क्षेत्रीय
10-Jun-2026
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नारायणपुर (ईएमएस)। जिले में नक्सलवाद के खात्में से पहले अबूझमाड़ के कई गांवों में रहने वाले लोगों के लिए बाजार जाना किसी सामान्य काम की तरह नहीं, बल्कि एक अभियान की तरह होता था। अलग-अलग गांवों के ग्रामीण तय दिन पर इकट्ठा होते थे। लगभग हर परिवार से एक सदस्य सुबह 5-6 बजे निकलता था। घंटों पैदल चलने के बाद महाराष्ट्र पहुंचते, जरूरत का सामान खरीदते और फिर रात 9-10 बजे तक घर लौटते थे। बरसात के दिनों में यह सफर और भी कठिन हो जाता था। कई बार नदी-नाले उफान पर होते थे और जंगलों में रात बितानी पड़ती थी। नमक, तेल और राशन जैसी सामान्य चीजें भी यहां के लोगों के लिए संघर्ष का प्रतीक थीं। अब बदली हुई परिस्थितियाें में पदमकोट में लगने वाले हाट बाजार में किराना, सब्जियां, कपड़े, घरेलू उपयोग का सामान और खेती-किसानी से जुड़ी जरूरतें उपलब्ध हैं। बाजार लगने के दिन आस-पास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें एक दिन का समय और लंबा सफर तय नहीं करना पड़ता। गांव के पास ही सामान मिलने से समय, पैसा और मेहनत तीनों की बचत हो रही है। इस बदलाव के पीछे सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी और अभियानों की बड़ी भूमिका रही है। पदमकोट और आसपास के क्षेत्रों में हर 4 से 5 किलोमीटर के दायरे में सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद सड़क निर्माण शुरू हुआ और धीरे-धीरे विकास कार्यों का रास्ता खुला। हालांकि कई सड़कों का निर्माण अभी भी जारी है, लेकिन अब हालात इतने बदल चुके हैं कि व्यापारी मालवाहक वाहनों से सीधे पद्मकोट तक पहुंच रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि पहले इस इलाके में आने का मतलब जोखिम उठाना था। नक्सलियों का डर था, IED का खतरा था और यह संदेश भी था कि बाहरी लोगों की यहां जरूरत नहीं है। लेकिन अब सुरक्षा और सड़क दोनों मिलने से स्थिति बदल गई है। व्यापारियों के मुताबिक, पदमकोट, नेलांगुर और आस-पास के गांवों में अच्छी मांग है। आने वाले समय में यहां व्यापारिक गतिविधियां और बढ़ेंगी, जिससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार और सुविधाएं मिलेंगी। ग्रामीणों का कहना है कि पहले महाराष्ट्र या कुतुल बाजार जाना मजबूरी थी। एक दिन का पूरा समय खर्च हो जाता था। कई बार मौसम खराब होने या रास्ते की परेशानी के कारण जरूरी सामान भी नहीं मिल पाता था। अब गांव के पास बाजार लगने से जीवन आसान हो गया है। जरूरत की अधिकांश चीजें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो रही हैं और लोगों की दूसरे राज्य पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई है। उल्लेखनिय है कि पदमकोट और आस-पास का इलाका कभी नक्सलियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था। इसे नक्सलियों की राजधानी तक कहा जाता था। यहां बाहरी लोगों का प्रवेश लगभग प्रतिबंधित था। ग्रामीण बताते हैं कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति गलती से भी इस इलाके में पहुंच जाता था, तो उसे नक्सली पकड़ लेते थे। व्यापारी यहां आने की सोच भी नहीं सकते थे। नक्सलियों का खौफ, बारूदी सुरंगों का डर और विकास कार्यों पर रोक ने इस पूरे इलाके को दशकों तक देश की मुख्यधारा से अलग रखा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बाजार जैसी सामान्य सुविधाएं भी यहां सपना थीं। नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि सुरक्षा, सड़क और मूलभूत सुविधाओं के विस्तार का असर अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। पदमकोट के अलावा जाटलूर, रेकावाया जैसे इलाकों में बाजार लगना केवल व्यापारिक गतिविधि नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों को कभी पहुंच विहीन और दुर्गम माना जाता था, वहां अब विकास के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। इन इलाकों के ग्रामीण 40 से 50 किमी का सफर तय कर सामान लेने जाते थे। लेकिन, अब गांव में ही बाजार लगने से इन्हें सुविधा मिली है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी सुविधाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी है। सुधीर जैन/चंद्राकर/10 जून 2026