लेख
11-Jun-2026
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जुलाई माह में संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि इस बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक टकराहट देखने को मिल सकती है। महंगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था तथा विभिन्न राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। पिछले सत्र में परिसीमन बिल सरकार संसद में पास नहीं करा पाई थी। बीते महीनों में जिस तरह से सरकार को आर्थिक संकट से गुजरना पड़ रहा है, विदेशी निवेशक शेयर बाजार से निवेश किया धन वापस निकाल रहे हैं। कच्चे तेल के आयात से सरकार की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। ऐसी स्थिति में सरकार मानसून सत्र में कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती है। देश में खाद्य पदार्थों, ईंधन और घरेलू जरूरतों की वस्तुओं की कीमतों को लेकर जनता के बड़े वर्ग में नाराजगी दिखाई दे रही है। किसान संगठन, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), फसल खरीद और कृषि लागत जैसे मुद्दों पर आंदोलित हैं। वहीं नीट पेपर लीक से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्र संगठनों की ओर से सड़क पर असंतोष व्यक्त किया जा रहा है। काकरोच के नाम पर युवा जेन-जी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहा है। विपक्षी दलों द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सरकार के दबाब में काम करने के आरोप हैं। जबकि सरकार इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करती है। सरकार अपने कार्यकाल में हुए विकासकार्यों, कल्याणकारी योजनाओं तथा आर्थिक उपलब्धियों को सामने रखती है। राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती बयानबाजी ने संसद के आगामी सत्र को और महत्वपूर्ण बना दिया है। एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही संसद सत्र के पहले अपने-अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हुए हैं। क्षेत्रीय दलों की भूमिका इस बार विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद का मानसून सत्र आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में यह मानसून सत्र सरकार के लिए संकटभरा हो सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को यदि समुद्र मंथन की उपमा दी जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। समुद्र मंथन में जिस प्रकार देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष के साथ-साथ सहयोग भी था, उसी प्रकार भारतीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उस पौराणिक कथा में पहले विष निकला और अंत में अमृत प्राप्त हुआ था। लोकतंत्र के इस राजनीतिक मंथन से मानसून सत्र में कौन लाभान्वित होगा और किसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही का मंच नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार की नीतियों, विपक्ष की रणनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर व्यापक राजनीतिक बहस का केंद्र बनने जा रहा है। इस राजनीतिक समुद्र मंथन का परिणाम क्या होगा, इसका निर्णय अंततः जनता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं ही तय करेंगी। जिस तरह से सत्ता पक्ष ने लोकसभा एवं राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 6 सांसदों इसके बाद टीएमसी के सांसदों को पार्टी से अलग होकर अलग गुट बनाने या सांसदों से इस्तीफा दिलवाकर विपक्ष को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उसका स्पष्ट संकेत है, मानसून सत्र में सरकार कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। इसके लिए सरकार किसी भी स्तर पर अपने आपको सुरक्षित करने का हरसंभव प्रयास कर रही है। इसका एक संदेश यह भी है, सरकार अंदर से कमजोर है। भाजपा के अंदर से भी असंतोष के स्वर उठने लगे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार ने चारों ओर से सुरक्षित रहने के लिए घेराबंदी शुरु कर दी है। ईएमएस/11/06/2026