लेख
31-May-2026
...


हर साल छिनती हैं सैकड़ों जिंदगियां, अब अवैध शराब के पूरे नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई जरूरी महाराष्ट्र के पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से हुई 15 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया है। यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि भारत में बार-बार सामने आने वाली उस भयावह समस्या का नया अध्याय है जिसमें सस्ती और अवैध शराब गरीब तथा निम्न आय वर्ग के लोगों की जान ले लेती है। इस हादसे में कई लोगों की मौत हो गई और अनेक लोग गंभीर रूप से बीमार बताए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं और आठ आरोपियों की गिरफ्तारी की पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि अवैध शराब के पूरे इकोसिस्टम की पहचान कर ली गई है और उसकी कमर तोड़ने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे। यह बयान स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं और इन्हें रोकने के लिए स्थायी समाधान कब निकलेगा?* जहरीली शराब का खतरा नया नहीं है। भारत के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर ऐसे हादसे होते रहे हैं। अवैध शराब बनाने वाले लोग अधिक मुनाफे के लालच में मिथाइल अल्कोहल जैसे जहरीले रसायनों का उपयोग करते हैं। यह पदार्थ मानव शरीर के लिए अत्यंत घातक होता है। इसके सेवन से आंखों की रोशनी जा सकती है, गुर्दे और यकृत प्रभावित हो सकते हैं तथा कुछ ही घंटों में व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। इसके बावजूद अवैध शराब का कारोबार फल-फूल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है सस्ती शराब की मांग, प्रशासनिक निगरानी की कमी और अपराधियों का संगठित नेटवर्क। पुणे की घटना में प्रारंभिक जांच से पता चला है कि अवैध स्पिरिट युक्त शराब तैयार कर विभिन्न क्षेत्रों में बेची गई थी। जिन लोगों ने इसे खरीदा, उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि वे शराब नहीं बल्कि मौत का ज़हर पी रहे हैं। गरीब और मेहनतकश वर्ग अक्सर कम कीमत के कारण ऐसी शराब की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यही वर्ग सबसे अधिक नुकसान भी उठाता है। परिवार का कमाने वाला सदस्य जब इस तरह की दुर्घटना का शिकार होता है तो उसके पीछे पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक और सामाजिक संकट में फंस जाते हैं। यदि देश में जहरीली शराब से होने वाली मौतों का इतिहास देखा जाए तो सबसे अधिक चर्चा बिहार की होती है। बिहार में वर्ष 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है। शराबबंदी का उद्देश्य समाज को नशे से मुक्त करना था, लेकिन इसके बाद अवैध शराब के कारोबार और जहरीली शराब से होने वाली मौतों की कई बड़ी घटनाएं सामने आईं। वर्ष 2016 में गोपालगंज में जहरीली शराब पीने से लगभग 19 लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2021 में पश्चिम चंपारण जिले में जहरीली शराब ने करीब 16 लोगों की जान ले ली। वर्ष 2022 बिहार के लिए सबसे भयावह साबित हुआ। मार्च 2022 में भागलपुर जिले में जहरीली शराब से 40 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। इसी वर्ष दिसंबर में सारण जिले में हुई त्रासदी ने पूरे देश को हिला दिया, जहां 70 से अधिक लोगों की जान चली गई। वर्ष 2023 में भी मोतिहारी और सीवान सहित कई क्षेत्रों में जहरीली शराब से अनेक लोगों की मौत दर्ज की गई। वर्ष 2024 और 2025 में भी छिटपुट घटनाएं सामने आती रहीं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में जहरीली शराब से सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि यह समस्या केवल बिहार तक सीमित नहीं है। गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी समय-समय पर ऐसी घटनाएं हुई हैं। वर्ष 2022 में गुजरात के बोटाद जिले में जहरीली शराब पीने से 40 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इससे पहले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर हुई एक घटना में लगभग 100 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि अवैध शराब का कारोबार पूरे देश के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर बड़ी घटना के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, छापेमारी होती है, गिरफ्तारियां होती हैं और कठोर कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन कुछ समय बाद स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। इसका कारण यह है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने के बजाय केवल तत्काल प्रतिक्रिया पर ध्यान दिया जाता है। अवैध शराब का नेटवर्क गांवों, कस्बों और शहरों तक फैला हुआ है। इसमें शराब बनाने वाले, आपूर्ति करने वाले, बेचने वाले और कई बार संरक्षण देने वाले लोग भी शामिल होते हैं। जब तक इस पूरी श्रृंखला को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक ऐसी घटनाएं रुकना कठिन है। सरकारों को यह समझना होगा कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। कानून का प्रभावी क्रियान्वयन अधिक महत्वपूर्ण है। पुलिस, आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। जहां अवैध शराब बनने या बिकने की आशंका हो, वहां नियमित निगरानी और गुप्त सूचना तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है। आधुनिक तकनीक का उपयोग कर संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। साथ ही दोषियों को त्वरित और कठोर दंड मिलना चाहिए ताकि दूसरों के लिए भी यह एक स्पष्ट संदेश बने। इसके साथ ही सामाजिक जागरूकता भी बेहद जरूरी है। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि कुछ रुपये बचाने के लिए खरीदी गई अवैध शराब उनकी जान ले सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झुग्गी बस्तियों में विशेष अभियान चलाकर स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की जानकारी दी जानी चाहिए। स्कूलों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस अभियान में शामिल किया जा सकता है। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू नशामुक्ति का है। शराब की लत केवल कानून से समाप्त नहीं होती। इसके लिए परामर्श, पुनर्वास और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि सरकारें नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार करें और लोगों को उपचार की सुविधाएं उपलब्ध कराएं तो शराब पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे अवैध शराब की मांग भी घटेगी। महाराष्ट्र की ताजा घटना ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि जहरीली शराब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का भी विषय है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए यह केवल एक समाचार नहीं बल्कि जीवन भर का दुख है। सरकारों की जिम्मेदारी केवल मुआवजा देने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। जहरीली शराब वास्तव में जानलेवा है। यह धीरे-धीरे नहीं, बल्कि कई बार कुछ घंटों में ही जीवन समाप्त कर देती है। हर वर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। महाराष्ट्र की घटना से सबक लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ऐसी व्यापक रणनीति बनानी चाहिए जो अवैध शराब के उत्पादन, वितरण और बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा सके। जब तक अपराधियों के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाएगा और समाज में जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी। अब समय आ गया है कि इस मौत के कारोबार पर स्थायी और निर्णायक प्रहार किया जाए, ताकि किसी परिवार का चिराग जहरीली शराब की भेंट न चढ़े। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 31 मई /2026