जेपी आंदोलन में कवि नागार्जुन जेलों में बंद थे। वे बाहर निकले तो जेपी आंदोलन के बारे में बयान दिया-“ अब मुझे लगता है कि मैं वेश्याओं और भड़ुओं की गली से लौट आया हूँ।” लोगों ने उन्हें समझाया कि चुप रहिए, कुछ महीनों के बाद चुनाव होगा, आप सांसद बन जायेंगे। “ नागार्जुन ने कहा कि तब मेरा दिमाग़ गोबर से भर जाएगा। जिस नागार्जुन ने आंदोलन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पूछा था- “ इंदू जी, इंदू जी, क्या हुआ आपको/ तार दिया बेटे को , बोर दिया बाप को”, उसी नागार्जुन ने संपूर्ण क्रांति को भ्रांति विलास कहा। 5 जून 1974 को संपूर्ण क्रांति दिवस की घोषणा हुई। पटना का गांधी मैदान में मंच पर जयप्रकाश नारायण हैं, रामधारी सिंह दिनकर और फणीश्वरनाथ रेणु। अध्यक्षता आचार्य राममूर्ति कर रहे हैं। सामने लाखों की भीड़, देश बदलने के सपने लहरा रहे हैं हवा में। इंदिरा गांधी के खिलाफ बिगुल बजता है और संपूर्ण क्रांति का उद्घोष होता है। संघर्ष के साथ बदलाव के सपने। यह राजनैतिक घटना लगभग 54 वर्ष पूर्व घटित हुई। तब से लेकर अब तक गंगा में बहुत- सा पानी बह चुका है। जेपी के कुछ सेनानी थक कर शर- शैय्या पर लेटे हैं। कुछ काल- कवलित हो गए। अनेक पेंशनधारी हैं। उनमें कई सक्रिय भी हैं। जिन्होंने संसदीय राजनीति को वरण किया, उनमें से कई मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री की कुर्सी की शोभा बढ़ाई। मगर संपूर्ण क्रांति ठहर ही नहीं गई, टूट गई, बिखर गई। जो लोग संसदीय राजनीति में नहीं गए, उन्होंने ज़रूर अलख जगाने की कोशिश की। मारकाट और हिंसा से जितनी भूमि आज तक निर्धनों में नहीं बाँटी गई, उससे कहीं अधिक भूमि शांतिमय वर्ग संघर्ष के द्वारा बोधगया आंदोलन के कारण वितरित हुई। संपूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले अनेक कार्यकर्ताओं ने अंतर्जातीय शादी की। पहली बार बोधगया में स्त्री के नाम पर ज़मीन आवंटित हुई। जेपी आंदोलन से उपजे लोगों ने ही भागलपुर में जलकर जमींदारी के खिलाफ आंदोलन चलाया और जलकर जमींदारी ख़त्म किया। देश के अन्य हिस्से, मसलन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उड़ीसा, असम आदि जगहों पर काम किया, लेकिन व्यवस्था की चूलें हिलाने में वे सक्षम नहीं हुए। संसदीय राजनीति में जो गये, उनमें से कई भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये और कई सांप्रदायिक राजनीति को हवा ही नहीं दी, बल्कि उसके वाहक बने। नीतीश कुमार, शरद यादव, जार्ज फर्नांडीज, रामविलास पासवान आदि ने सांप्रदायिक राजनीति से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री, मंत्री आदि की कुर्सी हथियायी , लेकिन वे उखड़ते गए और सांप्रदायिक राजनीति जमती गई। नागार्जुन ने जो कहा था, वह सच हो गया है। आपातकाल के खिलाफ हुई लड़ाई में जनसंघ के नेताओं का साथ और फिर जनता पार्टी की टूट के बाद समाजवादियों की बीजेपी के साथ हुई गलबाहियाों ने सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया। आज सांप्रदायिक राजनीति भयावह रूप लेती जा रही है। देश की वास्तविकता से मुख मोड़ कर वह जनता को भ्रमित करने में लगी है। उनकी समझ तो टुच्ची टाइप की है, लेकिन शब्दों की बाजीगरी में उन्हें दक्षता हासिल है। पैंतरेबाज़ी में उनका जोड़ा नहीं है, क्योंकि उनकी कुचाल और चरित्रहीनता की कोई सीमा नहीं है। काल एक नये रूप में हमारे सामने खड़ा है। 1974 की तुलना में ज़्यादा कठिन परिस्थिति है। आइडिया ऑफ इंडिया अब आइडिया ऑफ पाकिस्तान में बदल गया है। सत्ता में बैठे लोग विखंडनकारी है और फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद का प्रचार कर भारत को भी पाकिस्तान बना रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी कविता ‘ क़ैदी और कोकिला ‘ में लिखा था - “जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है, शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है? हिमकर निराश कर चला रात भी काली, इस समय कालिमामयी जगी क्यों आली?” अच्छी बात यह है कि युवा और जनता उनकी चाल , चरित्र और चेहरा को पहचानने लगे हैं। अंधी गली में भी अब शोर है। आसमान में काली घटाएँ हैं। संभावनाएँ अपना द्वार खोल रही हैं। ईएमएस / 13 जून 26