तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जो अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में नई शुरुआत की है। 1948 से 1952 में जिस तरह की राजनीति देश में हो रही थी, उसकी यादों को ताजा कर रही है। तमिलनाडु में विजय की पार्टी टीवीके को कांग्रेस ने समर्थन दिया है। तमिलनाडु सरकार में कांग्रेस पार्टी का एक मंत्री भी है। तमिलनाडु में कांग्रेस का कोई विशेष वर्चस्व नहीं है। केंद्रीय राजनीति में कांग्रेस एक महत्वपूर्ण भूमिका में है। आज भी कांग्रेस पार्टी का सीधा मुकाबला 300 लोकसभा सीटों पर भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों के साथ होता है। वर्तमान की राजनीति में जिस तरह से राजनीतिक दलों के बीच में वैमनष्य देखने को मिलता है, जिस तरह की असुरक्षा की भावना देखने को मिलती है। सत्ता में ज्यादा से ज्यादा सहभागिता मिले इसके लिए राजनीतिक दल हर संभव प्रयास करते हैं इसके विपरीत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने राज्यसभा की दो सीटें सहयोगी दल कांग्रेस को देने का फैसला किया है। उनका मानना है, उनकी पार्टी केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के साथ सहयोग करके तमिलनाडु के हितों का संरक्षण ज्यादा अच्छे तरीके से कर सकती है। दो सांसद उनकी पार्टी के राज्यसभा में चले भी गए, तो वह तमिलनाडु का पक्ष सशक्त तरीके से नहीं रख सकते हैं जितने सशक्त तरीके से कांग्रेस उनकी लड़ाई केंद्र में लोकसभा और राज्यसभा में लड़ सकती है। गठबंधन की राजनीति में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का यह निर्णय, स्वतंत्रता के पश्चात अनूठा है। जब संविधान सभा और केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्माण हो रहा था, उस समय कांग्रेस पार्टी ने सभी समुदाय और सभी राजनीतिक दलों के लोगों को संविधान सभा और मंत्रिमंडल में स्थान देकर मजबूत संविधान और मजबूत सरकार बनाने का काम किया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल में अपने विरोधी और अन्य विचारधारा के लोगों को भी शामिल करके स्वतंत्रता के पश्चात समन्वय की राजनीति का मार्ग अपनाया था। वही मार्ग 2026 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा अपनाया गया है। वर्तमान में एनडीए गठबंधन और इंडिया गठबंधन के रूप में देश के अधिकांश राजनीतिक दल गठबंधन की राजनीति में शामिल हैं। क्षेत्रीय दल एक-एक सीट के लिए अपनी मजबूत दावेदारी रखते हैं। ऐसी स्थिति में तमिलनाडु की राजनीति में मुख्यमंत्री थलापति विजय ने कांग्रेस को राज्यसभा की रिक्त दो सीटें देकर गठबंधन की राजनीति को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का बहुत बड़ा योगदान होता है। क्षेत्रीय राजनीति में भाषा संस्कृति तथा आम जनता के साथ उनका जुड़ाव गहरा होता है। लेकिन केंद्रीय राजनीति में राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार को निर्णय करने पड़ते हैं। संघीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्यों के बीच संबंध बेहतर हों। पिछले एक दशक में इस स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। मोदी सरकार के अस्तित्व में आते ही योजना मंडल को भंग कर दिया गया था। उसके स्थान पर नीति आयोग बनाया गया, नीति आयोग जिस तरीके से काम कर रहा है। उसके बाद से राज्य सरकारें आरोप लगाती रही हैं, केंद्र सरकार उनके साथ न्याय नहीं कर रही है। मनमाने तरीके से संसाधन और धन का बंटवारा किया जा रहा है। जिन राज्यों में गैर भाजपा की सरकारें हैं उनके साथ भेदभाव की शिकायत बढ़ती चली जा रही है। जिस तरह से जाति और धर्म के आधार पर राजनीति हो रही है, उसमें राज्यों के साथ केंद्र सरकार की दूरियां बढ़ रही है। रही सही कसर राज्यपालों ने पूरी कर दी है। राज्य विधानसभा द्वारा लिए गए निर्णय और कानूनों का पालन राज्यपाल नहीं होने देते हैं। एक समानांतर सत्ता राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच में गैर भाजपाई शासित राज्यों में देखने को मिलती है। ऐसी स्थिति में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर दशकों पुरानी राजनीति को स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अपने सहयोगी दल कांग्रेस, जो केंद्र में एक प्रभावी भूमिका में है, उस पार्टी को राज्यसभा की 2 रिक्त सीट देकर, स्वार्थ की राजनीति से इतर विश्वास का नया मार्ग चुना है। उसकी सारे देश में अच्छी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। क्षेत्रीय दल 1990 के दशक के बाद से महत्वपूर्ण भूमिका में आये हुए हैं। केंद्रीय राजनीति में जो भूमिका क्षेत्रीय दलों की होनी चाहिए थी, उसका स्थान सीमित होकर रह गया है। तमिलनाडु से अब बदलाव की एक बयार बही है। अपने सहयोगी दल कांग्रेस पर जो विश्वास मुख्यमंत्री ने किया है उस विश्वास पर कांग्रेस सही उतरे। डीएमके और अन्ना डीएमके का पिछले पांच दशक से मजबूती के साथ तमिलनाडु की राजनीति में वर्चस्व था। बहुत समय के बाद अभिनेता से राजनेता बने विजय तमिलनाडु की जनता के विश्वास का केंद्र बने हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय विचारधारा का पोषण करती है, सभी पक्षों को साथ लेकर चलती है। ऐसी स्थिति में तमिलनाडु से जो परिवर्तन देखने को मिल रहा है वह भारत की राजनीति को एक नई दिशा दे सकता है। इस बात की संभावनाएं बनी हैं। इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रहती है। क्षेत्रीय दल इंडिया गठबंधन में शामिल है। गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों को भाजपा से लड़ना है। इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दल भाजपा के स्थान पर कांग्रेस से ज्यादा लड़ते हुए नजर आते हैं। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके के साथ कांग्रेस राजनीति कर रही थी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। विजय की पार्टी को सबसे ज्यादा सीटों पर विजय प्राप्त हुई । गैर भाजपा की सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया। इससे डीएमके नाराज हो गई। कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। कांग्रेस विजय को समर्थन नहीं देती ऐसी स्थिति में भाजपा वहां अन्ना डीएमके के साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाना चाहती थी। स्टालिन को यह बात समझनी चाहिए। राजनीति में बहुत सारे निर्णय समय और परिस्थिति को देखकर लिए जाते हैं। जिस तरह से स्टालिन ने इंडिया गठबंधन से दूरी बनाई है, इससे ऐसा लगता है कि क्षेत्रीय राजनीति में स्टालिन विजय से डरे हुए हैं। तमिलनाडु की राजनीति को ध्यान में रखते हुए स्टालिन ने इंडिया गठबंधन से दूरी बनाकर एक बड़ी राजनीतिक गलती की है। यही कहा जा सकता है। ईएमएस / 09 जून 26