पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हाल ही में खत्म हुए हैं। इसके तुरंत बाद भारत निर्वाचन आयोग ने 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 36 करोड़ मतदाताओं के सत्यापन के लिए एसआईआर की अधिसूचना जारी कर दी है। अभी तक चुनाव आयोग ने दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 59 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन का काम किया है। इसमें अभी तक 5.50 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाये गये हैं। इसको लेकर लगातार विवाद देखने में मिलते रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, अभी तक इस पर सुप्रीम कोर्ट से कोई निर्णय नहीं आया है। चुनाव आयोग जो एसआईआर करा रहा है, उसका अधिकार उसे है या नहीं, अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले से इसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। इसी बीच बिहार सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हुए हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। चुनाव आयोग ने यहां के लिए जो नियम बनाए थे, वह बिहार एवं अन्य राज्यों के नियमों से अलग थे। पश्चिम बंगाल में करीब 1 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। करीब 63 लाख मतदाताओं के नाम 2003 की मतदाता सूची में होते हुए भी स्पेलिंग या अन्य कारणों से हटाए गए थे। इसमें से करीब 28000 मतदाताओं ने ट्रिब्यूनल में अपील भी की है। उन मतदाताओं को मतदान में भाग नहीं लेने दिया गया। पिछले तीन माह में एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों और उन नागरिकों के बीच में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनका अधिकार छीन लिया गया है। प. बंगाल में एसआईआर के बाद ममता सरकार बुरी तरह से पराजित हुई है। जितने नाम एसआईआर में हटाये गए, उससे कम मतों से टीएमसी के उम्मीदवार पराजित हुए हैं। यह विवाद चल रहा था, इस बीच रही-सही कसर बिहार और पश्चिम बंगाल की सरकार ने जलती हुई आग में घी डालने का काम किया है। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें नागरिक नहीं माना जाएगा। जो मतदाता सूची में नहीं है, उन्हें सरकारी स्तर पर जो सुविधाएं मिल रहीं थीं, वह आगे नहीं मिलेंगी। इसी बीच चुनाव आयोग द्वारा 36 करोड़ मतदाताओं को एसआईआर के दायरे में लाने की अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसे आसानी से स्वीकार किया जाएगा, इसमें संदेह है। सुप्रीम कोर्ट से अभी तक चुनाव आयोग को एसआईआर को लेकर एक तरह का संरक्षण मिलता रहा है। अब जिस तरह से प्रतिक्रिया हो रही है, उससे चुनाव आयोग की चुनौतियां भविष्य में बढ़ती हुई दिख रही हैं। सुप्रीम में जो सुनवाई चल रही है, उसमें न्यायपालिका के ऊपर याचिकाकर्ताओं का दबाव बनना शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग एसआईआर का काम करा पाएगा या नहीं, इसमें संदेह है। विपक्ष इस मामले में जिस तरह से एकजुट हुआ है। महंगाई और बेरोजगारी का असर अब आम जनता को सीधे प्रभावित कर रहा है। यह मामला अब केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रह गया है। इसे नागरिक अधिकार से भी जोड़कर देखा जाने लगा है। नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। यह अधिकार भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग मतदाता को भारतीय नागरिक है, या नहीं, इस आधार पर मतदाताओं के नाम कैसे काट सकता है। जिस तरह से पश्चिम बंगाल और बिहार सरकार ने राज्य सरकार की सुविधायें बंद करने और नागरिक नहीं मानने की बात कहना शुरू कर दी है, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पर इस मामले में निर्णय देने का दबाव बनेगा। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर विपक्षी दलों को विश्वास नहीं है। चुनाव आयोग के ऊपर लगातार आरोप लग रहे हैं। वह सरकार के इशारे पर भाजपा को मदद कर रहा है। चुनाव आयोग के खिलाफ संसद में महाभियोग पेश हो चुका है। जिस कानून के तहत चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हुई है, सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती देते हुए याचिका लगाई गई, जिस पर सुनवाई चल रही है। अगले साल कुछ राज्यों में चुनाव होने हैं। 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे। यह बात अब स्पष्ट रूप से समझ आने लगी है। 2029 के लोकसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार के इशारे पर मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर एक विशेष वर्ग के नाम मतदाता सूची से काटने की जो मुहिम चुनाव आयोग ने चला रखी है, इसका विरोध करने के लिए नागरिक और राजनीतिक दल अब सड़कों पर उतरेंगे। चुनाव आयोग के लिए अब एसआईआर का काम इतना आसान नहीं होगा, जितना चुनाव आयोग सोच रहा है। वर्तमान स्थिति में जनगणना का काम शुरू हो गया है। बहुत बड़ा सरकारी अमला जनगणना के काम में लगा हुआ है। महंगाई, बेरोजगारी को लेकर आम जनता वैसे ही नाराज है। जिस तरह से मतदाता सूची सत्यापन के लिए मतदाताओं को परेशान होना पड़ रहा है, वह आग में घी डालने की तरह हो सकता है। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। ईएमएस / 15 मई 26