राज्य
09-May-2026
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- संक्रमण से 5 मौतों के बाद वन विभाग पर उठे सवाल जबलपुर (ईएमएस)। महाकौशल क्षेत्र और जबलपुर के पर्यटन की रीढ़ माने जाने वाले कान्हा नेशनल पार्क से लगातार आ रही बाघों की मौत की खबरों ने वन्यजीव प्रेमियों के साथ पर्यटन कारोबार से जुड़े लोगों की भी चिंता बढ़ा दी है। देश-विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करने वाला कान्हा इन दिनों एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत को लेकर चर्चा में है। महज 9 दिनों के भीतर पूरी बाघ फैमिली खत्म होने से पार्क प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच एक और चर्चित नर बाघ ‘डिगडोला’ की मौत ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। लगातार हो रही घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की सुरक्षा और स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है। संक्रमण बना मौत की वजह … कान्हा प्रबंधन के अनुसार बाघिन और उसके चार शावकों की मौत खतरनाक संक्रमण के कारण हुई है। अधिकारियों का कहना है कि यह वायरस सामान्य तौर पर श्वानों और बिल्लियों में पाया जाता है और संभवतः उसी संक्रमण ने बाघ परिवार को अपनी चपेट में लिया। वन अधिकारियों का तर्क है कि इस तरह के संक्रमण के मामले पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आ चुके हैं। हालांकि लगातार हो रही घटनाओं ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कान्हा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर प्रकाश कुमार वर्मा ने बताया कि संक्रमण की पुष्टि के बाद पार्क क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है। गश्ती दल सक्रिय किए गए हैं और हाथियों की मदद से जंगल क्षेत्रों में लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि नर बाघ ‘डिगडोला’ की मौत संभवतः आपसी संघर्ष के कारण हुई है और उसमें संक्रमण की आशंका कम है। पर्यटकों और गाइडों में नाराजगी … कान्हा में लगातार बाघों की मौत की खबरों से पर्यटकों और स्थानीय गाइडों में भी नाराजगी बढ़ रही है। वर्षों से पार्क में काम कर रहे गाइडों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में हो रही मौतों को केवल संयोग नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो कान्हा की पहचान और वहां का पारिस्थितिक संतुलन दोनों खतरे में पड़ सकते हैं। गाइडों के मुताबिक बीते तीन महीनों में ही छह बाघों की मौत हो चुकी है और हर बार अलग-अलग कारण सामने आ रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि टाइगर रिजर्व के आसपास रहने वाले पालतू जानवरों की स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि कई संक्रमण घरेलू जानवरों से वन्यजीवों तक पहुंच सकते हैं। मध्य प्रदेश में बढ़ता जा रहा मौत का आंकड़ा … मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या भले लगातार बढ़ी हो, लेकिन मौतों का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ रहा है। राज्य में वर्ष 2022 की गणना के अनुसार 785 बाघ दर्ज किए गए थे, जो देश में सबसे अधिक हैं। लेकिन दूसरी तरफ बाघों की मौत के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में प्रदेश में 34 बाघों की मौत हुई थी। यह संख्या 2022 में बढ़कर 43 हो गई। वर्ष 2023 में 45 और 2024 में 46 बाघों की मौत दर्ज की गई। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 55 तक पहुंच गया। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2026 में अप्रैल तक ही 27 बाघों की मौत हो चुकी है। अगर यही स्थिति बनी रही तो इस साल पुराने रिकॉर्ड टूट सकते हैं। संरक्षण पर उठ रहे बड़े सवाल … वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि टाइगर रिजर्व में केवल बाघों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। लगातार हो रही मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जंगलों में संक्रमण रोकने और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए मौजूदा व्यवस्थाएं पर्याप्त हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और सतपुड़ा जैसे बड़े टाइगर रिजर्व में नियमित मेडिकल मॉनिटरिंग, संक्रमण नियंत्रण और फील्ड स्टाफ की संख्या बढ़ाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। सुनील साहू / शहबाज / 09 मई 2026