युद्ध स्तर पर जारी है, और हाइड्रोजन को अक्सर भविष्य के सबसे स्वच्छ ईंधन के रूप में देखा जाता है। हालांकि, अभी तक हाइड्रोजन के उत्पादन की प्रक्रियाएं काफी महंगी और जटिल रही हैं, जिससे इसके व्यापक उपयोग में बाधा आ रही है। सुदामा/ईएमएस 21 अप्रैल 2026