अंतर्राष्ट्रीय
21-May-2026
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लंदन(ईएमएस)। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अभूतपूर्व और विरोधाभासी स्थिति पैदा हो गई है। दुनिया भर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वे देश भी रूसी तेल और ईंधन खरीदने को मजबूर हो रहे हैं जो कभी रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसे कमजोर करना चाहते थे। इसी कड़ी में एक बड़ा रणनीतिक फैसला लेते हुए ब्रिटेन सरकार ने अब रूस के कच्चे तेल से विदेशों में तैयार किए गए डीजल और जेट ईंधन के आयात को मंजूरी दे दी है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने की आशंका से वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं और विमानन क्षेत्र पर पड़ रहा है। लगातार बढ़ती महंगाई और ईंधन के दामों ने एयरलाइंस कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई कंपनियों ने हवाई टिकटों के दाम बढ़ा दिए हैं, उड़ानों की संख्या सीमित कर दी है और भविष्य में बड़े वित्तीय घाटे की चेतावनी दी है। इस संकट से निपटने के लिए अमेरिका पहले ही रूसी तेल से जुड़े कुछ प्रतिबंधों में ढील दे चुका था, और अब ब्रिटेन ने भी उसी राह पर कदम बढ़ा दिए हैं। ब्रिटेन ने तेल के साथ-साथ रूस के सखालिन-2 और यामल एलएनजी प्रोजेक्ट से होने वाली गैस ढुलाई और संबंधित सेवाओं को जनवरी 2027 तक के लिए प्रतिबंधों से छूट दे दी है। इसके अलावा जापान की ताइयो ऑयल कंपनी भी रूस से दोबारा गैस खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट ने पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की पोल खोलकर रख दी है। जो अमेरिका और यूरोपीय देश यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर रूस की आर्थिक कमर तोड़ना चाहते थे, वे अब ईरान संकट के कारण अपनी नीतियां बदलने पर विवश हैं। पश्चिमी देशों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल उत्पाद खरीदने के कारण रूस के खजाने में भारी विदेशी मुद्रा पहुंच रही है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए कर सकता है। आलोचकों के अनुसार, मध्य पूर्व के इस युद्ध ने रूस को एक बड़ा आर्थिक जीवनदान दे दिया है। रूस पहले से ही चीन और भारत जैसे देशों को रियायती दरों पर कच्चे तेल की आपूर्ति कर रहा था, लेकिन अब पश्चिमी बाजारों में भी उसकी अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी बढ़ गई है। ईंधन महंगा होने से आम जनता की जेब पर सबसे ज्यादा मार पड़ रही है, जिससे परिवहन और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ गई है। एयरलाइंस कंपनियों का कहना है कि उनके परिचालन खर्च का एक बड़ा हिस्सा ईंधन पर जाता है, जिसके कारण किराए में बढ़ोतरी करना उनकी मजबूरी बन गया है। ईरान और मध्य पूर्व के इस संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कितना संवेदनशील है। जब दुनिया के प्रमुख व्यापारिक मार्ग प्रभावित होते हैं, तो महाशक्तियां भी अपने सिद्धांतों को पीछे छोड़कर व्यावहारिक और आर्थिक हित में फैसले लेने को मजबूर हो जाती हैं, जिसका सीधा फायदा इस समय रूस को मिल रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस 21 मई 2026