मध्य एशिया में छिड़े संघर्ष के परिणामस्वरूप पूरे विश्व में मंहगाई व बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। भारत में भी गैस व सिलेंडर के अभाव के कारण लगने वाली लंबी लंबी क़तारों के साथ ही हज़ारों छोटे व मध्यम उद्योगों के बंद होने के समाचार मिल रहे हैं। विभिन्न औद्योगिक नगरियों से कामगारों के ऐसे दर्दनाक दृश्य दिखाई दे रहे हैं जो कोरोना काल के समय हुये प्रवासियों के पलायन की याद दिला रहे हैं। परन्तु हमारे देश की सरकार व यहाँ के नेता इन वास्तविकताओं से मुंह मोड़कर हमेशा की तरह आज भी चुनावी मोड में हैं। प्रायः ऐसा देखा गया है कि चुनावी बेला में कुछ न कुछ ऐसा शगूफ़ा ज़रूर छोड़ा जाता है जो सत्ता के पक्ष में,चुनाव को प्रभावित करने,विपक्ष को बदनाम करने,चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने तथा सत्ता का दुरूपयोग करने वाला हो। परन्तु इन चुनावी महारथियों को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि चुनाव आयोग सहित अनेक संस्थाओं पर सत्ता ने अपनी पकड़ मज़बूत जो कर ली है ? देश ने पिछले दिनों एक ऐसा ही हाई प्रोफ़ाइल राजनैतिक ड्रामा देखा। केंद्र सरकार ने अचानक 16 से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुला लिया। सरकार की तरफ़ से पहले तो इस आपात सत्र को बुलाने के कारण को भी सांसदों से गुप्त रखा गया। फिर एन वक़्त पर बताया गया कि इस विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य महिला आरक्षण विधेयक जिसे वर्तमान सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम दिया है इसे जल्द लागू करने के लिए लोकसभा की सीटों का परिसीमन करना व इनकी संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने संबंधी संशोधन विधेयक पारित कराना है। सरकार का कहना है कि ऐसा करने से 2029 के आम चुनावों से पहले 33% महिला आरक्षण लागू हो सकेगा। यही बताकर लोकसभा में विगत 17 अप्रैल को 131 वां संविधान संशोधन विधेयक सरकार द्वारा पेश किया गया जो मतदान के बाद पारित नहीं हो सका। क्योंकि इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित होने के लिये लोकसभा में विशेष यानी दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत थी। गोया वर्तमान में लोकसभा में कुल 543 सदस्य हैं और कुल सदस्यों का सामान्य बहुमत लगभग 272 होता है जोकि सरकार के गठन के लिये तो पर्याप्त है परन्तु संविधान संशोधन के लिये उपस्थित और मतदान करने वालों सदस्यों में दो-तिहाई बहुमत के लिए सामान्यतः 362 या इससे अधिक वोट चाहिए। परन्तु चूँकि केवल 298 मत विधेयक के पक्ष में और 230 इस के विपक्ष में पड़े इसलिये यह विधेयक पारित नहीं हो सका। वैसे भी इतना महत्वपूर्ण विधेयक सदन की पटल पर लाने से पूर्व जिसपर परिसीमन को लेकर चर्चा की जाने थी, सत्ता पक्ष ने विपक्ष से बात करना,सर्वदलीय बैठक बुलाना या विपक्ष को विश्वास में लेना भी ज़रूरी नहीं समझा। अब इस नारी शक्ति वंदन नामक विधेयक के गिरने के बाद सत्ता ने एक बड़ा है हाई वोल्टेज ड्रामा शुरू किया जिस के तहत पहले तो प्रधानमंत्री ने कैबिनेट की बैठक में विधेयक गिरने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा और बाद में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन किया जो कि एक रुन्दन भरा व शत प्रतिशत चुनावी भाषण जैसा सम्बोधन था। जनता के टैक्स के पैसों से संचालित होने वाले दूरदर्शन,संसद टी वी व ऑल इंडिया रेडिओ जैसे चैनल्स पर इसे लाइव प्रसारित किया गया। जबकि सत्ता के गुणगान में लगे गोदी मीडिया के अधिकांश निजी चैनल्स ने भी इसे लाईव प्रसारित किया। यह संबोधन पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित, विपक्षी दलों को बदनाम करने,कई राज्यों में चल रहे चुनावों के बीच चुनाव को प्रभावित करने वाला तथा चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन था। सही मायने में सरकार की जितनी फ़ज़ीहत विधेयक के पारित न होने से हुई थी उससे कहीं ज़्यादा इस तथाकथित राष्ट्र संबोधन से हो गयी। 