लेख
31-May-2026
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नेपाल में भ्रष्टाचार बेरोजगारी और पारंपरिक राजनीतिक दलों के खिलाफ उठे युवा विद्रोह ने जिस उम्मीद के साथ नई राजनीति को जन्म दिया था अब वही उम्मीद निराशा में बदलती दिखाई दे रही है। 27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री बने रैपर बालेंद्र शाह उर्फ बालेन को युवाओं ने परिवर्तन का प्रतीक माना था। माना गया था कि वे पुराने नेताओं की विफलताओं को पीछे छोड़कर नेपाल को नई दिशा देंगे। लेकिन महज 60 दिनों के भीतर उनकी सरकार सवालों के घेरे में आ गई है। जनता पूछ रही है कि केवल लोकप्रियता और आक्रोश के सहारे क्या कोई देश चलाया जा सकता है। क्या अनुभव के बिना शासन संभव है। क्या भाषण और सोशल मीडिया की लोकप्रियता प्रशासनिक क्षमता का विकल्प बन सकती है। नेपाल में आज जो स्थिति बन रही है वह केवल एक व्यक्ति की विफलता नहीं बल्कि उस सोच की विफलता है जिसमें अनुभव को महत्वहीन मान लिया गया था। युवा पीढ़ी ने पुराने दलों से नाराज होकर बदलाव तो चुना लेकिन शासन चलाने के लिए केवल गुस्सा पर्याप्त नहीं होता। प्रशासन कानून विदेश नीति अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन को संभालने के लिए अनुभव और परिपक्वता दोनों जरूरी होते हैं। यही कारण है कि बालेन सरकार अब बैकफुट पर दिखाई दे रही है। वादों और वास्तविकता के बीच सरकार फंसी नजर आ रही है। बालेन सरकार ने सत्ता में आते ही 100 सूत्रीय शासन सुधार एजेंडा पेश किया था। दावा किया गया था कि भ्रष्टाचार खत्म होगा बेरोजगारी कम होगी और प्रशासन को पारदर्शी बनाया जाएगा। लेकिन सरकार की अपनी वेबसाइट गवर्नमेंट ट्रैकर के अनुसार अधिकांश योजनाएं लंबित हैं। दो महीने में ही सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। जनता को लगने लगा है कि बड़े बड़े वादे केवल भाषणों और वेबसाइटों तक सीमित रह गए हैं। सबसे बड़ा सवाल प्रधानमंत्री की कार्यशैली को लेकर उठ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान बेहद कम बोलने वाले बालेन ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी देश को संबोधित नहीं किया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस तक नहीं की। संसद से अचानक गायब होना और राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान सदन छोड़ देना लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में जनता संवाद चाहती है लेकिन यहां संवाद की जगह चुप्पी दिखाई दे रही है। भारत विरोधी फैसलों सेभी नाराजगीबढ़ी है।नेपाल की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारत पर निर्भर है। रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर दवाइयों और खाद्य सामग्री तक बड़ी मात्रा में सामान भारत से नेपाल जाता है। ऐसे में बालेन सरकार द्वारा भारतीय सामानों पर भारी टैक्स लगाना आम लोगों और व्यापारियों को परेशान कर रहा है। 100 नेपाली रुपए से अधिक मूल्य के सामानों पर 5 से 80 प्रतिशत तक टैक्स लगाने के फैसले ने बाजार में असंतोष बढ़ा दिया है। नेपाल के कई व्यापारी इसे अघोषित नाकाबंदी बता रहे हैं। आम जनता को लग रहा है कि सरकार ने भावनात्मक राजनीति के दबाव में ऐसा फैसला लिया है जिसका आर्थिक नुकसान जनता को भुगतना पड़ रहा है। किसी भी देश की विदेश नीति भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि व्यावहारिकता के आधार पर चलती है। भारत और नेपाल के बीच रोटी बेटी का संबंध रहा है। ऐसे में आर्थिक टकराव नेपाल जैसे छोटे देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। बालेन सरकार ने छात्र संगठनों और कर्मचारी यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए अध्यादेश जारी किए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन पर रोक लगा दी। इससे सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति बन गई। लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच संतुलन जरूरी होता है लेकिन अनुभवहीन नेतृत्व अक्सर जल्दबाजी में ऐसे फैसले ले लेता है जिनसे संवैधानिक संकट पैदा हो जाता है। काठमांडू घाटी में हजारों झुग्गियों और अवैध ढांचों को तोड़ा गया। इस कार्रवाई में हजारों गरीब और भूमिहीन लोग बेघर हो गए। सरकार पुनर्वास की स्पष्ट योजना तक नहीं दे सकी। एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की। जनता के बीच यह संदेश गया कि सरकार विकास के नाम पर गरीबों के प्रति संवेदनहीन