राष्ट्रीय
13-Jun-2026
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-महंगाई, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को लेकर युवाओं की बढ़ी चिंता -दुनिया भर में उभर रहा व्यावहारिक ‘जेन-जी समाजवाद’ नई दिल्ली,(ईएमएस)। दुनिया भर में जेनरेशन-जेड (जेन-जी) की आर्थिक और राजनीतिक सोच पारंपरिक विचारधाराओं से अलग दिशा में विकसित हो रही है। वर्ष 2000 के बाद जन्मी यह पीढ़ी न तो पारंपरिक पूंजीवाद पर पूरी तरह भरोसा करती है और न ही पुराने वामपंथी मॉडल से खुद को जोड़ना चाहती है। इसके बजाय वह ऐसी नीतियों की समर्थक बनकर उभर रही है, जो आम लोगों को महंगाई, बढ़ते किराए और जीवन-यापन की बढ़ती लागत से तत्काल राहत प्रदान कर सकें। इस तरह मनोवैज्ञनियों के लिए भी जेन-जी की सोच शोध का विषय बन गई है। विश्लेषकों के अनुसार, युवाओं के बीच उभर रही यह सोच पारंपरिक समाजवाद से भिन्न है। इसे एक व्यावहारिक और मिश्रित आर्थिक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें मुक्त बाजार और सरकारी हस्तक्षेप दोनों की भूमिका स्वीकार की जाती है। जेन-जी की प्राथमिकता वैचारिक बहसों से अधिक रोजमर्रा की आर्थिक चुनौतियों का समाधान है। इस पीढ़ी की प्रमुख मांगों में भ्रष्टाचार रोकें, आवास किराए पर नियंत्रण, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर निगरानी और आम नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना शामिल है। बढ़ती महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता के बीच युवा वर्ग सरकारों से अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा कर रहा है। तकनीकी बदलावों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने भी युवाओं की चिंताओं को बढ़ाया है। कई युवाओं को आशंका है कि स्वचालन और एआई के कारण भविष्य में रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि नौकरी सुरक्षा, कौशल विकास और रोजगार गारंटी जैसी अवधारणाओं को समर्थन मिल रहा है। आर्थिक असमानता का मुद्दा भी जेन-जी की सोच के केंद्र में है। यह वर्ग अत्यधिक संपन्न लोगों और लक्ज़री उपभोग पर अधिक कर लगाने की वकालत कर रहा है। उनका मानना है कि ऐसे करों से प्राप्त संसाधनों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। भारत में भी जेन-जी आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक दिखाई दे रही है। यह पीढ़ी केवल अधिक वेतन वाले रोजगार की तलाश तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे संस्थानों और कंपनियों को प्राथमिकता दे रही है जो सामाजिक जिम्मेदारी और सकारात्मक प्रभाव को महत्व देते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक जेन-जी भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा उपभोक्ता और प्रभावशाली कार्यबल बन सकती है। हालांकि, यह पीढ़ी पारंपरिक समाजवादी मॉडल को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। सोवियत संघ जैसे पुराने प्रयोगों की विफलताओं और सीमाओं को देखते हुए जेन-जी निजी संपत्ति और मुक्त बाजार के महत्व को मानती है। लेकिन साथ ही वह ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ और कुछ हाथों में संपत्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जेन-जी की यह नई आर्थिक सोच आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति और आर्थिक नीतियों को प्रभावित कर सकती है, जहां वैचारिक कट्टरता की बजाय व्यावहारिक समाधान और सामाजिक संतुलन को अधिक महत्व मिलेगा। हिदायत/ईएमएस 13 जून 2026