लेख
19-May-2026
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(20 मई दिवस विशेष आलेख) प्रतिवर्ष 20 मई को संयुक्त राष्ट्र(यूएन) द्वारा घोषित विश्व मधुमक्खी दिवस (वर्ल्ड बी डे) मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के महत्व के प्रति आम लोगों को जागरूक करना तथा उनके संरक्षण की दिशा में वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि मधुमक्खियां केवल और केवल शहद बनाने वाली छोटी सी जीव मात्र ही नहीं हैं, बल्कि वे इस पृथ्वी पर जीवन, खाद्य सुरक्षा, जैव- विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की अत्यंत महत्वपूर्ण व अहम् कड़ी हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि यदि मधुमक्खियों का अस्तित्व संकट में पड़ता है, तो मानव जीवन, कृषि और पर्यावरण भी गंभीर संकट में आ जाएंगे। इसलिए मधुमक्खियों का संरक्षण केवल और केवल पर्यावरणीय आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि उनका जीवन प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में कहीं न कहीं मानव अस्तित्व की भी अहम् आवश्यकता है। अतः हमें अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाने, धरती से रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करने, जैविक खाद का अधिक उपयोग करने, जैविक खेती अपनाने तथा प्राकृतिक जैव-विविधता को बचाने की दिशा में अपने सामूहिक व यथेष्ठ प्रयास करने होंगे। पाठक जानते होंगे कि खेती, जैव-विविधता और खाद्य सुरक्षा में मधुमक्खियों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में, इस दिवस को मनाने के प्रमुख उद्देश्यों में मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना, जैव-विविधता और खाद्य-सुरक्षा की रक्षा करना, मधुमक्खियों पर मंडरा रहे खतरों जैसे कि खेती में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और उनके प्राकृतिक आवासों के विनाश की ओर ध्यान आकर्षित करना, सतत कृषि और मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय में मधुमक्खी पालन के योगदान को रेखांकित करना आदि शामिल है। हाल फिलहाल, यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि पिछले वर्ष इस दिवस की थीम-प्रकृति से प्रेरित मधुमक्खियां, हम सभी का पोषण करती हैं रखी गई थी, जबकि इस वर्ष 2026 की थीम-लोगों और पृथ्वी के लिए मधुमक्खियों के साथ मिलकर कार्य करें निर्धारित की गई है। बहरहाल,यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास की बात करें, तो इसकी शुरुआत का प्रस्ताव सर्वप्रथम यूरोपीय देश स्लोवेनिया ने रखा था। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2017 में 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस घोषित किया तथा पहली बार यह दिवस वर्ष 2018 में मनाया गया। 20 मई की तिथि इसलिए चुनी गई, क्योंकि इसी दिन आधुनिक मधुमक्खी पालन के अग्रदूत एंटोन जान्सा का जन्म हुआ था। मधुमक्खियों के महत्व की यदि हम बात करें तो ये नीले ग्रह (पृथ्वी) के पारिस्थितिक संतुलन की प्रमुख आधारशिला मानी जाती हैं। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत खाद्य फसलें किसी न किसी रूप में परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं, जबकि दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत जंगली पुष्पीय पौधों के प्रजनन में परागण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फल, सब्जियां, तिलहन, मेवे तथा अनेक औषधीय पौधों का उत्पादन मधुमक्खियों के कारण ही संभव हो पाता है। ये जैव-विविधता को बनाए रखने में सहायता करती हैं तथा कृषि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होती हैं। यदि मधुमक्खियां न रहें, तो खाद्य-श्रृंखला और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक मधुमक्खी अपने पूरे जीवन(जीवनकाल में) में लगभग एक चम्मच का बारहवां हिस्सा ही शहद बना पाती है और एक किलोग्राम शहद तैयार करने के लिए मधुमक्खियों को लाखों फूलों से बहुत मेहनत से रस एकत्र करना पड़ता है।