वॉशिंगटन (ईएमएस)। वर्तमान वैश्विक हालात और विशेषकर भू-राजनीतिक तनावों के कारण आर्थिक मंदी के खतरे की आशंका बढ़ती जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का डेटा दिखा रहा है कि अमेरिका-ईरान जैसे भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण तेल आपूर्ति को जो नुकसान पहुंचा है, वह इस स्टैगफ्लेशन का कारण बन सकता है। मौजूदा हालात में सबसे बड़ा दबाव ऊर्जा कीमतों से आ रहा है। तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा के खर्च सब बढ़ जाते हैं। यह एक क्लासिक चेन रिएक्शन है, जहां तेल की कीमतें बढ़ते ही महंगाई ऊपर जाती है और साथ ही खर्च कम होने से मांग घटती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर पड़ता है। ग्लोबल डेटा भी इस संकट के शुरुआती संकेत दे रहा है। आगामी पीएमआई डेटा (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) से पता चलेगा कि यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं जैसे जर्मनी, फ्रांस और यूके में आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ सकती हैं, जबकि अमेरिका अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह साफ संकेत होगा कि दुनिया स्टैगफ्लेशन जैसे दौर में प्रवेश कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने साफ कहा है कि इस संकट का असर पहले ही अर्थव्यवस्था में शामिल हो चुका है। उनके मुताबिक, भले ही युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, लेकिन इसका आर्थिक झटका लंबे समय तक बना रहेगा। उन्होंने इसे स्थायी अनिश्चितता का दौर बताया, जहां नीति-निर्माण और भी मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। यदि वे आर्थिक वृद्धि को बचाने के लिए ब्याज दरें घटाते हैं, तो महंगाई और बढ़ सकती है। वहीं, अगर महंगाई काबू करने के लिए दरें बढ़ाई जाती हैं, तो आर्थिक गतिविधियां और धीमी हो सकती हैं। यही दुविधा इस पूरे संकट को और जटिल बना रही है। स्टैगफ्लेशन आखिरी बार बड़े स्तर पर 1970 के दशक में देखा गया था, जब तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया था। अब एक बार फिर वही हालात बनते नजर आ रहे हैं। आने वाले समय में पीएमआई डेटा, महंगाई के आंकड़े और उपभोक्ताओं का व्यवहार सबसे अहम संकेत होंगे, जिनसे साफ होगा कि हालात कितने बिगड़ सकते हैं। कुल मिलाकर, धीमी वृद्धि, उच्च महंगाई और अनिश्चितता का यह मिश्रण आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। मालूम हो कि दुनिया एक ऐसी आर्थिक चुनौती की ओर बढ़ रही है, जहां महंगाई और मंदी एक साथ दस्तक दे सकती हैं। इस स्थिति को स्टैगफ्लेशन कहते हैं, यानी जब वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ रहे हों (मुद्रास्फीति), लेकिन लोगों के पास खरीदने की सामर्थ्य न हो और आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ जाएं (मंदी)। यह किसी भी केंद्रीय बैंक या सरकार के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा करती है, क्योंकि दोनों समस्याओं से एक साथ निपटना बेहद मुश्किल हो जाता है। सुदामा/ईएमएस 23 अप्रैल 2026