लेख
12-May-2026
...


बंगाल विधानसभा चुनावों में झालमुड़ी पर जितनी चर्चा हुई उतनी और किसी बात पर नहीं हुई। ये झालमुड़ी बंगाल का मुरमुरे, कच्चे सरसों के तेल, भुनी मूंगफली, प्याज, हरी मिर्च और कई तरह के मसालों को मिलाकर तुरंत बनाया जाने वाला प्रसिद्ध तीखा और चटपटा स्ट्रीट फूड है। बंगाली भाषा में झाल मतलब तीखा और मुड़ी मतलब मुरमुरा। समझ लो कि भेलपूरी की तरह ही होता है लेकिन इसमें सरसों के तेल का इस्तेमाल इसे बंगाली स्वाद देता है। पेट के लिए हल्का होता है और स्वाद में एकदम धमाकेदार। कलकत्ता ही नहीं लगभग पूरे बंगाल में जगह जगह इसकी दूकानें मिलती हैं। हुआ यूं कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ऐसे ही एक झालमुड़ी स्टाल पर पहुंच गए। दस रुपए की झालमुड़ी खाई और लगे हाथ अपने चिर-परिचित अंदाज में दूकान वाले से कुछ बातें भी कर डालीं। बस इतना सा मामला राजनीतिक व्यंग्य और चुनावी कूटनीति का सबसे तीखा हथियार बन गया। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और खुद ममता बैनर्जी भी अपने भाषणों में इसकी चर्चा करना नहीं भूलीं। इस दस रुपए की मुई झालमुड़ी ने हिंदू मुस्लिम, बेरोजगारी, गरीबी, रेवड़ी और पता नहीं क्या क्या , सबको पीछे छोड़ दिया। बहरहाल चुनाव के नतीजे आए और भाजपा की शानदार जीत ने दीदी के अरमानों पर पानी फेर दिया। विपक्ष का एकक्षत्र नेता बनकर प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प बनने का ख़्वाब देख रहीं ममता दीदी के पांव‌ अपनी खुद की जमीन से उखड़ गए। भारतीय लोकतंत्र की शाश्वत परंपरा निभाते हुए अब जहां देखो बंगाल चुनाव की चर्चा है। तरह तरह की व्याख्याएं हो रही हैं और इस विजय की प्रमुख सूत्रधार रही झालमुड़ी पर चर्चा लगातार जारी है , अपन को लगता है कि घाघ नेता अगले चुनावों की रणनीति में स्थानीय व्यंजनों को शामिल करने की होड़ में जुट गए हैं। सूचियां बनने लगी हैं कि किस राज्य से क्या उठाया जाए ?मंगोडे, फुल्की, पकौड़ी, भाजीबड़ा, आलू बंडा, सगोड़ा, गटपट, चाट,भेलपुरी, डोसा, समोसा वाले अपने अपने ठेले चमकाने में लग गए हैं। क्या भरोसा कल‌ किस्मत‌ मेहरबान हो जाए और दस रूपए की बिक्री के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मन की बात करने का मौका भी हाथ लग जाए।‌ वैसे एक बात तो है कि झालमुड़ी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वो अपने दम कर किसी राज्य में सरकार भी बनवा सकती है अब व्यवहार सिखा रहे है केंद्रीय कार्मिक लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर कहा है कि अधिकारियों को सांसद और विधायकों के साथ व्यवहार का तरीका सिखाया जाए। 75 से अधिक वर्षों के प्रजातंत्र में अचानक यह आवश्यकता क्यों आन पड़ी, यह शोध का विषय है। लगता है कि हाल ही में नेताओं और अफसरों के बीच टकराव के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लिया गया है। ऐसे निर्देश पिछले चार महीने में दूसरी बार जारी हुए हैं। निर्देशों को जिला स्तर तक के हर अधिकारी तक पहुंचाने के आदेश है। इसका मतलब है कि अफसरों पर इन निर्देशों का कोई असर नहीं हुआ दरअसल अफसर सोचता है कि ये सांसद और विधायक एक टेंपररी फेस है पांच साल बाद कौन कन्हा होगा ये तो वे भी नहीं जानते लेकिन अपन को तो तीस पैंतीस साल राज करना है इसलिए इनको काहे को तवज्जो दें। ये बात सही है कि लोकतंत्र में जनमत से चुने गए सांसद और विधायक निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। मगर कार्यपालिका और सरकारी अफसरों, कारिंदों का भी अपना महत्व है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। यह कार्यपालिका ही है जो शासन की जनोपयोगी नीतियों