राष्ट्रीय
12-Jun-2026


-दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 ड्राफ्ट : 27 जुलाई 2026 तक सुझाव आमंत्रित नया मसौदा दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 एक ऐसे नियामक मॉडल की ओर बढ़ता है जो तकनीकी परिवर्तन के साथ कदम मिलाकर चल सके। दूरसंचार,मीडिया और डिजिटल संचार से जुड़े कानूनों का लगातार पुनरीक्षण करना, प्रसारण और दूरसंचार क्षेत्र को अधिक पारदर्शी सरल,डिजिटल और व्यवसाय -अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया (ईएमएस) । वैश्विक स्तरपर आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी, डिजिटलाइजेशन,कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट आधारित संचार और मीडिया उपभोग के तौर-तरीकों में जिस तीव्र गति से परिवर्तन हो रहा है,उसने सरकारों और नियामक संस्थाओं के सामने यह चुनौती खड़ी कर दी है कि वे समय -समय पर अपने कानूनों और नियमों को नई परिस्थितियों के अनुरूप अद्यतन करें। कोई भी कानून या विनियामक व्यवस्था स्थायी नहीं होती,क्योंकि तकनीक की प्रगति अक्सर उन परिस्थितियों को बदल देती है जिनके आधार पर कानून बनाए गए थे। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश विकसित और विकासशील देश अपने दूरसंचार मीडिया और डिजिटल संचार से जुड़े कानूनों का लगातार पुनरीक्षण कर रहे हैं। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रसारण और दूरसंचार क्षेत्र को अधिक पारदर्शी,सरल, डिजिटल और व्यवसाय- अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है।इसी क्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दूरसंचार अधिनियम, 2023 के अंतर्गत दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया है और नागरिकों, उद्योग जगत, विशेषज्ञों तथा अन्य हितधारकों से 27 जुलाई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह पहल केवल नियमों में संशोधन भर नहीं है,बल्कि भारत के प्रसारण क्षेत्र को डिजिटल युग कीआवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने का प्रयास है। इसलिए प्रत्येक नागरिक कार्य कर्तव्य है कि इस दिशा में उनके पास जो सुझाव हाईवे 27 जुलाई 2026 तक संबंधित प्लेटफार्म पर सबमिट करें।भारत में दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र का नियमन लंबे समय तक 1885 के औपनिवेशिक कालीन टेलीग्राफ अधिनियम के आधार पर संचालित होता रहा।यह अधिनियम उस समय बनाया गया था जब न तो टेलीविजन अस्तित्व में था, न इंटरनेट और न ही डिजिटल मीडिया।स्वतंत्रता के बाद तकनीकी प्रगति के बावजूद कई दशकों तक विभिन्न सेवाओं को अलग- अलग दिशानिर्देशों और प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से नियंत्रित किया जाता रहा।परिणामस्वरूप एक जटिल नियामक ढांचा विकसित हुआ जिसमें टेलीविजन चैनलों, डीटीएच सेवाओं, एफएम रेडियो, सामुदायिक रेडियो, आईपीटीवी और अन्य प्रसारण सेवाओं के लिए अलग-अलग नियम लागू थे। इससे न केवल उद्योग के लिए अनुपालन संबंधी जटिलताएं उत्पन्न होती थीं बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी समय लेने वाली और कई बार अस्पष्ट हो जाती थीं। साथियो, दूरसंचार अधिनियम, 2023 इस संदर्भ में एक ऐतिहासिक विधायी परिवर्तन के रूप में सामने आया था संसद द्वारा पारित यह अधिनियम औपनिवेशिक युग के टेलीग्राफ अधिनियम,1885 का स्थान लेने वाला व्यापक कानून है, जिसका उद्देश्य आधुनिक दूरसंचार और प्रसारण पारिस्थितिकी तंत्र को एक समकालीन कानूनी आधार प्रदान करना है। यह अधिनियम सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला को समाहित करता है और विभिन्न क्षेत्रों के प्रशासन के लिए संबंधित मंत्रालयों और विभागों को अधिकार प्रदान करता है।टेलीविजन,रेडियो और संबंधित प्रसारण सेवाओं के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस अधिनियम के अंतर्गत प्रमुख प्रशासकीय प्राधिकरण की भूमिका निभाता है। साथियों, दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा इसी व्यापक सुधार प्रक्रिया का अगला चरण है।