भगवान राम को किसी बात का अहंकार नहीं था ।. श्रीराम तो सर्वज्ञ थे, किन्तु रावण को ज्ञान के साथ-साथ शक्ति और और सत्ता का अहंकार था अविनम्र आदमी ही अहंकारी होता है, विनम्र आदमी नहीं वस्तुतः जिस आदमी का अहंकार आ गया वो क्रोध लोभ मोह से घिर जाता है। जिसका सत्ता का अहंकार हो गया वह सत्ता मात्र एक समय के लिए होता है।लेकिन सत्ता को बनाये रखने के लिए युद्ध तक करता है क्योंकि उसे यह ज्ञान नहीं है कि सत्ता जो मिली है आज हमारे पास है कल किसी और के पास होगा अहंकार पर आपकी चोट एकदम सटीक है। वेदांत का पहला और आखिरी पुरुषार्थ अहं-वृत्ति को साक्षी-भाव से देखना ही है। मृत्यु, भोग, सोशल मीडिया का भ्रम — ये सब अहंकार के ही खेल हैं। काल का स्मरण कराना और युवाओं को भोग से परे देखने को कहना, यह ऋषि-परंपरा है। पर वेदांत सब अहंकार ही है कहकर रुकता नहीं। वो कहता है — अहंकार मिथ्या है, पर उसका आधार ब्रह्म सत्य है। शास्त्र को फेंक नहीं देते, नाव की तरह पार उतरकर छोड़ते हैं। ब्रह्म को शक्तिहीन अनजान कहना स्वयं अहंकार की भाषा है, क्योंकि ब्रह्म न शक्त है न अशक्त — वह शक्ति का अधिष्ठान है। आत्मा-परमात्मा घटित नहीं होते, वे नित्य-सिद्ध हैं; सिर्फ अहंकार का पर्दा हटता है। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्भुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ हि = कारण कि, जातस्य = पैदा हुएकी, ध्रुवः = जरूर, मृत्युः = मृत्यु होगी, च = और, मृतस्य = मरे हुएका, ध्रुवम् = जरूर, जन्म = जन्म होगा, तस्मात् = अतः, (इस जन्म-मरण रूप परिवर्तनके प्रवाहका) निवारण नहीं हो सकता, अर्थे = (अतः) इस विषयमें, त्वम् = तुम्हें, शोचितुम् = शोक, न = नहीं, अर्हसि = करना चाहिये। व्याख्या- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्भुवं जन्म मृतस्य च - पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा। न त्वं तस्मादपरिहार्येऽर्थे शोचितुमर्हसि - इसलिये कोई भी इस जन्म- मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किंचिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है। ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायँगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका ? शोक उसीका कीजिये, जो अनहोनी होय। अनहोनी होती नहीं, होनी है सो होय ॥ जैसे, इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ है, तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोक-चिन्ता नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन ! अगर तुम ऐसा मानते हो कि शरीरके साथ ये भीष्म, द्रोण आदि सभी मर जायँगे, तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायँगे। अतः इस दृष्टिसे भी शोक नहीं हो सकता। भगवान् राम ने इन दो (छब्बीसवें-सत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो बात कही है, वह भगवान् का कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं है। अतः अथ च पद देकर भगवान् ने दूसरे (शरीर-शरीरीको एक माननेवाले) पक्षकी बात कही है कि ऐसा सिद्धान्त तो है नहीं, पर अगर तू ऐसा भी मान ले, तो भी शोक करना उचित नहीं है। इन दो श्लोकोंका तात्पर्य यह हुआ कि संसारकी मात्र चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको छोड़ना-यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण करना-यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है, वह फिर जन्मता है- यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। परिशिष्ट भाव - किसी प्रियजनकी मृत्यु हो जाय, धन नष्ट हो जाय तो मनुष्यको शोक होता है। ऐसे ही भविष्यको लेकर चिन्ता होती है । ये शोक-चिन्ता अपने विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही होते हैं।