लेख
09-May-2026
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10 मई क्रांति दिवस) महानगर रुड़की का भू भाग चुका सुनहरा गांव में मौजूद ऐतिहासिक वट वृक्ष ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म का आज भी साक्षी बना हुआ है। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने वाले 152 क्रांतिकारियों को एक ही दिन में इस वट वृक्ष पर सरेआम लटकाकर फांसी दे दी गई थी। सन 1857 की क्रांति को भले ही देश की आजादी की पहली क्रांति कहा जाता हो, लेकिन अंग्रेजी शासन के समय के गजेटियर के मुताबिक रुड़की में इस क्रांति की ज्वाला सन 1822 में ही भड़क गई थी और जब हालात असहनीय हो गए तो अक्तूबर सन 1824 को कुंजा ताल्लुका में राजा विजय सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध हुआ था। इस दौरान अंग्रेजों को भारी क्षति भी उठानी पड़ी थी। जिससे गुस्साए अंग्रेजों के कोपभाजन का शिकार हुए 152 स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।सन 1822 से क्रांति का बिगुल बजना शुरू हुआ तो ब्रिटिश हुकूमत में खलबली मच गई थी।आजादी के मतवालों को सबक सिखाने के लिए अंग्रेजों ने इलाके में कत्लेआम का तांडव मचाया था। इसके बाद रुड़की के तत्कालीन ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट सर राबर्ट्सन ने 10 मई 1857 को रामपुर, कुंजा, मतलबपुर आदि गांवों के 152 ग्रामीण आंदोलनकारियों को पकड़कर इस पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटका दिया था। यह ऐतिहासिक वट वृक्ष 500 साल से अधिक समय से ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म का साक्षी बनकर खड़ा हुआ है। स्थानीय लोगों की पहल के बाद वट वृक्ष को शहीद स्मारक के रूप में स्थापित किया गया है, जो स्वतंत्रता संग्राम में रुड़की के शौर्य का प्रतीक है। ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि ब्रिटिश हुकूमत के खौफ के चलते आसपास के लोग गांव छोड़कर चले गए थे। सन 1910 में स्वतंत्रता सेनानी स्व. ललिता प्रसाद ने इस वटवृक्ष के आसपास की जमीन को खरीदकर इसे आबाद किया था। उसके बाद यहां मंत्राचरणपुर गांव बसाया गया, जो बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया है।इस ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम की पावन स्थली पर शहीदों को नमन करने के लिए एक कमेटी का गठन भी किया गया था। शहीदी यादगार कमेटी ने वटवृक्ष के नीचे शहीद हुए आजादी के दीवानों की याद में 10 मई 1957 को स्वतंत्र भारत में पहली बार विशाल सभा तत्कालीन एसडीएम बीएस जुमेल की अध्यक्षता में हुई थी। जिसमें शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई थी। ब्रिटिश हुकूमत ने सामुहिक फांसी का कदम इसलिए उठाया था ताकि रुड़की के लोग भयभीत हो जाएं और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सकें, जिससे आसानी से रुड़की और सहारनपुर में मौजूद छावनी से ब्रिटिश फौज को दूसरी जगह भेजा जा सके।सन 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब तक इस पेड़ पर लोहे के कुंडे एवं जंजीरें लटकी हुई थीं,जो बाद में धीरे धीरे गायब हो गई। हालांकि जंजीरों के निशान पेड़ की टहनियों पर बाद तक भी मौजूद रहे। यह वटवृक्ष आजादी के आंदोलन व शहीदों के बलिदान का मंदिर बन गया है। लेकिन बदलते दौर में यह वटवृक्ष उपेक्षा की भेंट चढ़ता जा रहा है। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते ऐतिहासिक वट वृक्ष जिसका सौन्द्रियकण उत्तराखंड सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार के समय कराया गया,के आसपास का क्षेत्र केएल पालीटेक्निक का छात्रावास परिसर होने के कारण यह शहीद स्मारक घोर उपेक्षा का शिकार है।पालीटेक्निक प्रबंधन द्वारा मुख्य द्वार पर ताला जड़ देने के कारण लोग चाहकर भी शहीद स्मारक तक नही पहुंच पाते है,वही शहीद स्मारक के आसपास की भूमि पर तारबाड़ कर देने से भी शहीद स्मारक का रास्ता संकीर्ण हो गया है।साथ ही शहीद स्मारक स्थल पर भी लोगो ने धर्म की आड़ में नाजायज कब्जे कर लिए है।स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार के लोग हर माह के प्रथम रविवार को दस बजे दस मिनट अपने पूर्वजो के नाम कार्यक्रम करके शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते है,उन्हें भी शहीद स्मारक तक पहुंचने में परिसर पर ताला लगा होने के कारण भारी परेशानी होती है।जिसे लेकर कई बार प्रशासनिक स्तर पर भी स्वतंत्रता सेनानी परिवारों द्वारा शिकायत की गई।स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी कांग्रेस प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र सैनी ने उक्त शहीद स्मारक को अतिक्रमण मुक्त कराने व इसके द्वार नियमो के मुताबिक 24 घण्टे खुले रखने व तार बाड हटाने की मांग की है।वही ज्वाइंट मजिस्ट्रेट से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक शिकायत उक्त बाबत शिकायत की गई है, लेकिन यह शिकायत भी नोकरशाही की भेंट चढ़ गई है। हालांकि पिछले दिनों रुड़की के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र सेट ने शहीद स्थल का दौरा कर यहां के हालात जाने है। (लेखक अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के भांजे एवं वरिष्ठ पत्रकार है) .../ 9 मई /2026