इसका मुख्य उद्देश्य उन विभिन्न दिशानिर्देशों को एकीकृत करना है जो अब तक अलग-अलग समय पर जारी किए गए थे और जिनके आधार पर प्रसारण सेवाएं संचालित हो रही थीं। इनमें भारत में सैटेलाइट टेलीविजन चैनलों के अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग के लिए 2022 की नीति, डीटीएच प्रसारण सेवाओं के लिए 2001 के दिशा-निर्देश, एचआईटीएस सेवाओं के लिए 2009 के दिशा-निर्देश, एफएम रेडियो के चरण-III विस्तार संबंधी नीति, सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए 2024 के संशोधित दिशा- निर्देश तथा आईपीटीवी सेवाओं के लिए 2008 के दिशा -निर्देश शामिल हैं। इन सभी को एक एकीकृत नियमावली के अंतर्गत लाने का प्रयास किया गया है ताकि उद्योग को अलग-अलग नियमों के बजाय एक स्पष्ट और सुव्यवस्थित ढांचा प्राप्त हो सके। साथियों, वैश्विक दृष्टि से देखें तो यह कदम भारत को उन देशों की श्रेणी में स्थापित करता है जो नियामक आधुनिकीकरण को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण साधन मानते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और यूरोपीय संघ के अनेक देशों ने पिछले दशक में मीडिया और संचार क्षेत्र में लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, नियामक सरलीकरण और एकीकृत अनुमोदन प्रणालियों को अपनाया है।भारत द्वारा प्रस्तावित नया ढांचा इसी वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप दिखाई देता है, जहां सरकार का लक्ष्य नियंत्रण और सुविधा के बीच संतुलन स्थापित करना है।मसौदा नियमों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अर्थात कारोबार करने में सुगमता को बढ़ावा देना है। अब तक प्रसारण सेवाओं के लिए विभिन्न प्रकार के आवेदन, अनुमतियां और अनुपालन प्रक्रियाएं अलग-अलग स्वरूप में संचालित होती थीं। प्रस्तावित नियमों के अंतर्गत अनेक दिशानिर्देशों को एकल नियामक ढांचे में समाहित कर दिया जाएगा। इससे निवेशकों, प्रसारण कंपनियों और सेवा प्रदाताओं के लिए नियमों को समझना और उनका पालन करना कहीं अधिक सरल हो जाएगा। विशेष रूप से विदेशी निवेशकों और वैश्विक मीडिया कंपनियों के लिए यह स्पष्टता भारत में निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है। साथियों, नियमों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण है। डिजिटल शासन आज विश्वभर में प्रशासनिक दक्षता का प्रमुख आधार बन चुका है। यदि अनुमतियां,आवेदन नवीनीकरण और अनुपालन प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से संचालित होती हैं तो समय, लागत और मानवीय हस्तक्षेप में उल्लेखनीय कमी आती है। इससे भ्रष्टाचार की संभावनाएं घटती हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनती है। भारत सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान के संदर्भ में यह कदम प्रसारण क्षेत्र में डिजिटल प्रशासन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।मसौदा नियमों में प्रस्तावित एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार ग्रांट ऑफपरमिशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने की अनिवार्यता को समाप्त करना है। अब तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और निजी प्रसारकों के बीच अनुमति प्रदान करने के लिए औपचारिक समझौते किए जाते थे। यह प्रक्रिया कई बार अतिरिक्त समय और प्रशासनिक बोझ उत्पन्न करती थी। नए प्रस्ताव के अनुसार इस आवश्यकता को समाप्त कर दिया जाएगा, जिससे अनुमति प्रक्रिया अधिक सरल और डिजिटल स्वरूप में परिवर्तित हो सकेगी।यह सुधार सरकार की उस सोच को प्रतिबिंबित करता है जिसमें कागजी प्रक्रियाओं को कम करके डिजिटल अनुमोदन प्रणाली को सटीकता से प्राथमिकता दी जा रही है। साथियों, पारदर्शी न्यायनिर्णय तंत्र की स्थापना भी इस मसौदे का एक महत्वपूर्ण आयाम है। किसी भी नियामक व्यवस्था की सफलता केवल नियम बनाने में नहीं बल्कि उनके निष्पक्ष और पारदर्शी प्रवर्तन में निहित होती है। प्रसारण क्षेत्र में लाइसेंस, अनुपालन, विवाद और दंड संबंधी मामलों को लेकर समय- समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। यदि एक स्पष्ट और पारदर्शी न्यायनिर्णय प्रणाली स्थापित होती है तो उद्योग और सरकार के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा विवादों का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा।