लेख
08-Jun-2026
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आज की युवा पीढ़ी मौजूदा हालातों को करीब से देखकर यह सोचने को मजबूर है कि आजादी के पहले देश पर राज करने वाले विदेशी शासक अच्छे थे या आज के हमारे कथित अपने देसी शासक? हमारे देश को आजाद हुए आठ दशक होने को आए, अगले साल हम अस्सीवीं आजादी की वर्षगांठ मनाएगें किंतु क्या हमारे सरपरस्त राजनेताओं ने इतने लम्बे अंतरात में कभी एक बार भी हमारे देश की स्थिति और प्रजातंत्र की विसंगतियों को दूर करने के बारे में गंभीर चिंतन किया? आजादी के बाद से अब तक मोदी जी का लम्बा शासनकाल रहा, पं. नेहरू का सत्रह वर्ष, इंदिरा जी का अठारह वर्ष और अब मोदी जी के शासनकाल का बारह वर्षिय एक युग पूरा होने जा रहा है, क्या इतने लम्बे अंतराल में हमारे देश या देशवासियों की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव या कथित क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आया? शायद नही.... क्यांेकि करीब-करीब हमारे देसी नेताओं का भी शासन का पैटर्न वही है, जो हमें अंग्रेजो से विरासत मंे मिला, राजनेताओं की चुनावी मुख्य मुद्दा और सरकारी तंत्र पर विराजित मुख्य मुद्दों में काफी बदलाव देखा जाता है। अर्थात् अब ‘सेवक’ और ‘मालिक’ के मुद्दों में फर्क करना मुश्किल हो रहा है। आज की युवा पीढ़ी इसी विश्लेषण मंे व्यस्त है और वह इसका परिणाम सामने आने के बाद नई राजनीतिक दिशा तय करने वाली है, जिससे कि वह हमारे प्रजातंत्र को उसके वास्तविक लक्ष्य के करीब पहुंचा सके और साथ ही हर भारतीय का अपना सपना पूरा हो सके, इसलिए आज यही मुख्य मुद्दा हर कहीं आत्मचिंतन का मुद्दा बना हुआ है और अब तो यह स्पष्ट नजर आने लगा है कि मौजूदा शिक्षित-प्रशिक्षित युवा राजनीतिक पीढ़ी ही इस देश व जनविरोधी चलन को खत्म कर सकती है, इसलिए मेरी अपनी सोच यही है कि हमारे देश के राजनीतिक प्रशासनिक व जनतंत्र में जो घातक विसंगतियां नजर आ रही है, उन्हें युवा पीढ़ी ही खत्म करेगी और वह इस दिशा में गंभीर भी है, इसलिए मेरी दृष्टि में आज देश में भाजपा-कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता नही है, बल्कि राजतंत्र व देश की जागरूक व शिक्षित युवा पीढ़ी के बीच प्रतिद्वंदिता है और निश्चित रूप से इसमें विजयश्री युवा पीढ़ी को ही मिलेगी। और देश को अपना ‘चरागाह’ मानने वाले स्वार्थी व कुर्सी लौलूप राजनीतिकों की पराज्य सुनिश्चित है। कुल मिलाकर राजनीतिक रूप से देश अभी इसी दो राहे पर खड़ा है, जिसे शीघ्र ही सही व प्रगति के रास्ते पर चलने की दिशा मिलेगी। इसलिए फिलहाल तो इंतजार ही विकल्प है, दूसरा कुछ नहीं। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 8 जून /2026