‘‘ कठघरे में सिर्फ मीडिया क्यों ’? ‘‘दर्शक भी उतने ही गुनहगार?’’ आज के दौर में मीडिया की शक्ति निर्विवाद है। सरकार की छवि निर्माण से लेकर जनमत को प्रभावित करने तक उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के उभार से लेकर अन्ना आंदोलन और उसके बाद अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक उदय तक मीडिया की भूमिका निसंदेह महत्वपूर्ण रही है। शायद इसीलिए मीडिया से सामान्यतया कोई ‘‘पंगा’’ तब तक नहीं लेना चाहता है, जब तक पानी सिर के ऊपर न निकल जाए। फिल्मी कलाकार ‘‘सुशांत सिंह राजपूत’’ का मीडिया ट्रायल हो या ‘‘ऑपरेशन सिंदूर’’ जैसी संवेदनशील सैन्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रमों की अतिरंजित कवरेज जैसे अनेकानेक विषय; पर मीडिया का प्रसारण हर बार एक शब्द गूंजता है ‘‘टीआरपी’’। आखिर ‘‘टीआरपी’’ है क्या बला? और इस ‘‘चूहा-बिल्ली के खेल’’ का असली खलनायक कौन? टीआरपी क्या है ? मीडिया की ‘‘आन बान शान’’ के आकलन का एकमात्र बैरोमीटर ‘‘टीआरपी’’ है। टीआरपी मतलब (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) किसी टीवी कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता का इकलौता मापदंड है। यह बताता है कि ‘‘लक्षित’’ दर्शकों में से कितने प्रतिशत लोग किसी विशेष कार्यक्रम या चैनल को देख रहे हैं। सरल शब्दों में कहें तो, टीआरपी मीडिया जगत की वह ‘‘मुद्रा’’ (करेंसी) है, जिससे उसका बाजार भाव व रुतबा तय होता है। दूसरे शब्दों में यह व्यापारी के लिए व्यापार की बिक्री के आंकड़े के महत्व के समान है। ‘‘टीआरपी का महत्व ’’। किसी चैनल की टीआरपी कितनी अधिक होती है, विज्ञापनदाताओं से उसे महंगे दर पर अधिक विज्ञापन मिलने से उतनी ही अधिक आय प्राप्त होती है। यही कारण है कि चैनलों के बीच दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की निरंतर गला-काट प्रतिस्पर्धा होकर यह कई बार निम्न स्तर तक चली जाती है। टीआरपी केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। अधिक दर्शक संख्या चैनल की राजनीतिक दखलंदाजी और सामाजिक प्रभावशीलता भी बढ़ाती है। सत्ता, कॉरपोरेट जगत और रसूखदार तबके स्वाभाविक रूप से उन मंचों के निकट रहना चाहते हैं, जिनकी पहुंच जनता के बीच व्यापक हो। मीडिया हाउस को भी सत्ता और कॉरपोरेट जगत के निकट आने का फायदा मिलता है। इसलिए वे उसके आस-पास रहने का प्रयास करते है। ‘‘टीआरपी की गणना कैसे होती है?’’ भारत में टीआरपी की गणना और प्रकाशन BARC (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) द्वारा किया जाता है। यह ब्रॉडकास्ट एडवरटाइजर्स और एजेंसियां का संयुक्त संगठन है। इसके लिए देशभर के चयनित घरों में विशेष उपकरण (people meter) लगाए जाते हैं, जो यह रिकॉर्ड करते हैं कि कौन-सा चैनल कितनी देर तक देखा गया। इस आंकड़े का विश्लेषण आयु, लिंग, ग्रामीण-शहरी पृष्ठभूमि तथा सामाजिक-आर्थिक वर्गों के आधार पर ‘‘वेटेज’’ देकर किया जाता है और फिर पूरे देश के दर्शकों का अनुमान लगाया जाता है। इसी आधार पर साप्ताहिक टीआरपी भी रिपोर्ट जारी होती है। ‘‘महत्वपूर्ण प्रश्न! दोषी कौन ?’’ जब भी कोई चैनल किसी घटना को ‘‘राई का पहाड़’’ बनाकर सनसनीखेज तरीके से प्रसारित करता है (कुछ उदाहरण ऊपर दिए गए हैं), तो तुरंत तोहमत लगती है कि यह सब ‘‘टीआरपी का खेल’’ है। मानो पत्रकारिता की सारी विकृति की जड़ यही एक शब्द है। तथापि यह आरोप पूरी तरह निराधार नहीं है। लेकिन क्या सारा ठीकरा मीडिया पर फोड़ना आधे सच को देखना नहीं? वास्तव में इसी आरोप में जनता की अंशदायी (योगदान), ‘‘सहभागिता’’ भी छुपी हुई है। टीआरपी किसी चैनल के कार्यक्रम में नहीं, बल्कि वह दर्शकों के ड्राइंग रूम में बनती है। विडंबना देखिये, जिस कंटेंट को लोग ‘‘चटकारे लेकर’’ देखते हैं, भरी महफिल में उसको कोसते भी है। मीडिया को कोसना और खुद को ‘‘दूध का धुला’’ बताना अपना ‘‘उल्लू सीधा करना’’ होगा। यहीं से मुद्दे का दूसरा पक्ष सामने आता है। ‘‘आखिर टीआरपी आती कहां से है ?’’ यदि दर्शक किसी कार्यक्रम को देखना ही बंद कर दें, तो उसकी टीआरपी स्वतः गिर जाएगी। बाजार का सिद्धांत है ‘‘जो बिकता है, वही बाजार में दिखाई देता है’’। यदि सनसनी, विवाद, भावनात्मक उत्तेजना और उत्तेजक बहसों वाले कार्यक्रम लगातार ऊंची टीआरपी प्राप्त करते हैं, तो इसका अर्थ यही है कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें देख भी रहा है। ऐसे में मीडिया की आलोचना करते समय दर्शकों की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज करना वास्तविकता से आंख मूंदना होगा। क्या इसके लिए जनता भी दोषी नहीं है? यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति मिठाई खरीद कर खाए और फिर केवल हलवाई को मधुमेह के लिए दोषी ठहरा दे। ‘‘मीडिया की भी जिम्मेदारी कम नहीं’’ । इसका अर्थ यह नहीं कि मीडिया अपनी जवाबदेही से मुक्त हो जाता है। पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, ‘‘धर्म’’ भी है। इसका उद्देश्य केवल दर्शकों की पसंद का पीछा करना नहीं, बल्कि समाज को तथ्यपरक, संतुलित और विश्वसनीय सूचना उपलब्ध कराने का सार्वजनिक दायित्व भी है। दर्शकों की कमजोरी को ‘‘कैश’’ करने लगे तो प्रेस का मूल उद्देश्य ही धराशायी हो जाएगा। लोकतंत्र में मीडिया समाज का दर्पण है, तमाशा नहीं। टीआरपी की अंधी दौड़ के चलते यदि समाचार, मनोरंजन और फूहड़ मजाक, व्यंग की रेखा धुंधली हो जाए, तथ्यों की जगह उत्तेजना ले ले और ‘‘बहस’’ की जगह ‘‘शोर’’ हावी हो जाए, एक कार्यक्रम का नाम ही ‘‘हल्ला बोल’’ ही है, दंगल, महाभारत, आर-पार है तो पत्रकारिता की साख ‘‘मिट्टी में मिलना’’ तय है। शायद यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में दर्शक पारंपरिक टीवी मीडिया से हटकर डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हुए हैं। सूचना के स्रोत बढ़े हैं और दर्शकों के पास विकल्प भी। ‘‘ टीवी दर्शकों के गिरते आंकड़े’’ । हाल में ही अंजना ओम कश्यप ने ‘‘हल्ला बोल’’ कार्यक्रम में प्राइवेट कोचिंग इंस्टिट्यूट के मालिकों के संबंध में कोचिंग माफिया के संबोधन के साथ बहुत ही विवादित टिप्पणी की थी, जो ‘‘आग की तरह’’ वायरल हुई। इसका कारण भी टीआरपी बताया गया। लेकिन शायद यह पहली बार हुआ कि मीडिया के ‘‘हल्ला बोल’’ का जवाब सोशल मीडिया ने भी हल्ला बोल कर दिया। टीवी चैनलस् खासकर मेनस्ट्रीम मीडिया, जिसे एक वर्ग ने गोदी मीडिया का नाम दिया, को संभल जाना चाहिए कि उनकी टीआरपी पिछले कुछ सालों में गिरकर कहां पहुंच गई है? लगभग 30 से 40 मिलियन दशकों की कमी पिछले 10 सालों में आई है और अगले 10 सालों में यह कमी 70 मिलियन तक पहुंचाने की आशंका है। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग पलायन कर सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर चला गया है (लगभग चार गुना)। रेवेन्यू में 10 गुना वृद्धि हुई जो 2024 में टीवी रेवेन्यू को पार कर गई। विज्ञापन की कुल आय में लगभग 60% की भागीदारी सोशल मीडिया की हो गई। शायद इसीलिए विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स के मामले में रैंकिंग मापने वाली संस्था RSF के अनुसार भारत विश्व के 180 देशों में खिसककर 157 वें स्थान पर आ गया। निष्कर्ष। टीआरपी के खेल में दोष व दायित्व दोनों साझा हैं। मीडिया वही परोसता है, जिसे देखने वाले मौजूद हैं, (मांग और पूर्ति का सिद्धांत) और दर्शक वही देखते हैं, जो उन्हें लुभाता है। स्वस्थ पत्रकारिता और स्वस्थ जनमत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कहावत है ‘‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’’। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) ईएमएस/05/06/2026