चैन्नई,(ईएमएस)। तमिलनाडु की सियासत में इस वक्त बहुत तेजी से उथल पुथल चल रही है। इसी बीच डीएमके ने थलापति विजय को बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया है। इससे डीएमके ने एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया है। एक तो टीवीके की सबसे ज्यादा सीटें हैं और दूसरा थलापति विजय की लोकप्रियता है। ऐसे में यदि डीएमके बाहर से समर्थन कर सरकार बनवाती है तो इससे आम जनता और टीवीके दोनों के बीच पार्टी की मजबूत पकड़ बन सकेगी। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण राज्य में सत्ता गठन को लेकर सस्पेंस लगातार गहराता जा रहा है। इसी बीच एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके ने एक ऐसा राजनीतिक संकेत दिया है, जिसने चेन्नई से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। डीएमके की सात मई को हुई विधायक दल की बैठक में पारित किए गए रिजॉल्यूशन 3 को अब सत्ता की एक नई और दूरगामी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या डीएमके अब अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) को बाहर से समर्थन देकर नई सरकार बनवाने की तैयारी कर रही है। डीएमके के इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव में कहा गया है कि राज्य की मौजूदा जटिल और गंभीर राजनीतिक स्थिति को देखते हुए पार्टी अध्यक्ष एमके स्टालिन को सभी जरूरी फैसले लेने का पूरा अधिकार दिया जाता है। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके शब्दों में छिपे संकेत बेहद अहम हैं। प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि तमिलनाडु की जनता एक और चुनाव के बोझ के लिए तैयार नहीं है और राज्य में एक स्थिर सरकार का गठन होना अनिवार्य है। इसी पंक्ति ने उन अटकलों को हवा दी है कि डीएमके अब सीधे सत्ता की बागडोर संभालने के बजाय किंगमेकर की भूमिका निभाने का मन बना चुकी है। वर्तमान स्थिति यह है कि विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन उसके पास बहुमत के लिए आवश्यक 118 सीटें नहीं हैं। कांग्रेस का समर्थन मिलने के बावजूद वह जादुई आंकड़े से दूर है। ऐसे में स्टालिन का बाहर से समर्थन देना विजय के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। इस रणनीति से डीएमके को दोहरे फायदे मिलने की उम्मीद है। पहला यह कि वह सरकार का हिस्सा बने बिना अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं और द्रविड़ मॉडल को सुरक्षित रख सकेगी। दूसरा, वह विपक्ष में बैठकर सरकार पर अंकुश भी लगा सकेगी। साथ ही, डीएमके का यह कदम सांप्रदायिक ताकतों को राज्य की सत्ता से दूर रखने और भाजपा की किसी भी संभावित बैकडोर एंट्री को रोकने की एक बड़ी कवायद माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, क्योंकि डीएमके ने गठबंधन में ईमानदारी की कमी का हवाला देते हुए अपने पुराने सहयोगी के प्रति कड़े तेवर दिखाए हैं। अब देखना यह होगा कि स्टालिन का यह नया राजनीतिक मॉडल तमिलनाडु को कितनी स्थिरता प्रदान करता है। वीरेंद्र/ईएमएस/08मई 2026