अपने ही देश के संविधान पर ट्रंप ने उठाए गंभीर सवाल वॉशिंगटन,(ईएमएस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर देश की चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए तीखा बयान दिया है। उन्होंने मौजूदा चुनावी व्यवस्था को धांधली से भरा और दुनिया भर में मजाक करार देते हुए इसमें आमूल-चूल परिवर्तन की वकालत की है। ट्रंप के इस रुख ने मिडटर्म इलेक्शन (मध्यावधि चुनाव) से ठीक पहले अमेरिका में चुनाव सुधारों को लेकर एक नई और गरमागरम बहस छेड़ दी है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर रिपब्लिकन नेताओं को संबोधित करते हुए ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि चुनाव प्रणाली में तुरंत सुधार नहीं किया गया, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। इस दिशा में ट्रंप ने सेव अमेरिका एक्ट नामक एक व्यापक चुनाव सुधार कानून को लागू करने की पुरजोर मांग की है। इस प्रस्तावित कानून के तहत उन्होंने तीन मुख्य बदलावों पर जोर दिया है: पहला- प्रत्येक मतदाता के लिए पहचान पत्र (वोटर आईडी) दिखाना अनिवार्य हो, दूसरा- मतदान से पूर्व नागरिकता का ठोस प्रमाण देना जरूरी किया जाए और तीसरा- मेल-इन बैलेट यानी डाक के माध्यम से होने वाली वोटिंग के सिस्टम को लगभग पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। ट्रंप का सुझाव है कि डाक मतपत्रों की अनुमति केवल बीमारी, विकलांगता, सेना में तैनाती या अपरिहार्य यात्रा जैसी विशिष्ट परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए। ट्रंप ने इससे पहले 31 मार्च को एक कार्यकारी आदेश पर भी हस्ताक्षर किए थे, जिसका उद्देश्य राज्यों में केवल सत्यापित मतदाताओं को ही डाक मतपत्र भेजना और योग्य नागरिकों की सटीक सूची तैयार करना था। हालांकि, इन कदमों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव विशेषज्ञों और डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे असंवैधानिक बताते हुए अदालत में चुनौती दी है। विरोधियों का तर्क है कि यह मतदाताओं के अधिकारों का हनन है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में भी राष्ट्रपति के ऐसे ही एक आदेश को संघीय अदालतों ने यह कहते हुए रोक दिया था कि राष्ट्रपति को सीधे चुनावी नीतियां तय करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। फिलहाल, सेव अमेरिका एक्ट अमेरिकी संसद में फंसा हुआ है। डेमोक्रेटिक पार्टी के कड़े विरोध और सीनेट की जटिल फिलिबस्टर प्रक्रिया के कारण इस कानून का पास होना चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। ट्रंप जहां इसे चुनावी शुचिता के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे वोटिंग प्रक्रिया को कठिन बनाने की एक राजनीतिक चाल मान रहे हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/28अप्रैल2026 ---------------------------------