हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ेगी सैन्य चुनौती बीजिंग,(ईएमएस)। चीन ने एक बार फिर दुनिया को अपनी बढ़ती सैन्य और नौसैनिक महत्वाकांक्षाओं से अवगत करा दिया है। उत्तरी चीन के डालियान शिपयार्ड से सामने आई नई सैटेलाइट तस्वीरों से यह पुष्टि हो गई है कि बीजिंग अपने पहले परमाणु-संचालित सुपर एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण कार्य को बेहद तेजी से आगे बढ़ा रहा है। यह महाकाय युद्धपोत हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में चीन के दीर्घकालिक प्रभुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक बनने जा रहा है। पिछले एक वर्ष के भीतर इस जहाज के विभिन्न हिस्सों को जोड़कर एक स्पष्ट और विशाल ढांचा खड़ा कर लिया गया है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि निर्माण की यह तेज गति चीन की औद्योगिक और नौसैनिक क्षमता का बड़ा संकेत है और यह परमाणु सुपरकैरियर 2030 के शुरुआती वर्षों में बनकर पूरी तरह तैयार हो सकता है। चीन का मुख्य लक्ष्य अब केवल अपने समुद्री तटों की सुरक्षा करना नहीं है, बल्कि वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की श्रेष्ठता को सीधी चुनौती देना चाहता है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का लक्ष्य साल 2035 तक अपने बेड़े में छह नए विमानवाहक पोत शामिल करने का है, जिससे उसके पास कुल नौ एयरक्राफ्ट कैरियर हो जाएंगे। यह नया परमाणु सुपरकैरियर चीन के मौजूदा फुजियान कैरियर से भी अधिक विनाशकारी होगा। परमाणु ऊर्जा प्रणाली से लैस होने के कारण इसकी परिचालन सीमा लगभग असीमित हो जाएगी और इसे बार-बार ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। इस जहाज में आधुनिक विमान लॉन्च कैटापल्ट और तीन एयरक्राफ्ट लिफ्ट लगाए जाने की संभावना है, जिससे यह पुराने कैरियरों की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक तेजी से लड़ाकू विमानों को तैनात कर सकेगा। इस सुपरकैरियर पर चीन के सबसे घातक और आधुनिक हथियार तैनात किए जाएंगे, जिनमें पांचवीं पीढ़ी के जे-35 स्टील्थ फाइटर, जे-15टी लंबी दूरी के फाइटर जेट, जे-15डी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमान और केजे-600 एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम शामिल हैं। यह जहाज समुद्र में चलता-फिरता एक अत्याधुनिक युद्ध कमांड सेंटर साबित होगा। इस परमाणु सुपरकैरियर के आने से दक्षिण चीन सागर, ताइवान, जापान, फिलीपींस, वियतनाम और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां काफी बढ़ सकती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ चीन का यह कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं अमेरिका का अत्याधुनिक विमानवाहक कार्यक्रम तकनीकी समस्याओं से जूझ रहा है। स्पष्ट है कि चीन का यह पहला परमाणु सुपरकैरियर केवल एक सैन्य परियोजना नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की एक सोची-समझी कूटनीतिक और सैन्य चाल है। वीरेंद्र/ईएमएस 01 जून 2026