सदगुरु देव महात्मा सुशील कुमार जी के 24वें महानिर्वाण दिवस पर अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि) भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी एक सूत्र में सजीव होकर हमारे सामने खड़ी होती है,तो वह है गुरु-शिष्य परंपरा -एक ऐसी दिव्य धारा,जिसमें ज्ञान केवल शब्दों के माध्यम से नहीं,बल्कि चेतना के स्पंदन से प्रवाहित होता है।यह वह सेतु है,जो जीव को शिव से,आत्मा को परमात्मा से और सीमित को असीम से जोड़ता है।जब शिष्य अपने भीतर के अहंकार,संदेह और द्वंद्व को त्यागकर पूर्ण समर्पण की अवस्था में पहुँचता है,तब गुरु उसके लिए केवल पथप्रदर्शक नहीं रहते,वे स्वयं पथ बन जाते हैं,वे मंज़िल बन जाते हैं और साधना का साक्षात स्वरूप बन जाते हैं।ऐसे ही परम करुणामयी,त्रिकालदर्शी और कृपालु सद्गुरु महात्मा सुशील कुमार जी का सान्निध्य मेरे जीवन का वह अमूल्य अध्याय है,जिसे शब्दों में समेटना संभव नहीं,और जिनके साथ माँ विजया जी का ममतामयी साया उस आध्यात्मिक अनुभव को पूर्णता प्रदान करता है। सद्गुरु का स्मरण केवल एक श्रद्धांजलि नहीं,बल्कि आत्मा का अपने स्रोत से पुनः जुड़ने का प्रयास है।अप्रैल का यह पावन कालखंड हर वर्ष मेरे भीतर एक गहरी हलचल उत्पन्न करता है। 23 और 24 अप्रैल की वह मध्यरात्रि केवल एक तिथि नहीं,बल्कि एक दिव्य परिवर्तन का क्षण है-जब सद्गुरुदेव ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर स्वयं को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त कर लिया। वह वियोग का क्षण था,पर उसी वियोग में एक ऐसा विराट मिलन छिपा था,जो आज भी हर साधक के हृदय में स्पंदित होता है।एक सीमित देह से असीम चेतना में विलीन होने की यह प्रक्रिया हमें यह सिखाती है कि गुरु कभी दूर नहीं होते,वे केवल अपने स्वरूप को विस्तार देते हैं। विरह सामान्यतः मन को तोड़ देता है,लेकिन सद्गुरु के संदर्भ में यही विरह साधना का रूप ले लेता है। यह पीड़ा नहीं रह जाती,यह एक ऐसी तपस्या बन जाती है,जिसमें शिष्य भीतर से परिष्कृत होता है। यह विरह हमें भीतर झाँकने के लिए विवश करता है,हमें हमारी सीमाओं का बोध कराता है और हमें यह सिखाता है कि सच्चा समर्पण क्या होता है।जब शिष्य इस अवस्था में पहुँचता है,तब उसे यह अनुभव होता है कि गुरु कहीं बाहर नहीं, बल्कि उसके अपने अंतर्मन में विराजमान हैं।सद्गुरु का सान्निध्य केवल एक उपस्थिति नहीं होता,वह एक अनुभव होता है-ऐसा अनुभव, जिसमें शब्दों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।उनकी दृष्टि में वह शक्ति थी,जो शिष्य के भीतर छिपे हर भाव को पढ़ लेती थी; उनके स्पर्श में वह करुणा थी, जो कठोर से कठोर हृदय को भी द्रवित कर देती थी;और उनकी वाणी में वह सत्य था,जो सीधे आत्मा तक पहुँच जाता था।उनके पास बैठकर ऐसा प्रतीत होता था मानो समय ठहर गया हो और जीवन अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो रहा हो।मेरे जीवन की अनेक स्मृतियाँ आज भी उसी दिव्य प्रकाश से आलोकित हैं,जो मुझे सद्गुरु के सान्निध्य में प्राप्त हुआ। उन स्मृतियों में एक प्रसंग ऐसा है, जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी।8 जून 2001 का वह दिन,जब गुरुग्राम में सद्गुरुदेव और माँ विजया जी का प्रवास था,मेरे लिए केवल एक तिथि नहीं,बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण का आरंभ था।संयोग से वह मेरा जन्मदिन भी था और मेरे मन में एक बालसुलभ आकांक्षा थी कि उस दिन मुझे सद्गुरु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त हो।मैं नोएडा के सेक्टर-18 से तीन बेंत की छड़ियाँ लेकर आया और उन्हें सजाकर चुपचाप सद्गुरु के आसन पर अर्पित कर दिया।उस समय यह केवल एक साधारण अर्पण था, लेकिन मुझे यह आभास नहीं था कि यही क्षण मेरे भीतर छिपे अहंकार को उजागर करने का माध्यम बनेगा।संध्या के सत्संग में जब सद्गुरुदेव की दृष्टि मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया, तो मन में श्रद्धा और उत्साह का संचार हुआ।उन्होंने प्रसाद स्वरूप अभिमंत्रित लौंग देने का संकेत किया,किंतु अज्ञानवश मैंने उसे लेने से मना कर दिया।यह एक क्षणिक प्रतिक्रिया थी,पर उसमें मेरे भीतर का सूक्ष्म अहंकार छिपा हुआ था।