लेख
09-May-2026
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भारतीय पौराणिक कथाओं में भस्मासुर की कथा केवल श‎‎क्ति के मद की कथा है, ‎जिसमें व्य‎‎क्ति ‎विवेक को खो देता है। सत्ता, अहंकार और विवेक के संतुलन का गहरा संदेश भस्मासुर की कथा है। कथा के अनुसार भगवान शिव ने तपस्या से प्रसन्न होकर भस्मासुर को वरदान दिया। वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। वरदान से शक्ति प्राप्त करते ही भस्मासुर वरदान की शक्ति के मद में इतना अंधा हो गया, उसने अपने ही आराध्य देव शिव पर ही हाथ रखने का प्रयास किया। अंततः भगवान ‎शिव को अपने ही ‎दिये गए वरदान के कारण भागना पड़ा। उन्हें बचाने के ‎लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर को स्वयं के विनाश की ओर प्रेरित किया। यह कथा आज के लोकतांत्रिक भारत के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी है। जहां जनता अपने आपको ढगा महसूस कर रही है। लोकतंत्र में जनता ही वास्तविक शक्ति का स्रोत है। जनता अपने मत के माध्यम से किसी सरकार को सत्ता का “वरदान” देती है। 2014 के बाद भारत में स्थापित वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, जनता की व्यापक आशाओं, बदलाव की इच्छा और विकास के वादों के आधार पर जनता के वरदान से सत्ता में आई। प्रारंभिक वर्षों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्ती, मजबूत नेतृत्व और आर्थिक सुधारों के दावों ने लोगों में सरकार के प्र‎ति नया विश्वास पैदा किया। समय बीतने के साथ समाज के एक बड़े वर्ग में यह भावना विकसित हुई है। सत्ता पूंजीप‎तियों के ‎हित में काम कर रही है। जनता के बीच में सरकार की दूरी बढ़ती जा रही है। आज देश में बढ़ती महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। बेरोजगारी युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें महंगी होती जा रही हैं, आम जनता कर्ज के बोझ से दबती जा रही है। जबकि दूसरी ओर बड़े उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को मिलने वाली सुविधाएं बढ़ती चली जा रही है। यह धारणा मजबूत हुई है कि आर्थिक नीतियों का लाभ समाज के ऊपरी वर्ग तक अधिक सीमित हो रहा है, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग 2 वक्त के भोजन के ‎लिये संघर्षरत है। गरीबों पर टेक्स बढ़ता जा रहा है। अमीरों के टेक्स घटाये जा रहे हैं। गरीबों के ‎लिये अलग ‎नियम और कानून है। अमीरों के ‎लिये अलग कानून है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत समानता और समान न्याय का ‎सिद्धांत है। जब समाज में यह भावना जन्म लेने लगे, गरीबों और अमीरों के लिए कानून और न्याय की व्यवस्था अलग-अलग तरीके से काम कर रही है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। सत्ता यदि गरीबों की नहीं सुनती है, बल्कि जनता को भार समझने लगे, संवैधा‎निक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठने लगे। आम नागरिक स्वयं को असहाय महसूस करने लगे, तो यह स्थिति चिंताजनक हो जाती है। वर्तमान स्थिति में भस्मासुर की कथा एक ज्ञान के रूप में सामने आती है। जनता द्वारा दी गई शक्ति से बनी सरकार यदि जनता के हितों से दूर जाकर, ‎निजी स्वार्थ और सत्ता संरक्षण, प्रचार और चुनिंदा लोगों के हित में केंद्रित हो जाए, तो वही शक्ति अंततः विश्वास को कमजोर कर सकती है, जो अंत का कारण बनता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में ही होता है। चुनाव, जनमत और लोकतांत्रिक संस्थाएं वही “मोहिनी” हैं, जो सत्ता में बैठे लोगों में अहंकार और असीमित सत्ता के मद में झोंककर भस्मासुर की तरह उनका अंत करने का कारण बनती है। भारत का लोकतंत्र केवल सरकारों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों से मजबूत होता है। आवश्यक है, जनता सरकार से प्रश्न पूछे, सरकार को उसके कर्तव्य के प्र‎ति जवाबदेह बनाये। सत्ता में बैठे लोग यह याद रखें कि लोकतंत्र में जनता द्वारा दिया गया हर “वरदान” स्थायी नहीं होता। जनता जब चाहती है, वही शक्ति परिवर्तन का माध्यम भी बन जाती है। जनता का स्वरुप भीड़ में है। भीड़ में ज्ञान नहीं होता है। भीड़ समूह की श‎‎क्ति है, ‎जिसकी ताकत असी‎मित होती है। कोई भी सेना, सरकार, पु‎लिस, न्यायपा‎लिका इस भीड़ का मुकाबला नहीं कर सकती है। आम जनता की इस ताकत को सरकार और कार्यपा‎लिका में बैठे लोग समझें। सत्ता के मद में मदहोश सत्ताधीशों ने इस वास्त‎विकता को नहीं समझा, तो भस्मासुर की तरह वह स्वयं का अंत कर बैठेंगे। एसजे/ 9 मई /2026