यह मसौदा नियम केवल उद्योग के लिए ही नहीं बल्किउपभोक्ताओं और नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। मीडिया और प्रसारण सेवाएं लोकतांत्रिक समाज में सूचना के प्रसार का प्रमुख माध्यम हैं। जब नियामक व्यवस्था अधिक स्पष्ट और आधुनिक होती है तो सेवा प्रदाताओं को नवाचार करने का अवसर मिलता है।परिणाम स्वरूप उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाली सेवाएं, अधिक विकल्प और प्रतिस्पर्धी मूल्य प्राप्त हो सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, आईपीटीवी और नई प्रसारण तकनीकों के विकास के साथ यह अपेक्षा की जा सकती है कि भविष्य में भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक उन्नत मीडिया सेवाओं का लाभ मिलेगा। साथियों, हाल के वर्षों में भारत का मीडिया और मनोरंजन उद्योग विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बनकर उभरा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म, इंटरनेट आधारित टेलीविजन, डिजिटल रेडियो और सैटेलाइट प्रसारण जैसी सेवाओं ने पारंपरिक मीडिया परिदृश्य को बदल दिया है।ऐसे में पुराने नियमों और अलग-अलग दिशानिर्देशों पर आधारित व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती थी।नया मसौदा इस वास्तविकता को स्वीकार करता है और एक ऐसे नियामक मॉडल की ओर बढ़ता है जो तकनीकी परिवर्तन के साथ कदम मिलाकर चल सके।यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने हाल ही में दूरसंचार उपभोक्ता शिकायत निवारण विनियमन, 2026 का मसौदा भी सार्वजनिक किया था। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार और नियामक संस्थाएं केवल उद्योग सुधार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उपभोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण व्यवस्था को भी मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र में समानांतर रूप से हो रहे ये सुधार भारत के डिजिटल शासन मॉडल को अधिक उत्तरदायी और आधुनिक बनाने का संकेत देते हैं। साथियों, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के दृष्टिकोण से देखें तो नियामक स्पष्टता और प्रक्रियात्मक सरलता किसी भी बाजार की आकर्षण क्षमता को बढ़ाती है। भारत पहले से ही विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल उपभोक्ता बाजार बनने की दिशा में अग्रसर है। यदि प्रसारण और दूरसंचार क्षेत्र में नियम अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमेय बनते हैं तो विदेशी निवेश,तकनीकी सहयोग और नवाचार को बढ़ावा मिल सकता है। इससे रोजगार सृजन, तकनीकी उन्नयन और आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी हालांकि किसी भी नए नियम की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। इसलिए सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार द्वारा नागरिकों,उद्योग प्रतिनिधियों विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से सुझाव आमंत्रित करना सहभागी शासन की भावना को दर्शाता है। यह सुनिश्चित करता है कि अंतिम नियम केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि व्यावहारिक अनुभव और क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा भारत के प्रसारण और मीडिया क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार का संकेत है। यह मसौदा औपनिवेशिक युग की विरासत से निकलकर डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुरूप एक आधुनिक, एकीकृत,पारदर्शी और व्यवसाय-अनुकूलनियामक ढांचा स्थापित करने का प्रयास करता है। एकल नियमावली, डिजिटल प्रक्रियाएं, सरलीकृत लाइसेंसिंग, जीओपीए की समाप्ति और पारदर्शी न्यायनिर्णय तंत्र जैसे प्रावधान भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मीडिया एवं संचार बाजार के रूप में स्थापित करने में सहायक हो सकते हैं। यदि सार्वजनिक परामर्श के बाद इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो यह केवल प्रसारण उद्योग के लिए ही नहीं बल्कि डिजिटल भारत के व्यापक विजन के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। किशन सनमुखदास भावनानीं/12जून2026