- इलाज में अब तक हुए 50 लाख खर्च - ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया देने में चूक से युवक को ब्रेन हाइपॉक्सी इंजरी - अस्पताल में नहीं था इमरजेंसी बैकअप, ‘कोड ब्लू प्लान’ भी नदारद - न्याय दिलाने सडक़ों पर उतरे लोग - दो डॉक्टरों के खिलाफ अपराध दर्ज - ऑपरेशन थिएटर में लापरवाही का काला सच: एनेस्थीसिया के दौरान नहीं था ऑक्सीजन बालाघाट (ईएमएस)। सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल बालाघाट में चिकित्सा लापरवाही का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया देने में चूक के चलते एक युवक को ब्रेन हाइपॉक्सी इंजरी हो गई और वह कोमा में चला गया। जांच में सामने आया कि ऑपरेशन थिएटर में न तो उचित वेंटिलेशन दिया गया और न ही इमरजेंसी के लिए आवश्यक बैकअप मौजूद था। मामले को गंभीर मानते हुए पुलिस ने दो डॉक्टर हितेश कावड़े और डाक्टर श्रष्टि जैन के खिलाफ अपराध दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच रिपोर्ट के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि एनेस्थीसिया के दौरान मरीज को सही तरीके से वेंटिलेट नहीं किया गया, जिससे उसके मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच सकी। जांच में यह भी सामने आया कि इसी वजह से मरीज को ब्रेन हाइपॉक्सी इंजरी हुई और वह कोमा की स्थिति में पहुंच गया। बाद में नागपुर और भोपाल के अस्पतालों की रिपोट्र्स में भी इस स्थिति की पुष्टि हुई है। परिजनों के अनुसार 10 फरवरी की रात विवेक अपने मित्र का जन्मदिन मनाकर लौट रहे थे। समता भवन के पास सडक़ दुर्घटना में घायल होने के बाद उन्हें सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में अधिकांश रिपोर्ट सामान्य बताई गईं। केवल बाएं हाथ की एक उंगली में हल्का फ्रेक्चर पाया गया, जिस पर प्रारंभ में बैंडेज किया गया। युवक के इलाज में उसके परिजन अभी तक करीब 50 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। -एनेस्थीसिया के बाद बिगड़ी हालत परिजनों का आरोप है कि बाद में डॉक्टरों ने उंगली के ऑपरेशन की सलाह दी। सहमति के बाद जब विवेक को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया तो हाथ को सुन्न करने के लिए एनेस्थीसिया दिया गया, लेकिन कथित रूप से असर नहीं हुआ। इसके बाद पूरे शरीर को एनेस्थीसिया देकर बेहोश किया गया। इसी दौरान विवेक की स्थिति बिगड़ गई और वे कोमा में चले गए। 12 फरवरी शाम 5 बजे तक विवेक लगभग 18 घंटे से अधिक समय तक अचेत अवस्था में अस्पताल में भर्ती रहे। हालत गंभीर होने पर उन्हें बेहतर उपचार के लिए नागपुर रेफर कर दिया गया। -स्वास्थ्य विभाग ने की जांच मामले की सूचना जिला प्रशासन को दिए जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने चार सदस्यीय जांच टीम गठित की है। टीम में डॉ. एनआर रंगारे, डॉ. अंकित राणा सहित अन्य अधिकारी शामिल हैं। डॉ. रंगारे ने बताया कि अस्पताल प्रबंधन से उपचार संबंधी दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट और ऑपरेशन रिकॉर्ड मांगे गए थे, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने पहले दस्तावेज तत्काल उपलब्ध नहीं कराए गए। जांच के दौरान जिला चिकित्सा अधिकारियों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा तैयार रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि मरीज की हालत बिगडऩे का मुख्य कारण एनेस्थीसिया के दौरान उचित वेंटिलेशन न होना और इमरजेंसी मैनेजमेंट की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन के दौरान अचानक मरीज की हालत बिगड़ गई। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उसे तत्काल सीपीआर देकर रेसुसिटेट करना पड़ा। यह एक स्पष्ट इमरजेंसी स्थिति थी, जिसमें तत्काल विशेषज्ञ टीम और संसाधनों की जरूरत होती है। - वेंटिलेशन और मॉनिटरिंग में भी गंभीर चूक रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि एनेस्थीसिया के दौरान मरीज की वेंटिलेशन और ऑक्सीजन लेवल को ठीक से मेंटेन नहीं किया गया। यह बेसिक मेडिकल प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जाता है। जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि अस्पताल में ऐसी आपात स्थिति से निपटने के लिए कोई स्किल्ड बैकअप (इंटेंसिविस्ट) या कोड ब्लू प्लान मौजूद ही नहीं था। यानी इमरजेंसी मैनेजमेंट की कोई पूर्व तैयारी नहीं थी, जो सीधे तौर पर अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को दर्शाता है। - विवेक को न्याय दिलाने सडक़ों पर उतरे लोग सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल में कथित लापरवाही के शिकार युवक विवेक तिरपुड़े को न्याय दिलाने के लिए शहरवासियों ने कैंडल मार्च निकालकर विरोध जताया। इस दौरान दोषी डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठी। 24 मई की शाम 6 बजे शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय के खेल मैदान से शांतिपूर्ण कैंडल मार्च निकाला गया। यह मार्च शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए कोतवाली पहुंचा, जहां ज्ञापन सौंपकर दोषियों पर कार्यवाही की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा गया। - कोरोना कॉल में अस्पताल के नाम पर फर्जीवाड़ा कोरोना महामारी के कठिन दौर में सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल प्रबंधन ने कोरोना काल में नियमों को दरकिनार कर फर्जीवाड़ा करते हुए मरीजों से भारी वसूली की। कोरोना काल के दौरान जब सरकारी व्यवस्थाएं सीमित थीं और लोग निजी अस्पतालों पर निर्भर थे, उस समय सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल में इलाज के नाम पर अनियमितताएं की गईं। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने महामारी जैसी आपदा में भी मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार कर आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी। बताया जा रहा है कि मरीजों और उनके परिजनों से अत्यधिक शुल्क वसूला गया, साथ ही कई मामलों में उपचार और बिलिंग को लेकर भी पारदर्शिता नहीं रखी गई। इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष और आक्रोश भी देखा गया, लेकिन इसके बावजूद अब तक संबंधित अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। - मंत्री के मेडिकल कॉलेज निर्माण की जिम्मेदारी! सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल से जुड़े विवादों के बीच एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सूत्रों के अनुसार, अस्पताल संचालक को प्रदेश के एक मंत्री का मेडिकल कॉलेज बनवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके चलते गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हो रही है। अस्पताल प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति को सत्ता से जुड़े एक प्रभावशाली मंत्री के प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज निर्माण कार्य का जिम्मा दिया गया है। इस जानकारी के सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लोगों का कहना है कि अस्पताल पर पहले से ही चिकित्सकीय लापरवाही और अनियमितताओं के आरोप लगे हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। ऐसे में इस नए घटनाक्रम ने पूरे मामले को और भी संदिग्ध बना दिया है। -जांच और कार्रवाई पर सवाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की ओर से अब तक कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाया गया। क्या जांच केवल कागजों तक सीमित रह गई है, या फिर मामला दबाने की कोशिश की जा रही है?