पूर्व सीएम स्टालिन ने दावों पर उठाए सवाल चेन्नई (ईएमएस)। तमिलनाडु में ऐतिहासिक जीत के साथ सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री विजय थलापति पहले दिन से ही चुनौतियों और आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं। शपथ ग्रहण समारोह में वंदे मातरम् को लेकर उठे विवाद के बाद, दूसरा और बड़ा मुद्दा राज्य की आर्थिक स्थिति पर उनके दावे से शुरू हुआ है। नए मुख्यमंत्री बने विजय ने आरोप लगाया है कि पूर्ववर्ती डीएमके सरकार ने राज्य पर 10 लाख करोड़ रुपये का भारी कर्ज छोड़ा है और सरकारी खजाने को पूरी तरह से खाली किया है। इन दावों पर पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन ने तीखा पलटवार कर कहा कि प्रदेश की नई सरकार के पास पैसा है, बस लोगों तक पहुंचाने की इच्छाशक्ति और शासन चलाने की क्षमता की कमी है। राज्य की राजनीति में नई सरकार आने के बाद पूर्ववर्ती सरकार पर खजाना खाली करने का आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है। इसके पहले भी सत्ता में आने वाली डीएमके सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती एआईएडीएमके सरकार पर इसतरह के आरोप लगाए थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति उतनी खराब है जितनी सीएम विजय ने बात दी है, या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है? दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु पर भारत के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा कर्ज है। वर्ष 2025 के अंत तक, राज्य पर करीब 9.56 लाख करोड़ रुपये की उधारी का अनुमान है। यह पिछले कई वर्षों के दौरान विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लिया गया कर्ज है। हालांकि, तमिलनाडु देश के सबसे तेजी से बढ़ते राज्यों में से एक है, जिसकी विकास दर 2011 के जीडीपी वर्ष आधार पर 10.8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 11.2 प्रतिशत हो गई है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य इस कर्ज को संभालने और चुकाने की मजबूत क्षमता रखता है। इसके बाद विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्यमंत्री थलापति की सरकार की वास्तविक चिंता कर्ज की मात्रा से अधिक, वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चों का बढ़ता बोझ है। एक रिपोर्ट में प्रकाशित पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विश्लेषण के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में राज्य की अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का लगभग 62 प्रतिशत इन्हीं अनिवार्य खर्चों में जाने का अनुमान है, जिससे विकास कार्यों पर खर्च के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। लेकिन विडंबना यह है कि थलापति ने स्वयं चुनावी घोषणापत्र में हर महीने 200 यूनिट मुफ्त बिजली जैसे कई कल्याणकारी वादे किए हैं, जो उनके सरकारी खर्चे को और भी बढ़ाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में तमिलनाडु पहले ही सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं पर 72,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने की योजना बना चुका है, जो सड़क और बुनियादी ढांचे जैसी विकास परियोजनाओं के लिए निर्धारित राशि से भी अधिक है। अनुमान है कि विजय के सभी चुनावी वादों को पूरा करने से राज्य पर वार्षिक कल्याणकारी खर्च लगभग 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। वहीं तमिलनाडु का खजाना भले ही पूरी तरह से खाली न हो, लेकिन यह निश्चित रूप से गंभीर वित्तीय दबाव में है। मुख्यमंत्री थलापति को न केवल पूर्ववर्ती सरकार द्वारा छोड़ी गई विरासत का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि अपने स्वयं के चुनावी वादों को पूरा करने के लिए भी एक ठोस वित्तीय रणनीति बनानी होगी, जो राज्य के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन बिठा सके। आशीष दुबे / 11 मई 2026