अगले ही क्षण उनका स्वर कठोर हुआ और उन्होंने मेरी हथेलियों पर छड़ी से प्रहार किया। वह दृश्य बाहर से दंड का प्रतीत होता था,लेकिन भीतर से वह अन्नत कृपा का महासागर था।उसी क्षण मैंने अनुभव किया कि गुरु का दंड भी उतना ही पवित्र होता है,जितना उनका आशीर्वाद।वह दंड मेरे अहंकार का शोधन था,मेरे भीतर के अज्ञान का परिमार्जन था।फिर जो हुआ,वह आज भी मेरी आत्मा को भाव-विभोर कर देता है।वही सद्गुरु,जिनकी वाणी में अभी कठोरता थी,अगले ही पल मुझे अपने समीप खींचकर मेरी हथेलियों को सहलाने लगे।उनकी करुणा भरी वाणी—“मेरे बच्चे को कितना दर्द हो रहा होगा” -आज भी मेरे हृदय में गूँजती है। उस क्षण मैंने जाना कि गुरु का हर व्यवहार केवल शिष्य के कल्याण के लिए होता है। सदगुरूदेव -माँ विजया जी का वात्सल्य उस अनुभव को और भी पूर्ण बना देता है।उनका स्नेह,उनका अपनापन और उनकी करुणा शिष्य के भीतर एक ऐसी शांति का संचार करते हैं, जो शब्दों से परे है।सद्गुरुदेव का अपने हाथों से केले खिलाना उस दिन मेरे लिए केवल एक प्रसाद नहीं था, वह एक ऐसा आशीर्वाद था,जिसमें पिता का स्नेह,माँ का वात्सल्य और ईश्वर की कृपा एक साथ समाहित थी।उस दिन मैंने समझा कि गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं होते,वे जीवन को गढ़ने वाले शिल्पकार होते हैं।वे शिष्य को भीतर से तोड़ते हैं,ताकि एक नई चेतना का निर्माण हो सके। उनका हर स्पर्श,हर दृष्टि और हर वचन एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है,जिसे समझ पाना सामान्य बुद्धि के परे है, लेकिन अनुभव किया जा सकता है।आज,जब महानिर्वाण का यह 24वाँ वर्ष हमारे सामने है,तो यह अनुभूति और भी गहरी हो जाती है कि सद्गुरुदेव कहीं गए नहीं हैं।वे हर उस श्वास में हैं,जो श्रद्धा से भरी है; हर उस कर्म में हैं।जो समर्पण से किया जाता है,हर उस विचार में हैं,जो सेवा और करुणा से ओत- प्रोत है।समस्त इस्सयोगी साधकों के लिए यह दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं,बल्कि आत्मिक जागरण का पर्व है।भले ही हम भौतिक रूप से एक स्थान पर एकत्र न हो सकें,लेकिन हमारे हृदय, हमारी भावनाएँ और हमारी श्रद्धा हमें एक सूत्र में बाँध देती हैं।हर साधक का मन आज उसी गुरुधाम में उपस्थित है,जहाँ से उसे जीवन का वास्तविक अर्थ मिला। सद्गुरुदेव ने हमें जो सबसे बड़ा संदेश दिया,वह है-सेवा,साधना और समर्पण का मार्ग।उन्होंने सिखाया कि आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं होती,वह जीवन जीने की एक शैली होती है।जब हम हर कर्म को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं,जब हम हर क्षण को साधना बना लेते हैं और जब हम हर संबंध में सेवा का भाव रखते हैं,तब हम वास्तव में उस मार्ग पर चल रहे होते हैं,जिसे सद्गुरु ने हमारे लिए निर्धारित किया है।आज भी उनके शब्द हमारे भीतर गूँजते हैं-माँगना ही है तो संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं को क्यों माँगें,अगर माँगना है,तो सद्गुरु को माँगें,क्योंकि जब गुरु मिल जाते हैं,तो सब कुछ अपने आप मिल जाता है। यह केवल एक वाक्य नहीं,बल्कि जीवन का सार है,जो हमें हर क्षण सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।अश्रुपूरित नेत्रों और कृतज्ञ हृदय से,इस पावन अवसर पर मैं अपने सद्गुरुदेव को नमन करते हुए केवल इतना ही कह पाता हूँ - “इन हथेलियों पर जो छड़ी के निशान आपने दिए थे, वो केवल पीड़ा नहीं,मेरे जीवन की पहचान बन गए।मैं अंजान रहा आपकी महिमा से,आप पल में ब्रह्म का ज्ञान दे गए।”वह “पगला” आज भी उसी स्नेह, उसी स्मृति और उसी कृपा की छाया में जीवन के शेष पल जी रहा है।समय बदलता है,परिस्थितियाँ बदलती हैं,लेकिन सद्गुरु का सान्निध्य कभी समाप्त नहीं होता।वह हर उस हृदय में जीवित रहता है,जो श्रद्धा से भरा है और हर उस जीवन में प्रकट होता है,जो समर्पण के मार्ग पर अग्रसर है।हे सद्गुरुदेव! जब आप ही सब कुछ हैं,तो फिर और क्या माँगें? आप ही पथ हैं,आप ही पथिक हैं, आप ही मंज़िल हैं।आप ही श्रद्धा , आप ही साधना है।जहाँ समर्पित साधकों की विरह वेदना ही वंदना बन जाए,वहीं आपकी दिव्य उपस्थिति का दर्शन हो जाती है। सद्गुरुदेव-माँ जी के युगल श्री चरणों कोटि-कोटि नमन, (तकियावाला’स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार) .../ 22 अप्रैल /2026