लेख
31-May-2026
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पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में जिस तरह से भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा भीड़ के रूप में टीएमसी के कार्यकर्ताओं, उनके कार्यालयों और टीएमसी के बड़े-बड़े नेताओं पर हमले किए जा रहे हैं। यहाँ भाजपा की सरकार बनने के बाद तेजी के साथ हमले बढ़ गए हैं। कार्यालय को गिराया जा रहा है। ऐसा लग रहा है, सत्ता परिवर्तन के साथ ही पश्चिम बंगाल में एक नया गैंग-वॉर शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल में अर्ध सैनिक बल अभी भी तैनात है। जिस तरह से सांसद अभिषेक बनर्जी और उसके बाद सांसद कल्याण बनर्जी को भीड़ द्वारा सड़क पर पीटा गया है, उनका वीडियो बनाया गया है और जिस तरह से राजनीतिक बदले की कार्रवाई की जा रही है। उसके कारण पश्चिम बंगाल के साथ-साथ देश के सभी राज्यों में इसकी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। निर्वाचित सांसदों के साथ हुई हिंसक घटनाओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं। जब असहमति हिंसा और भीड़तंत्र का रूप लेने लगे, तो यह केवल किसी एक दल या नेता की समस्या नहीं रह जाती है बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए चिंता का विषय बन जाता है। पिछले एक दशक में जिस तरह से विपक्षी दलों के ऊपर सत्ता पक्ष के द्वारा ईडीसीबीआई अब एसआईआर के माध्यम से जो राजनीतिक लड़ाई शुरू हुई थी अब वह हिंसक रूप लेती चली जा रही है। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद जिस तरह की स्थितियां बनी हैं, यह काफी चिंताजनक है। देश इस समय अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, केंद्र एवं राज्य सरकारों की असंवेदनशीलता न्याय पालिका का सरकार के पक्ष में होना। जन आंदोलनो को सरकार एवं पुलिस द्वारा सख्ती से दबाना। मुकदमों में लंबे समय तक जेल में रखने के कारण वैसे ही जन सामान्य में असंतोष है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं अब देखने को आ रही हैं, उसने जनमानस और युवाओं में बढ़ती निराशा को संवेदनशील बना दिया है। जब आम नागरिक को यह महसूस होने लगता है, उसकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है, तब उसका असंतोष विभिन्न रूपों में सामने आने लगता है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों के बीच यदि हिंसा के माध्यम से आतंक फैलाने या सत्ता को मजबूत करने का कार्य किया जाता है। ऐसी स्थिति में भीड़ को एक नया रास्ता खुद राजनीतिक दल और राजनेता दिखा रहे हैं। वर्तमान स्थिति में भीड़ तंत्र को संभाल पाना किसी भी व्यवस्था के लिए संभव नहीं होता है। लोकतंत्र में संवाद, चुनाव और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर जब आम आदमी का विश्वास खत्म हो जाए, जब भीड़ न्याय करने लगे, तो स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के कुछ वर्षों में हुई इस तरह की घटनाओं से राजनीतिक दलों खासकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सबक लेने की जरूरत है। इतिहास बताता है, जन-असंतोष को लंबे समय तक प्रशासनिक शक्ति के बल पर दबाकर नहीं रखा जा सकता। राजनीतिक अस्थिरता, महंगाई, भ्रष्टाचार इत्यादि ने जनता के असंतोष को बड़े बदलावों को जन्म दिया है। प्रत्येक देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जिस समय पर हो रही हैं, इन घटनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है, इन घटनाओं से सीख लेने की जरूरत है। जनता की भावनाओं को समय रहते समझना और उनका समाधान करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद जिस तरह से टीएमसी के कार्यकर्ताओं, सांसदों, जनप्रतिनिधियों पर हमले हो रहे हैं। चुनाव के समय अर्ध सैनिक बलों के लाखों जवान तैनात किए गए हैं। उनकी तैनाती में यदि इस तरह के हमले हो रहे हैं। यह चिंता का सबसे बड़ा विषय है। यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का भी प्रश्न है, जो गेंगवार की तरह काम कर रही है। विरोधियों को लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्वी के बजाय शत्रु के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसी सोच अंततः संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करती है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा। लोकतंत्र की शक्ति संवाद में है। सभी संवैधानिक संस्थाओं कानून और नियम में यदि आम जनता को विश्वास होगा, तभी कानून व्यवस्था और न्यायपालिका पर लोगों को भरोसा होगा। जनता के बीच बढ़ती नाराजगी, युवाओं की बेचैनी और सामाजिक असंतोष को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से दूर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए ठोस नीतिगत निर्णय, पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है। आवश्यकता इस बात की है, सभी राजनीतिक दल विशेष रूप से जो सत्ता में काबिज है वह राजनीतिक दल हिंसा और बदले की राजनीति से दूरी बनाएं। लोकतांत्रिक संस्थाओं को जनता का विश्वास मजबूत करने और निष्पक्षता को लेकर जनता का विश्वास जीतना होगा। समाज में यह धारणा बनने लगे कि समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। जब न्यायपालिका ही युवा बेरोजगारों को कॉकरोच कहने लगे। शासन और प्रशासन में बैठे हुए लोगों की कोई जिम्मेदारी तय ना हो। ऐसे समय पर भीड़ तंत्र स्वयं निर्णय करने के लिए सड़कों पर निकल पड़ती है। इस भीड़ के पास इतनी ऊर्जा होती है, जिसके सामने बडी -बड़ी शक्तियां बेबस हो जाती हैं। भीड़ तंत्र के पास कोई विवेक नहीं होता है। जिसके कारण सभी को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जिस तरह से सड़कों पर आंदोलन होना शुरू हो गए हैं। उसने 1974 और 75 के आंदोलन की याद ताजा करा दी है। जिस तरह के आंदोलन देखने को मिल रहे हैं। यह भारतीय लोकतंत्र संविधान और सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत हैं। इसका प्रभाव किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति धीरे-धीरे पूरे देश की लोकतांत्रिक संस्कृति को प्रभावित कर सकती है। एसजे/ 31 मई /2026