को अमली जामा पहनाती‌ है। इन दोनों व्यवस्थाओं में टकराव नीतियों का क्रियान्वयन प्रभावित करता है। बीच में वह आम आदमी पिसता है जिसके पैसे से विधायिका और कार्यपालिका दोनों का निजाम चलता है। यह टकराव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और अफसरों के टकराव तक ही सीमित नहीं है। निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनने से चूक गए बड़े स्तर के नेताओं को तो छोड़िए छुटभैया नेता भी अफसरों के साथ टकराव से बाज नहीं आते। चुनाव बिसात और पार्टियों की अंदरूनी राजनीति में इनका अपना महत्व होता है सो संग्राम में कूद पड़ना निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की मजबूरी बन जाती है। सरकार ने चुने हुए जन प्रतिनिधियों की सुध तो ले ली। अपन का सोचना है कि अब पार्टियों को भी अपने कार्यकर्ताओं को अफसरों के साथ गरिमामय व्यवहार का तरीका सिखाने के लिए दिशानिर्देश जारी करना चाहिए। जरूरी है कि ऐसे व्यर्थ के टकराव टाले जाएं और बजाय लड़ाई झगड़ों के सब मिलकर उस आम आदमी के लिए काम करें जो बीच में व्यर्थ ही पिसता है। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि जनता तो उस गेहूं की तरह है जिसे चक्की के दोनों पाटों के बीच पिसना पड़ता है और वो ऐसे ही पिसती रहेगी पिता तो पिता ही होता है लोग बाग बड़ा हल्ला मचा रहे हैं कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से परिवारवाद के घोर विरोधी रहे तो फिर उन्होंने अपने बेटे को बिहार सरकार में मंत्री क्यों बनवा दिया? अरे भैया ये तो सोचो बाप आखिर बाप ही होता है हर बाप का यही सपना होता है कि उसका बेटा कहीं ना कहीं सेट हो जाए और फिर राजनीति तो ऐसी चीज है कि भले ही आपको कुछ आता हो या ना आता हो अगर आपके पिता राजनीति में बड़े ओहदे पर हैं तो समझ लो आपका तो फ्यूचर बन गया, नीतीश कुमार भी आखिरकार एक पिता हैं जब तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे तब तक बेटे को लेकर निश्चिंत थे लेकिन जब से बिहार से नाता टूटा है तब से उनको यही चिंता लग रही होगी कि मेरे बेटे का क्या होगा? भले ही वे जिंदगी भर परिवारवाद के विरोध में रहे हों लेकिन जब अपने पर आती है तो सारे विरोध गायब हो जाते हैं । जनता दल यू वाले सफाई दे रहे हैं की भाई वो तो पार्टी के कार्यकर्ताओं की मांग थी की निशांत जी को राजनीति में आना चाहिए ,चलो मान भी ले उनकी बात ,तो संगठन में आ जाते हैं जनता दल यू तो बहुत बड़ा दल है कुछ साल एक कार्यकर्ता की तरह पार्टी की सेवा करते लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे थे तो सीधे मंत्री बन गए । वैसे अपने को इससे कोई शिकायत नहीं है क्योंकि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील, व्यापारी का बेटा व्यापारी, अफसर का बेटा अफसर बनता है तो फिर मुख्यमंत्री का बेटा यदि मंत्री बन गया तो इसमें काहे का ऐतराज लेकिन ये बात अलग है कि डॉक्टर के बेटे को डॉक्टरी पास करने के लिए पांच साल लगते हैं वकील के बेटे को भी एलएलबी करने में पांच साल लगते हैं व्यापारी का बेटा बचपन से दुकान बैठता है तब व्यापारी बन पाता है अफसर का बेटा भी पीएससी, यूपीएससी पास करता है तब अफसर बन पाता है लेकिन नेता का बेटा हजारों कार्यकर्ताओं के सिर पर पैर रखकर सीधा विधायक मंत्री सांसद बन जाता है बस इतना फर्क है। और वो ही निशांत कुमार ने किया। सुपर हिट ऑफ द वीक श्रीमती जी उदास बैठी थी श्रीमान जी ने पूछा क्या बात है तबियत ठीक नहीं है डाक्टर को दिखाया या नहीं दिखाया था श्रीमती जी ने कहा क्या कहा डाक्टर ने श्रीमान जी ने पूछा कह रहा था खून में शॉपिंग की कमी है श्रीमती जी का उत्तर था ईएमएस / 12 मई 26