समाजशास्त्र हमें यह समझाता है कि किसी भी समाज की प्रगति केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, ऊंची इमारतों या चमकदार शहरों से नहीं मापी जा सकती। किसी समाज का वास्तविक विकास इस बात से तय होता है कि वह अपने प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण और मानवीय जीवन के साथ कैसा संबंध बनाता है। आज जब दुनिया बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा और जल संकट का सामना कर रही है, तो यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है; यह सामाजिक संरचना और विकास की हमारी सोच का संकट भी है। दरअसल कुछ दशक पहले भारतीय समाज का प्रकृति से संबंध उपयोग का नहीं, सह-अस्तित्व का था। गांवों में पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं थे; वे सामाजिक जीवन का हिस्सा थे। तालाब केवल जल संग्रहण का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक संपर्क के केंद्र थे। लेकिन आधुनिक विकास मॉडल ने प्रकृति और समाज के इस संबंध को बदल दिया। जंगलों को “भूमि संसाधन”, नदियों को “परियोजना” और पेड़ों को “विकास में बाधा” मान लिया गया और यही वजह है कि भारत इस समय केवल बढ़ती गर्मी नहीं झेल रहा, बल्कि अपने विकास मॉडल की एक असहज सच्चाई से भी गुजर रहा है। सड़कों का जाल बिछ रहा है, शहर ऊपर की ओर फैल रहे हैं, इमारतें आसमान छू रही हैं और विकास के दावे लगातार ऊंचे होते जा रहे हैं। इसी शोर के बीच एक ऐसी खामोशी भी गहरी होती जा रही है। जिसमें पेड़ों के कटने की, सूखते जल स्रोतों की और बदलते मौसम की मार शामिल है। यह प्रश्न अब केवल पर्यावरण का नहीं रह गया। यह समाज, जीवन और भविष्य का प्रश्न बन चुका है। एक समय था जब मौसम की अपनी एक लय होती थी। गर्मी अपने समय पर आती थी, बारिश का एक निश्चित क्रम होता था और सर्दियां अपनी पहचान रखती थीं। अब मौसम का व्यवहार अस्थिर दिखाई देता है। मार्च में मई जैसी तपन महसूस होती है, कई क्षेत्रों में सर्दियां छोटी हो रही हैं, कहीं कुछ घंटों की बारिश शहरों को जलमग्न कर देती है तो कहीं लंबे समय तक बादल बिना बरसे गुजर जाते हैं। प्रकृति का यह बदलता व्यवहार किसी रहस्यमय घटना का परिणाम नहीं, मानवीय गतिविधियों की लंबी श्रृंखला का प्रतिफल है। वैज्ञानिक आंकड़े इस चिंता को और स्पष्ट करते हैं। पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक काल की तुलना में लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ चुका है। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी हीटवेव, सूखा, अतिवृष्टि और जल संकट जैसी घटनाओं को अधिक तीव्र बना देती है। भारत इस संकट के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि वैश्विक मीठे जल संसाधनों का केवल लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा देश के पास है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 60 करोड़ भारतीय उच्च या अत्यधिक जल संकट की स्थिति का सामना कर रहे हैं। ऐसे में इन आंकड़ों के पीछे केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, एक सामाजिक कहानी भी छिपी हुई है। विकास की वर्तमान अवधारणा ने शहरों को धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया। जहां कभी मिट्टी थी, वहां सीमेंट की परतें बिछ गईं। जहां पेड़ों की छांव होती थी, वहां पार्किंग और बहुमंजिला ढांचे खड़े हो गए। जहां तालाब थे, वहां कॉलोनियां बस गईं। इतना ही नहीं शहरों का बदलता स्वरूप भी इस संकट का बड़ा कारण है। पिछले कुछ दशकों में शहरों का विस्तार हुआ, लेकिन उसके साथ हरियाली नहीं बढ़ी। पेड़ों की जगह पार्किंग आई, तालाबों की जगह कॉलोनियां बनीं और मिट्टी की जगह सीमेंट बिछा दिया गया। आज शहर “कंक्रीट के जंगल” बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिक इसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहते हैं, जिसमें कंक्रीट और डामर दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में छोड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि शहरों का तापमान आसपास के क्षेत्रों से अधिक हो जाता है। जर्मन समाजशास्त्री उलरिच बेक ने अपनी ‘जोखिम समाज’ अवधारणा में चेताया था कि आधुनिक विकास केवल सुविधाएं नहीं लाता, वह ऐसे जोखिम भी पैदा करता है जो धीरे-धीरे पूरी मानव सभ्यता को प्रभावित करने लगते हैं। जलवायु परिवर्तन आज उसी चेतावनी की सबसे स्पष्ट तस्वीर बनकर सामने खड़ा है। अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं है। इसका असर सीधे मनुष्य के शरीर, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी के साथ हीट स्ट्रोक, श्वसन संबंधी बीमारियां और जल संकट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। सबसे अधिक प्रभावित वह वर्ग हो रहा है जो खुले आसमान के नीचे जीवन और श्रम करता है। एक वातानुकूलित कार्यालय में बैठा व्यक्ति और सड़क निर्माण स्थल पर काम करने वाला मजदूर एक जैसी गर्मी का अनुभव नहीं करते। एक परिवार पानी खरीद सकता है, दूसरा परिवार पानी के एक टैंकर का इंतजार करता है। पर्यावरणीय संकट का बोझ समान रूप से वितरित नहीं होता। उसका सबसे भारी भार अक्सर उन कंधों पर आता है जिन्होंने इस संकट को पैदा करने में सबसे कम योगदान दिया होता है। समस्या विकास में नहीं है। समस्या उस सोच में है जिसने विकास और प्रकृति को दो अलग दिशाओं में खड़ा कर दिया। पेड़ विकास के विरोधी नहीं हैं। जल स्रोत बाधा नहीं हैं। जंगल खाली जमीन नहीं हैं। सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक गति से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसने अपनी अगली पीढ़ी के लिए कैसी दुनिया छोड़ी। यदि विकास का अर्थ केवल कंक्रीट की ऊंचाई रह गया और सांस लेने योग्य हवा पीछे छूट गई, तो आने वाला समय हमारी उपलब्धियों का नहीं, हमारी दूरदर्शिता की कमी का दस्तावेज बनेगा। इतिहास उन सभ्यताओं को अधिक देर तक याद रखता है जिन्होंने निर्माण के साथ संरक्षण को भी महत्व दिया, जिन्होंने भविष्य की कीमत पर वर्तमान का उत्सव नहीं मनाया। ( स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार ) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 21 मई 26