लेख
05-Jun-2026
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लोकसभा के पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ के रूप में पहचान रखने वाले सुभाष कश्यप का गुरुवार को निधन हो गया है। संविधान और लोकतंत्र को लेकर जिस तरह की चर्चाएं पिछले कुछ वर्षों से चल रहे हैं उसको लेकर उनके निधन के बाद उनकी कही हुई बातों और उनके अनुभव को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के साथ भी काम किया था। वर्ष 1953 में वह लोकसभा सचिवालय में पदस्थ हुए थे। आजादी के बाद 1950 में संविधान लागू हुआ था। उसके बाद से संसद ने जिस तरह से काम किया है। संविधान के अनुसार लोकसभा, राज्यसभा और विधान-सभाओं के संचालन के नियम और प्रक्रियाओं को बनाया गया। उनमें संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की एक बड़ी भूमिका थी। अनुभव के आधार पर संसदीय परंपराओं को सशक्त बनाने के लिए समय-समय पर उनके द्वारा जो प्रयास किए गए, उसके कारण सारे देश एवं दुनिया में उनकी एक अलग पहचान बनी थी। संसदीय प्रणाली में जटिल विषयों को उन्होंने एक विशेष तरह से नई दिशा देने का प्रयास किया। उन्होंने कई किताबें लिखीं, जो सारी दुनिया भर में कई भाषाओं में प्रकाशित हुईं। नेशनल बुक ट्रस्ट ने उनकी अवर पार्लियामेंट की जो किताब प्रकाशित की थी, उसने बिक्री का एक नया इतिहास रचा था। डॉक्टर सुभाष कश्यप ने जब 1985 में दल-बदल कानून पास हुआ, उस समय उन्होंने स्पष्ट राय व्यक्त की थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था, कि दल-बदल कानून में स्पीकर को जो अधिकार दिए गए हैं वह ठीक नहीं हैं। इससे इस कानून का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनका स्पष्ट रूप से मानना था, दल-बदल मामले में चूंकि स्पीकर एक राजनीतिक प्रक्रिया से बहुमत के आधार पर चुनकर आता है, ऐसी स्थिति में उससे निष्पक्षता की उम्मीद करना ठीक नहीं है। वे चाहते थे, कि दल-बदल मामले में चुनाव आयोग अथवा न्यायपालिका का फैसला सही और निष्पक्ष होगा। संसद कानून बनाती है, उनकी राय को कोई महत्व नहीं मिला और आसंदी को ही दल-बदल कानून के अंतर्गत फैसला करने का अधिकार दिया गया। जिसके कारण दल-बदल कानून होते हुए भी धड़ल्ले से सांसद विधायक एक दल छोड़कर दूसरे दल में जा रहे हैं। दल-बदल विधेयक लागू हुए 40 साल का समय हो चुका है, लेकिन दल-बदल के कारण ही कई सरकारें आंई और कई सरकारें चली गईं। आसंदी के द्वारा जो भी फैसले आए हैं वह कभी निष्पक्ष नहीं रहे। स्पीकर के फैसले हमेशा सत्ता पक्ष के साथ देखने को मिले हैं। इसी प्रकार से सुभाष कश्यप ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को भी सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पदों पर नियुक्ति करने पर रोक लगाने का सुझाव दिया। लेकिन उनका यह सुझाव कभी माना नहीं गया। वर्तमान संदर्भ में यही कहा जा सकता है, जब नैतिक मूल्य पूरी तरह से समाप्त होते जा रहे हैं। नियम और कानून का पालन अब फायदे के लिए किया जा रहा है, इन्हें अपने फायदे के लिए किस तरह से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, उस हिसाब से होने लगे हैं। विपक्ष लगातार कई वर्षों से कह रहा है कि संविधान खत्म होता जा रहा है। न्यायपालिका को इसके ऊपर रखते हुए संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा का अधिकार दिया गया था, वह भी सरकार के दबाव में आकर काम कर रही है। संविधान की आड़ में संवैधानिक संस्थाओं द्वारा जिस तरह की मनमानी की जा रही है। इन सबको लेकर आज जब संविधान और लोकतंत्र खतरे में हो, ऐसे समय पर सुभाष कश्यप की जरूरत ज्यादा थी, तब वह इस दुनिया को छोड़कर चले गए हैं। निश्चित रूप से सुभाष कश्यप के कार्यकाल में संसदीय परंपराओं का विकास हुआ। लोकसभा, राज्यसभा और देश की विधानसभा में नए-नए कानून-कायदे बने। बेहतर ढंग से संसदीय परंपराओं का विकास हुआ, लेकिन जब परिस्थितियां बदल रही हैं ऐसे समय पर उनका चले जाना निश्चित रूप से संविधान, लोकतंत्र और देश में एक नुकसान के रूप में देखा जाएगा। वर्तमान में जिस तरह से वह अपनी बात कह पाते थे, अब ऐसा कोई दूसरा शख्स भारत में नजर नहीं आता है जो उनकी कमी को भर सके। ईएमएस / 05 जून 26