इसलिए भगवान राम का नाम, राम नाम सत्य है लिया जाता है संसारमें परिवर्तन होना, परिस्थिति बदलना आवश्यक है। अगर परिस्थिति नहीं बदलेगी तो संसार कैसे चलेगा ? मनुष्य बालकसे जवान कैसे बनेगा ? मूर्खसे विद्वान् कैसे बनेगा ? रोगीसे नीरोग कैसे बनेगा ? बीजका वृक्ष कैसे बनेगा ? परिवर्तनके बिना संसार स्थिर चित्रकी तरह बन जायगा ! वास्तवमें मरनेवाला (परिवर्तनशील) ही मरता है, रहनेवाला कभी मरता ही नहीं। यह सबका प्रत्यक्ष अनुभव है कि मृत्यु होनेपर शरीर तो हमारे सामने पड़ा रहता है, पर शरीरका मालिक (जीवात्मा) निकल जाता है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दें तो फिर चिन्ता-शोक हो ही नहीं सकते। बालिके मरनेपर भगवान् राम इसी अनुभवकी ओर ताराका लक्ष्य कराते हैं- तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ॥ छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥ प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥ उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर माँगी ॥ (मानस, किष्किन्धा० ११।२-३) विचार करना चाहिये कि जब चौरासी लाख योनियोंमें कोई भी शरीर नहीं रहा, तो फिर यह शरीर कैसे रहेगा ? जब चौरासी लाख शरीर मैं-मेरे नहीं रहे, तो फिर यह शरीर मैं-मेरा कैसे रहेगा ? यह विवेक मनुष्य-शरीरमें हो सकता है, अन्य शरीरोंमें नहीं। सम्बन्ध-पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर अब भगवान् अागेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं। यहां वहां इसकी उसकी किसी की बात में न भरमाए। राम की साधना से ही सारे साधक संजीवनी से सारे भेद माया ईश्वर की अहेतु की कृपा पाए। सही: ब्रह्म के सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं —और ब्रह्म भगवान राम ही है एकमेवाद्वितीयम् श्रुति-प्रमाण है। : जीव-भाव में फँसने वाला ब्रह्म से भिन्न दूसरा कोई है — यह द्वैत-भ्रम है। फँसता कोई ‘दूसरा’ नहीं, ब्रह्म ही अविद्या से स्वयं को जीव मान लेता है। समुद्र ही लहर बनकर खुद को छोटा मान ले तो दोष समुद्र का नहीं, लहर की भूल का है — वैसे ही ब्रह्म ही जीव-भाव में फँसता-सा दिखता है, वास्तव में फँसने वाला कोई दूसरा नहीं है। -राम ही ब्रह्म है। जो हर के आत्मा में हैं लेकिन अच्छी शक्ति वाले में उभर आती है और बुरा कर्म करने वाले को रोकता है लेकिन अयम् आत्मा ब्रह्म — ये आत्मा ही ब्रह्म है। मन ब्रह्म नहीं है। मन प्रकृति का हिस्सा है, जड़ है, बदलता रहता है। आत्मा चेतन है, अपरिवर्तनशील है। - *संतमत/कबीरपंथ*: आत्मा ब्रह्म का अंश नहीं, पारब्रह्म/सत्पुरुष का अंश है। मन काल-निरंजन की देन है, ब्रह्म/काल का एजेंट है। मन ब्रह्म नहीं, बंधन है। *अद्वैत वेदांत*: ब्रह्म एक ही है। पारब्रह्म, परब्रह्म, ब्रह्म — ये सब उसी एक सत्ता के नाम हैं व जो भगवान राम हैं । दो नहीं हैं।शास्त्रों के अनुसार श्री रामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जानने में न आने वाले) अलख (स्थूल दृष्टि से देखने में न आने वाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित) सब विकारों से रहति और भेद शून्य हैं, वेद जिनका नित्य नेति-नेति कहकर निरूपण करते हैं॥ ईएमएस / 17 मई 26