हो रही है। किसी भी सरकार की असली परीक्षा संकट के समय होती है। यदि विकास योजनाओं में मानवीय दृष्टिकोण न हो तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। यही स्थिति नेपाल में दिखाई दे रही है। गरीबों और युवाओं ने जिस उम्मीद के साथ नई सरकार को चुना था वही अब आक्रोश में बदल रही है। मंत्रियों के इस्तीफे और बढ़ती अव्यवस्था बालेन सरकार के दो प्रमुख मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी की गलत नियुक्ति का आरोप लगा जबकि गृह मंत्री सूदन मुरंग एक कारोबारी से रिश्तों के कारण जांच के घेरे में आ गए। इससे सरकार की साख को बड़ा झटका लगा है। जनता पूछ रही है कि जब नई राजनीति का दावा किया गया था तो फिर पुराने तरीके क्यों अपनाए जा रहे हैं। नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता का शिकार रही है। वहां सरकारें बनती और गिरती रही हैं। लेकिन नई सरकार से उम्मीद थी कि वह कम से कम प्रशासनिक स्थिरता और नैतिकता का उदाहरण पेश करेगी। दुर्भाग्य से ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। नेपाल का लोकतांत्रिक इतिहास लगातार अस्थिरता से भरा रहा है। राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना के बाद भी वहां राजनीतिक दल स्थायी शासन देने में सफल नहीं रहे। बार बार सरकारें बदली गईं। गठबंधन टूटते रहे और सत्ता संघर्ष चलता रहा। यही कारण है कि नेपाल में विकास की गति धीमी रही। नेपाल में बहुत कम सरकारें अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर पाई हैं। पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला से लेकर पुष्पकमल दहल प्रचंड और केपी शर्मा ओली तक कई नेताओं की सरकारें राजनीतिक संकटों में घिरती रहीं। केपी शर्मा ओली की सरकार अपेक्षाकृत स्थिर मानी गई लेकिन वह भी अंततः विवादों और आंतरिक संघर्षों का शिकार हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि नेपाल की राजनीति में विचारधारा से अधिक सत्ता संघर्ष हावी रहा है। अब बालेन सरकार भी उसी रास्ते पर जाती दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सत्ता में पारंपरिक नेता नहीं बल्कि एक ऐसा चेहरा है जिसे प्रशासनिक अनुभव नहीं है। इससे यह साबित होता है कि केवल नया चेहरा होना पर्याप्त नहीं होता। शासन चलाने के लिए अनुभव संगठन क्षमता और निर्णय लेने की परिपक्वता आवश्यक होती है। अनुभव का कोई विकल्प नहीं जीवन हो या राजनीति अनुभव सबसे बड़ी पूंजी होता है। जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में खुद को साबित करता है वही नेतृत्व के योग्य माना जाता है। अनुभवहीन व्यक्ति सपने तो दिखा सकता है लेकिन उन सपनों को धरातल पर उतारना उसके लिए कठिन होता है। नेपाल में यही हो रहा है। बालेन शाह ने युवाओं की भावनाओं को समझा लेकिन प्रशासनिक चुनौतियों को समझने में वे कमजोर साबित हो रहे हैं। राजनीति केवल लोकप्रियता का खेल नहीं है। यहां धैर्य संवाद दूरदृष्टि और संस्थाओं के साथ संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। यदि नेतृत्व जल्दबाजी में फैसले लेगा तो उसका परिणाम अराजकता के रूप में सामने आएगा। नेपाल की मौजूदा स्थिति यही संकेत दे रही है। नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।नेपाल आज दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। एक ओर जनता पुराने राजनीतिक दलों से निराश है दूसरी ओर नई राजनीति भी भरोसा कायम नहीं कर पा रही है। इससे लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर हो सकता है। यदि जनता को हर बार केवल असफलता मिलेगी तो निराशा और अस्थिरता बढ़ेगी। नेपाल को अब ऐसी राजनीति की जरूरत है जिसमें युवाओं की ऊर्जा और अनुभवी नेतृत्व दोनों का संतुलन हो। केवल विरोध की राजनीति से देश नहीं चलता। शासन के लिए व्यावहारिक सोच मजबूत प्रशासनिक समझ और जिम्मेदारी जरूरी होती है। नेपाल को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो लोकप्रियता से आगे बढ़कर स्थिरता और विकास पर ध्यान दें। आज नेपाल की जनता यह समझने लगी है कि परिवर्तन का मतलब केवल नया चेहरा नहीं होता। असली परिवर्तन वह होता है जो व्यवस्था को बेहतर बनाए जनता का विश्वास जीते और देश को स्थिरता दे। यदि नई राजनीति भी पुरानी गलतियों को दोहराएगी तो जनता का मोहभंग होना स्वाभाविक है। (L 103 जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो।99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 31 मई 26