18 अप्रैल को राष्ट्र के नाम सम्बोधन के नाम पर दिये गये इस 29 मिनट के चुनावी भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन किया बल्कि अन्य कई विपक्षी दलों के अतिरिक्त 58 बार केवल कांग्रेस पार्टी का नाम लेकर उसे ख़ूब कोसा। इसके बाद देश के 700 से अधिक पूर्व नौकरशाहों व विशिष्ट लोगों ने भारतीय चुनाव आयोग को पत्र लिखकर शिकायत दर्ज कराई कि प्रधानमंत्री के प्रसारण में चुनाव अचार संहिता की धज्जियाँ उड़ाई गयीं और प्रधानमंत्री का भाषण चुनाव अचार संहिता का सरासर उल्लंघन है। क्योंकि चुनाव अचार संहिता के लागू होने के बावजूद सरकारी टी वी प्रसारण के द्वारा चुनाव प्रचार किया गया और पार्टी प्रोपेगैंडा करने के लिए सरकारी मास मीडिया प्लेटफ़ार्म का दुरूपयोग किया गया जोकि चुनाव नियमों का गंभीर उल्लंघन है। निश्चित रूप से देश के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जबकि किसी प्रधानमंत्री ने केवल विपक्ष को बदनाम करने व उसकी आलोचना करने के लिए राष्ट्र को संबोधित करने के बहाने इस तरह से सरकारी प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल किया हो। इसके बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने जिसतरह आंकड़ों व तथ्यों के साथ भाजपा को आइना दिखाना शुरू किया उससे तो भाजपाइयों के लेने के देने पड़ गये। ,सबसे पहले तो कांग्रेस ने कहा कि जो महिला आरक्षण विधेयक पहले ही संसद में पारित हो चुका है उसे पुनः पारित करने का अर्थ क्या है ? नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ये दरअसल महिला आरक्षण विधेयक नहीं है बल्कि भारत के वर्तमान चुनावी ढांचे को बदलने की साज़िश है। राहुल गांधी ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री महिला आरक्षण चाहते हैं तो 2023 का पारित हो चुका महिला विधेयक लायें और उसे आज ही लागू करें तो पूरा विपक्ष समर्थन देगा। साथ ही इस विधेयक के गिरने के बाद महिलाओं की हमदर्दी में घड़ियाली आंसू बहाने व विपक्ष पर ही हमलावर होने वाली भाजपा से इसी विपक्ष ने ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए जिसका भाजपा के लफ़्फ़ाज़ी नेताओं के पास कोई जवाब नहीं। महिला आरक्षण के इन स्वयंभू सत्ताधारी हमदर्दों से विपक्ष ने यह भी पूछा कि सबसे ज़्यादा सांसद होने के बाद भी बीजेपी की महिला सांसदों की संख्या का अनुपात अन्य राजनैतिक दलों की तुलना में सबसे कम क्यों है ? ग़ौरतलब है कि वर्तमान लोकसभा में बीजेपी के 240 लोकसभा सांसदों में केवल 31 महिलाएं हैं अर्थात उनकी संख्या मात्र 12.90% है। जबकि कांग्रेस के 98 सांसदों में 14 यानी 14.30% इसी प्रकार टीएमसी के 29 में 11 महिला सांसद यानी 37.90% महिलाएं हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी में भी 37 में 5 यानी 13.50% महिला सांसद हैं। इसके साथ ही कांग्रेस ने भाजपा का यह चिट्ठा भी खोलकर रख दिया कि भाजपा के शासन में यहाँ तक कि स्वयं अनेक भाजपा नेताओं द्वारा नारियों का किस तरह शोषण व अपमान किया गया है व किया जा रहा है। इसलिये यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नारी शक्ति वंदन विधेयक के गिरने पर प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम रुन्दन भरा संबोधन कोरी राजनीति,आचार संहिता का उल्लंघन ,जनता के टैक्स के पैसों का दुरूपयोग और भाजपा की हताशा के सिवा और कुछ नहीं था। ईएमएस / 22 अप्रैल 26