-असहमति और दमनकारी कानूनों पर उठते सवाल देश में पिछले कुछ वर्षों में आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और असहमति की आवाज़ों को शासन और प्रशासन द्वारा कठोरता के साथ दबाया जा रहा है। आंदोलनकारियों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के लाठी डंडे, अश्रु गैस के बाद अब कठोर कानूनी धाराओं का उपयोग शुरू कर दिया गया है। पिछले कुछ वर्षों में एनएसए जैसी राष्ट्र विरोधी कार्यों वाली धाराओं का उपयोग प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों, छात्रों, किसानों पर हो रहा है। लोकतंत्र की सेहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानव अधिकारों का कारण बनती है। इस पर गंभीर बहस खड़ी हो गई है। छात्र, मजदूर, किसान, पत्रकार, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता कोई भी जांच एजेंसियों के दमन और कठोर कानूनों की कार्रवाई से अछूता नहीं रहा। सरकारें चाहे केंद्र की हों या राज्यों की, सरकार के विरोध को “कानून-व्यवस्था” के स्थान पर अब राष्ट्र का विरोध मान लिया गया है। सरकार के निर्देश पर लंबे समय तक जेल में रखने की नीति जाँच एजेंसियाँ अपना रही हैं। इससे समाज के सभी वर्गों में असंतोष और सरकारों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। अब यह गुस्सा और अविश्वास कहीं ना कहीं न्यायपालिका पर भी दिखने लगा है। अदालतें सरकार के दबाव में जमानत जैसे मामलों में कई महीने और सालों तक लटकाकर रख रही हैं। सारी विधि व्यवस्था को न्यायपालिका स्वयं नजर अंदाज कर रही है। ऐसी स्थिति में अब न्यायपालिका के ऊपर आम नागरिकों को वह विश्वास नहीं रहा, जो पहले होता था। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता है। नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार से सवाल पूछने और शांतिपूर्ण विरोध करने के अधिकार से लोकतंत्र मजबूत होता है। सरकारें नागरिकों के प्रति जवाबदेह होती हैं। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के विरोध के अधिकार को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता दी है। पिछले कुछ वर्षों से आंदोलनकारियों पर गंभीर धाराएं लगाकर साजिशन महीनों या वर्षों तक जेल में रखा जा रहा है। बाद में पर्याप्त सबूत न मिलने पर वर्षों बाद आरोपी अदालत से बरी हो जाते हैं। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, क्या कानून का उपयोग न्याय के लिए हो रहा है? सरकार से असहमति, आंदोलन, प्रदर्शन और विरोध को नियंत्रित करने के लिए कानूनों का दुरूपयोग किया जा रहा है। हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं। लंबी हिरासत के बाद अदालतों में आरोपियों पर जो आरोप लगे थे, उससे संबंधित कोई तथ्य ही मुकदमे में नहीं था। अदालत में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठे। उसके बाद भी इन मामलों में कोई रोक नहीं लगी। ईडी, सीबीआई, पुलिस इत्यादि जांच एजेंसियां गंभीर धाराओं में आरोपियों को बंद करके जाँच एवं पूछताछ के नाम पर कई महीनो तक जेल में बंद रखती हैं। आरोपियों का ट्रायल भी शुरू नहीं करती हैं। जांच भी कई वर्षों तक पूर्ण नहीं होती है। इससे युवाओं, छात्रों और श्रमिक संगठनों एवं राजनीतिक दलों के बीच यह भावना मजबूत हुई है, कानूनों का दुरूपयोग सत्ता के लिये किया जा रहा है। न्याय मिलने में देरी भी एक तरह की सजा है। “तारीख पर तारीख” की व्यवस्था केवल अदालतों की प्रक्रिया नहीं रह गई, बल्कि यह आम नागरिक की पीड़ा, प्रताणना और निराशा का प्रतीक बन चुकी है। पेपर लीक जैसे मामलों ने युवाओं के गुस्से को बढ़ाया है। पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने नीट एवं अन्य परीक्षाओं में जब गड़बड़ी हुई थी, तब ऐसे मामले पर विचार करने से मना कर दिया। जब परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। आंदोलन करने वाले छात्रों पर पुलिस कठोर कार्रवाई करती है। न्यायपालिका से जब न्याय नहीं मिलता है, तब व्यवस्था के प्रति आम नागरिकों का विरोध बढ़ता है। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि जनता का विश्वास, कानून व्यवस्था पर बनाए रखना भी है। नागरिकों के अधिकार और भविष्य को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाना उनका पालन कराना, बिना किसी भेदभाव के और संवेदनशीलता के साथ नागरिकों के साथ व्यवहार करना होता है। इस पूरे परिदृश्य में न्यायपालिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। संविधान ने अदालतों को नागरिको के मौलिक एवं कानूनी अधिकारों का संरक्षक बनाया है। जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता लंबे समय तक दांव पर लगी हो। विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हो, झूठे आरोप लगाकर उसे प्रताड़ित किया जा रहा हो। तब न्यायपालिका से त्वरित, निष्पक्ष और संवेदनशील हस्तक्षेप की अपेक्षा होती है। यदि जांच एजेंसियों की कार्रवाई में त्रुटियां हैं, जांच एजेंसियों ने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया हैं। किसी दबाव में साजिश के साथ जाँच एजेंसी ने अधिकारों का दुरूपयोग किया है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका की जिम्मेदारी है, वह त्वरित कार्यवाही कर न्याय करे। यह सच है, कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है। हर आंदोलन शांतिपूर्ण नहीं होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति और अधिकार के साथ जवाबदेही भी महत्वपूर्ण है। इसलिए आवश्यक है, जांच एजेंसियां जब कठोर कानूनों का उपयोग करें ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को स्वमेव स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। आरोप के तहत जेल में बंद नागरिकों को भी जीने का अधिकार होता है। जेल में इन्हें विचाराधीन कैदी के रूप में रखा जाता है। गलत कार्यवाही से आरोपी के सम्पूर्ण परिवार को खामियाजा भोगना पड़ता है। युवाओं का तो जीवन शुरू होने के पहिले बर्बाद कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के सबसे उच्च आसन पर बैठे जज द्वारा नागरिकों को कॉकरोच कहकर संबोधित किया जाए। ऐसी स्थिति में संविधान, लोकतंत्र, कानून का राज सब बेमानी है। ईएमएस / 19 मई 26