इसके अलावा, मधुमक्खियां पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और सूर्य की दिशा के आधार पर अपना रास्ता पहचान सकती हैं। उनका वैगल डांस एक विशेष संचार प्रणाली है, जिसके माध्यम से वे अन्य मधुमक्खियों को भोजन की दिशा और दूरी तक की जानकारी देती हैं। शहद हजारों वर्षों तक भी खराब नहीं होता है; यहां तक कि मिस्र के पिरामिडों में मिला शहद भी खाने योग्य पाया गया था। मधुमक्खी दिखने में भले ही एक छोटा सा जीव/कीट है लेकिन आज मधुमक्खी पालन ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनता जा रहा है।पृथ्वी पर लगातार बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और तीव्र विकास गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि आज नीला ग्रह कही जाने वाली पृथ्वी पर मानवीय गतिविधियों के कारण जलवायु में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों का प्रभाव तापमान, मौसम-चक्र, हिमखंडों, महासागरों और प्राकृतिक तंत्रों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसका असर मानव जीवन के साथ-साथ वनस्पतियों और कीट प्रजातियों पर भी पड़ रहा है, विशेष रूप से मधुमक्खियों पर। आज मधुमक्खियों की संख्या निरंतर घटती जा रही है और इसका खुलासा हाल ही में जर्मनी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोधों में भी हुआ है। कुछ शोधों और अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि 1970 के दशक के बाद से कीट बायोमास, विशेषकर मधुमक्खियों की संख्या, लगभग आधी रह गई है। जूलियस मैक्सिमिलियन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में जर्मनी के 179 क्षेत्रों में भूमि उपयोग और बढ़ते तापमान के संयुक्त प्रभावों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन के निष्कर्ष रॉयल सोसाइटी ऑफ बायोलॉजी की पत्रिका बायोलॉजिकल साइंसेज में प्रकाशित हुए। अध्ययन में सामने आया कि मधुमक्खियां केवल दिन के उच्च तापमान से ही नहीं, बल्कि औसत से अधिक गर्म रातों से भी प्रभावित होती हैं। जानकारी के अनुसार रात के औसत तापमान में वृद्धि दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेज़ी से हो रही है, जिससे कीटों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।इतना ही नहीं, आज मधुमक्खियों को खुले क्षेत्रों में आवास बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, वे बढ़ते तापमान से निपटने में काफी सक्षम होती हैं, फिर भी कृषि भूमि, प्राकृतिक आवासों के विनाश, वायु प्रदूषण, खेती में अंधाधुंध कीटनाशकों और रसायनों के प्रयोग तथा खेती के बदलते तौर-तरीकों के कारण इनके अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन क्षेत्रों में कृषि भूमि प्राकृतिक आवासों के निकट थी, वहां मधुमक्खियों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी। इससे स्पष्ट होता है कि मधुमक्खियों को पनपने के लिए मिश्रित प्राकृतिक वातावरण और पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है। वास्तव में, धरती पर किसी भी अन्य कीट ने उतनी लोकप्रियता और मानव सभ्यता पर उतना प्रभाव नहीं डाला, जितना मधुमक्खियों ने। आधुनिक कृषि और मानव संस्कृति को आकार देने में इन मेहनती कीटों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मधुमक्खियां उस जैव-विविधता का हिस्सा हैं, जिस पर मानव अस्तित्व निर्भर करता है। जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच की वर्ष 2019 की ऐतिहासिक रिपोर्ट में भी कहा गया कि दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों में मधुमक्खियों का उल्लेख मानव समाज के लिए उनके महत्व को दर्शाता है। आज खाद्य-श्रृंखला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा लगातार समाप्त होता जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है। मधुमक्खियों में गिरावट को विशेषज्ञ कॉलोनी पतन विकार के नाम से जानते हैं। उल्लेखनीय है कि मधुमक्खियां केवल अपनी कॉलोनियों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे अनेक जीवों और पेड़-पौधों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, विलो और चिनार जैसे कई पेड़ अपने प्रजनन के लिए मधुमक्खियों जैसे परागणकर्ताओं