राष्ट्रीय
08-Jun-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096.7 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा सुरक्षा, भूगोल और इतिहास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरने वाली यह सीमा कई कारणों से चर्चा में रहती है। इसी सीमा से जुड़ा एक शब्द है ‘नो मैन्स लैंड, इस लेकर आम लोगों के बीच अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत और बांग्लादेश के बीच साल 1975 में तय सीमा संबंधी दिशानिर्देशों के तहत वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा, इस जीरो लाइन कहा जाता है, से 150 गज के भीतर किसी प्रकार का स्थायी या अस्थायी निर्माण नहीं हो सकता है। सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखकर भारत ने अधिकांश क्षेत्रों में कंटीली बाड़ जीरो लाइन से करीब 150 गज पीछे अपने भूभाग में स्थापित की है। बाड़ और वास्तविक सीमा रेखा के बीच मौजूद इस क्षेत्र को आमतौर पर ‘नो मैन्स लैंड’ कहा जाता है। हालांकि पूरी सीमा पर इसकी स्थिति एक जैसी नहीं है। जिन इलाकों में नदियां, पहाड़ या घने जंगल हैं, वहां इस तरह की स्पष्ट पट्टी दिखाई नहीं देती। इछामती, फेनी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों वाले क्षेत्रों में नदी की मध्य धारा को ही दोनों देशों के बीच सीमा माना जाता है। सीमा सुरक्षा नियमों के तहत यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील और नियंत्रित माना जाता है। आम नागरिकों को बिना अनुमति यहां प्रवेश करने की इजाजत नहीं होती। हालांकि कुछ भारतीय गांवों के किसानों की कृषि भूमि बाड़ के दूसरी ओर स्थित है। इसतहर किसानों को अपने खेतों तक पहुंचने के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) से विशेष अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। निर्धारित समय पर गेट खुलते हैं और किसानों को तय समय के भीतर वापस लौटना होता है। विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ‘नो मैन्स लैंड’ का अर्थ यह नहीं है कि यह किसी देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जीरो लाइन के दोनों ओर का क्षेत्र संबंधित देशों की संप्रभु सीमा का हिस्सा होता है। भारतीय क्षेत्र में भारतीय कानून लागू होते हैं, जबकि दूसरी ओर बांग्लादेशी कानून प्रभावी रहते हैं। सीमा पर तैनात सुरक्षा बल नियमित गश्त और निगरानी के जरिए इस क्षेत्र में किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखते हैं। इसका उद्देश्य सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दोनों देशों के बीच शांति एवं व्यवस्था बनाए रखना है। आशीष/ईएमएस 08 जून 2026