—अदालत की टिप्पणी; अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी बताकर परंपरा का बचाव नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने धार्मिक प्रथाओं पर अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि किसी मूर्ति को छूने से ईश्वर अपवित्र कैसे हो सकते हैं और क्या केवल जन्म या वंश के आधार पर किसी भक्त को देवता के स्पर्श से वंचित किया जा सकता है। यह मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक भेदभाव से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि क्या संविधान ऐसे भक्तों के अधिकारों की रक्षा नहीं करेगा, जिन्हें परंपराओं के नाम पर रोका जाता है। मंदिर पक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता वी. गिरी ने दलील दी कि किसी भी मंदिर की पूजा-पद्धति उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होती है और उसे देवता की विशेषताओं के अनुरूप ही तय किया जाता है। उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, इसलिए मंदिर की परंपराएं भी उसी आधार पर निर्धारित की गई हैं। सबरीमामला मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है, जिसमें धार्मिक आस्था से जुड़े 66 अन्य मुद्दे भी शामिल हैं। गौरतलब है कि 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था। बाद में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा दिया, जिसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं। इस मामले की 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने भी परंपराओं के पक्ष में दलीलें दीं। सरकार का कहना है कि देश के कई मंदिरों में विशेष परिस्थितियों में पुरुषों के प्रवेश पर भी रोक है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। हिदायत/ईएमएस 21अप्रैल26