पर निर्भर करते हैं। जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि आज बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और मानवीय गतिविधियों के कारण मधुमक्खियों के प्राकृतिक आवास तेजी से नष्ट हो रहे हैं। खेती के सघन तरीके, रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, मौसम चक्र में बदलाव तथा बढ़ता वायु प्रदूषण इस लाभदायक कीट को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र ने सरकारों, संगठनों, नागरिक समाज और आम लोगों को परागणकर्ताओं और उनके आवासों की रक्षा के लिए प्रेरित करने हेतु विश्व मधुमक्खी दिवस घोषित किया है। मधुमक्खियों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परागण में सहायता करना है। वे फूलों के बीच पराग पहुंचाकर पौधों में प्रजनन की प्रक्रिया को बढ़ावा देती हैं, जिससे फल, बीज और नए पौधों का उत्पादन संभव होता है। इसके अतिरिक्त वे शहद का उत्पादन करती हैं, जो मानव के लिए एक मूल्यवान खाद्य पदार्थ और औषधीय स्रोत है। कहना गलत नहीं होगा कि परागण की यह प्रक्रिया खाद्य-सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। मधुमक्खियां वन्यजीवों के लिए भोजन और आश्रय उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने मानव संस्कृति को भी अनेक रूपों में प्रभावित किया है जैसे कला, संगीत, त्योहार और लोक परंपराएं। यहां तक कि इतिहास में उनका उपयोग युद्ध के उपकरण के रूप में भी किया गया है। मधुमक्खी पालन ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और किसानों की अतिरिक्त आय बढ़ाने में सहायक है। यदि बड़ी संख्या में मधुमक्खियां समाप्त हो जाती हैं, तो परागण की प्रक्रिया प्रभावित होगी और इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा। फलस्वरूप मानव को स्वस्थ आहार, फल, सब्जियां, मेवे, दवाएं, शहद और अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास समय की मांग बन चुके हैं। विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार मधुमक्खी कीट वर्ग का प्राणी है तथा यह समूह में रहना पसंद करती है। इसका छत्ता मोम से बनता है। मधुमक्खियों के वंश एपिस में 7 जातियां और 44 उपजातियां पाई जाती हैं। जानकारी के अनुसार मधुमक्खियां नृत्य के माध्यम से अपने परिवार के सदस्यों को संकेत देती हैं। वास्तव में जंतु जगत में मधुमक्खी आर्थोपोडा संघ का कीट है। दुनिया भर में मधुमक्खियों की 40,000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। अकेले कनाडा में लगभग 1,000 प्रजातियां हैं, जिनमें से लगभग 67 प्रतिशत मधुमक्खी कॉलोनियां अल्बर्टा, सस्केचेवान और मैनिटोबा में पाई जाती हैं। विश्व में मधुमक्खियों की प्रमुख पांच प्रजातियों में भुनगा या डम्भर, भंवर या सारंग, पोतिंगा या छोटी मधुमक्खी, खैरा या भारतीय मौन तथा यूरोपियन मधुमक्खी शामिल हैं। इनमें से चार प्रमुख प्रजातियां भारत में भी पाई जाती हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कृषि उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण में मधुमक्खियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंत में, यही कहा जा सकता है कि मधुमक्खियां हमारे पर्यावरण, पारिस्थितिकी-तंत्र और खाद्य-श्रृंखला का मुख्य आधार हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम धरती के इस अमूल्य और मेहनती जीव के संरक्षण के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं कर पा रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मधुमक्खियां हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन के लगभग एक-तिहाई हिस्से के परागण के लिए जिम्मेदार हैं। हमारे आहार के लिए आवश्यक अधिकांश फल, सब्जियां, बीज और मेवे इनके कारण ही उपलब्ध हो पाते हैं। विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में मधुमक्खियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम इस धरती के इस मेहनती सुपर जीव के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में गंभीरता से कार्य करें। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 19 मई 26