सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े भेदभाव पर दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं। बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को “खोखला” नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि इसी पृष्ठभूमि से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 बने हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध भेदभावपूर्ण है और यह उनके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने पहले महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी थी और अदालत के इस फैसले पर कोई स्थगन आदेश नहीं है, फिर भी प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। वकील जयसिंह ने सवाल उठाया कि क्या धर्म का अधिकार संविधान में दिए गए समानता के अधिकारों से ऊपर हो सकता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों को धर्म के नाम पर सीमित नहीं किया जा सकता। इस पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा के दौरान कहा गया कि धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन जरुरी है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि शीर्ष अदालत को यह देखना होगा कि क्या धार्मिक पहचान की रक्षा करते हुए संवैधानिक अधिकारों को पूरी तरह निष्प्रभावी कर सकते है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुद्दा उठा कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक क्या समानता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। अधिवक्ता ने कहा कि यह प्रावधान महिलाओं के जीवन के बड़े हिस्से को प्रभावित करता है और इस रोक को भेदभाव माना जाना चाहिए। वहीं, अदालत ने कहा कि किसी महिला को उसकी जाति के कारण प्रवेश से रोका नहीं गया है, बल्कि यह प्रतिबंध आयु और परंपरा से जुड़ा हुआ है। वहीं सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने दलील दी कि देश के कई मंदिरों में परंपरागत नियम लागू हैं, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान होना चाहिए। यह मामला पहले से ही देशभर में बहस का विषय बना हुआ है, और अदालत की टिप्पणियों ने एक बार फिर धर्म, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस को तेज कर दिया है। आशीष दुबे / 29 अप्रैल 2026