लेख
15-May-2026
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‘‘ संकट प्रबंधन या मधुमक्खी के छत्ते (बर्र) में हाथ डाल दिया ?’ पांच राज्यों के चुनाव समाप्त होने के सात दिन बाद 10 मई को हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ‘‘वैश्विक आर्थिक संकट विशेष कर ऊर्जा संकट तथा विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव के चलते भारत कई विराट चुनौतियों का सामना कर रहा हैं। देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और चुनौती को स्वीकार करने के लिए हमे विदेशी मुद्रा को बचाना होगा’’। प्रधानमंत्री मोदी ने उक्त संकट का मुकाबला करने के लिए कोरोना संकट काल की याद करते हुए देश के नागरिकों से निम्न सात उपायों को अपनाने की राष्ट्रव्यापी अपील की है। प्रधानमंत्री की घोषित प्राथमिकताएं । अल्पकालीन कदम। 1 वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता। 2 अगले एक साल के लिए सोने की गैर-जरूरी खरीदारी से बचें, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को बचाया जा सके। 3 ईंधन (पेट्रोल/डीजल) की खपत कम करें। पब्लिक ट्रांसपोर्ट, मेट्रो और कारपूलिंग अपनाएं। 4 बड़ी मात्रा में खाद्य तेल का आयात करने के कारण उसका उपयोग कम करें। 5 अगले एक साल के लिए गैर-जरूरी विदेशी यात्राएं टालें। देश की कुल जनसंख्या का लगभग 2.2 प्रतिशत नागरिक विदेश यात्रा करते हैं, जिनमें लगभग 2024 में 2.13 लाख करोड़ और 25-26 में 3.34 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा खर्च हुई। मध्यम अवधि की नीति । 6 किसान भाई रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें। 7 इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग। दीर्घकालिक सुधार। 8 स्वदेशी उत्पादकों को प्राथमिकता दें, विदेशी ब्रांड के उत्पादों का उपयोग कम करें। 9 वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत। 10 आयात निर्भरता में कमी। स्वयं की भागीदारी के साथ घोषणा की जानी चाहिए थी । वैज्ञानिक व सोद्देश्य पूर्ण दृष्टि से बेहतर होता, केंद्रीय शासन प्रधानमंत्री के उपायों को उपरोक्तानुसार ‘‘शॉर्ट टर्म, मिड टर्म एंड लॉन्ग टर्म’’ की तीन स्तरों पर नीति को अपनाने की आवश्यकता पर जोर देते। यह पहल केवल ‘‘जनता’’ के लिए हैं? अथवा सरकार और राजनीतिक नेतृत्व को भी ‘‘समान रूप’’ से सुधार प्रस्तुत करना होगा? इसके लिए आवश्यक होता कि सरकार भी उसी समय कुछ दायित्वों को स्वीकार करती, तो जनता में संदेश और अधिक प्रभावशाली रूप से जाता। जैसे ‘‘चार दिन सप्ताह कार्य दिवस’’ मंत्रिमंडलीय बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा करके परिवहन व्यय की बचत की जा सकती है। कई देशों ने इसे लागू भी किया है। ‘‘ अनुशासन’’ लम्बे समय तक के लिए अपनाना होगा’ ’। स्पष्ट है, देश आर्थिक संकट की ओर जा रहा है। इस तथ्य से देश का कोई भी नागरिक किसी भी वर्ग, श्रेणी, पढा-लिखा, अनपढ़, बौद्धिक राजनेता या पत्रकार हो, इंकार नहीं कर सकता है। साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा सुझाए गए उपरोक्त उपायों से किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। परन्तु आत्म अनुशासन सिर्फ ‘‘एक साल के संक्रमण काल’’ के लिए नहीं, जो ‘‘ऊंट के मुंह में जीरा समान है,’’ स्थिति से बाहर आने के लिए दीर्घकालीन आर्थिक अनुशासन की दृष्टि से देश को ‘‘लंबे समय तक’’ के लिए नागरिकों को उक्त उपायों को अपने जीवन में उतार कर, एक नागरिक का कर्तव्य निभाकर, देश हित में होते दिखना होगा। क्योंकि जिन मूल तत्वों के कारण यह संकट की स्थिति निर्मित हुई है, उनका प्रभाव लम्बे समय तक रहना है। वह इसलिए कि इस संकट के दो मूल कारण, एक कच्चे तेल के उत्पादन की मात्रा, जो कुल आवश्यकता का मात्र 11-12% है, जो वर्ष 2014 में कुल 22.40% हिस्सा था, अर्थात 11 वर्ष से लगातार आत्मनिर्भरता घट रही है। सोने का उत्पादन जो मात्र1% के आसपास है। इनके उत्पादन की मांग की पूर्ति तक बढ़ाना असंभव है। ‘‘उपदेश के साथ आचरण आवश्यक।’’ मोदी द्वारा की गई घोषणाएं करने के पूर्व ‘‘कबीर’’ की यह युक्ति याद आती है-‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, आचरहिं ते नर न घनेरेे’’। दूसरों को ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन्हें उपदेशों (ज्ञान) का स्वयं आचरण (अमल) करने वाले लोग विरले ही हैं। मोदी की उक्त अपील के पूर्व, देश के तीन प्रधानमंत्री कुछ इसी तरह की राष्ट्रव्यापी अपील नागरिकों से पूर्व में कर चुके हैं। प्रथम स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री, द्वितीय स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू व तीसरी स्वर्गीय इंदिरा गांधी। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय उत्पन्न खाद्य संकट का सामना करने के लिए ‘‘जय जवान, जय किसान’’ के नारे के साथ जनता से सप्ताह में एक दिन ‘‘उपवास’’ की अपील की थी। परन्तु जनता से अपील करने के ‘‘पूर्व’’ सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले शास्त्री ने अपने परिवार व स्वयं पर वह प्रतिबंध लागू किया था। 1962 के भारत चीन के युद्ध के दौरान ‘‘सोना दान’’ करने की अपील पंडित जवाहरलाल ने कर, उसे ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा फंड’’ में योगदान बताया। इस अपील पर तब इंदिरा गांधी ने अपने अधिकांश गहने लगभग 336 ग्राम सोना दान दे दिया था। जनता ने 262 किलो सोना दान दिया था। आज के 800 मीट्रिक टन के आसपास ‘‘पर्याप्त’’ गोल्ड रिजर्व की तुलना में नेहरू के जमाने में गोल्ड रिजर्व था ही नहीं। विदेशी मुद्रा का संकट होने पर जून 1967 में इंदिरा गांधी ने देशवासियों से सोना नहीं खरीदने की अपील करते हुए इसे ‘‘राष्ट्रीय अनुशासन का हिस्सा बतलाया था’’। Charity begins at home- यहीं पर सरकार विपक्ष मीडिया के निशाने पर आ जाती है । प्रधानमंत्री मोदी की तुलना उक्त तीन प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा के साथ उनके द्वारा किये गये उक्त आचरण के साथ कीजिए। स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। मोदी द्वारा घोषणा करने के पूर्व व बाद में 24 घंटे के अंदर 4 रोड़ शो किये गए, पेट्रोल-डीजल का अपव्यय को रोका नहीं गया, जिसकी अपील वे देश के नागरिको से कर रहे थे। मोदी अपील कर दो घंटे बाद गुजरात रोड़ शो के लिए निकल गये। इसे टाला जा सकता था। याद कीजिए 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छता के पोशाक महात्मा गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री जब ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ का शुभारंभ ‘‘झाड़ू लगाते’’ हुए रोड पर उतरे थे, तब उस अपील का राष्ट्र व्यापक प्रभाव पड़ा था, जिसका ‘‘कुछ असर’’ अभी भी है। ऐसा लगता है, प्रधानमंत्री की उक्त घोषणा पूरी तैयारी के साथ नहीं बल्कि कुछ उदासीनता सी दिखती है। अन्यथा जनता से अपील करते समय सरकार व पार्टी के स्तर पर उठाए जाने वाले कदमों की भी तुरंत घोषणा करते तो उसका वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा स्वच्छता की अपील का हुआ था। उक्त घोषणा में प्रधानमंत्री केंद्रीय मंत्री राज्यों के मंत्री व विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा में लगी सुरक्षा गार्ड में 50% की कमी (बाद में कुछ घोषणाएं इस संबंध में की गई), मंत्रियों के लिए ‘‘मंत्रिमंडलीय बस’’ का शुभारंभ कर देते, वाहनों की स्पीड में 10% की कमी, एसी के तापमान की सीमा निर्धारित करना आदि अनेक उपायों की घोषणा कर तुरंत लागू करते, जनता में विश्वास व सहभागिता का ज्यादा अच्छा संदेश जाता। यदि प्रधानमंत्री घोषणा के समय असम शपथग्रहण समारोह मैदान में न होकर राजभवन में कराने की घोषणा कर देते, तो उसका व्यापक प्रभाव पड़ता। मुझे याद आता है मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री गोवर्धन दास जी खंडेलवाल ने 1967-69 में दो बार शपथ राजभवन में ही ली थी। प्रधानमंत्री के संदेश की संजीदगी की स्थिति देखिए। संदेश सोशल वीडियो में तुरंत वायरल हो गया। लेकिन शीर्षस्थ नेतृत्व से लेकर पार्टी कैडर और जनता तक लागू करने में 2 दिन लग गए। वह भी शायद तब हुआ होगा, जब हाईकमान की बत्ती गई होगी? ऑटो, मोटरसाइकिल से मंत्री, मुख्यमंत्री जा रहे हैं और उनकी वीडियो बनाने के लिए दूसरी गाड़ियां साथ में चल रही है। ‘‘यह बचत है या प्रदर्शन?’’ ‘‘निष्कर्ष ।’’ प्रधानमंत्री मोदी की अपीलें गलत नहीं हैं। बल्कि समय की आवश्यकता हैं। परंतु जनता अब केवल ‘‘उपदेश’’ नहीं, बल्कि ‘‘उदाहरण’’ भी देखना चाहती है। ‘‘साझा त्याग’’ का वातावरण बनाना होगा। वरना स्थिति वही होगी-‘‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’’। और जनता केवल यही कहेगी-‘‘तेल देखो..... तेल की धार देखो।’’ और अभी-अभी जनता ने तेल की धार देख ली। पेट्रोल-डीजल के रेट रू. 3 लीटर बढ़ गए तथा सीएनजी के 2 रू किलो बढ़ा दी गई। राजीव खंडेलवाल/ईएमएस/15मई2026 (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)