लेख
01-Mar-2024
...


विश्व में भारत देश की पहचान के रूप में एक कथन अभी तक कहा जाता रहा है ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेकता में एकता भारत की पहचान है’’। यह बात या नारा विभिन्न संस्कृति, धर्म, भाषा, वेशभूषा, रहन-सहन आदि को लेकर कही जाती रही है। परंतु अब समय आ गया है,उक्त कथन में हल्का सा संशोधन कर ‘‘अनेकता’’ की जगह ‘‘अनैतिकता में एकता’’ कर दिया जाना चाहिये। दुर्भाग्य वश यह देश की सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र व पार्टियों में ही नहीं बल्कि जीवन के समस्त क्षेत्रो में पहचान बन गई है। देश की राजनीति में ‘‘नैतिकता के पतन’’ का सबसे बड़ा और नंगा नाच (उदाहरण) वर्ष 1970-80 के दशक में हुआ था, जब विपक्ष की पूरी की पूरी सरकार ही भजनलाल के नेतृत्व में गैरकांग्रेसी से ‘‘कांग्रेसी’’ हो गई। वह जमाना था ‘‘गैर कांग्रेसवाद’’ संविद शासन के रूप में फैल रहा था। परन्तु तब कांग्रेस ने भी अपने पूरे सत्ता काल में अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करते हुए चुनी गई सरकारों को हटाकर 77 बार राष्ट्रपति शासन लागू करके कौन सी नैतिकता का परिचय दिया था? तत्समय नैतिकता की दुहाई देने वाली जनसंघ पार्टी अपना राजनीतिक सफर प्रारंभ कर जनता पार्टी से होकर आज वह विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी ‘‘भारतीय जनता पार्टी’’ के रूप में स्थापित है। ‘‘पार्टी विद द डिफरेंस’’, ‘‘सबको परखा-हमको परखो’’ का नारा देने देकर सत्ता में आते ही उसने भी वही ‘‘अनैतिकता की कैंची’’ की धार को ‘‘तेज’’ कर सरकारों को पलटाया है, जिसकी वह पहले नैतिकता का झंडा उठाकर आलोचना करती रही है। 10 साल के एनडीए के शासनकाल में 6 से अधिक सरकारें ( गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि में जनादेश नहीं मिला था, इसी अनैतिकता के धारदार औजार का उपयोग कर जनादेश के विपरीत अपनी सरकार बनाई व विपक्ष की सरकार गिराई। ऐसा नहीं है कि भाजपा ने नैतिकता के मापदंड को उच्चतम स्तर पर कभी नहीं रखा हो। वह जमाना ‘‘अटल-आडवाणी की भाजपा’’ का था। जब अटल बिहारी वाजपेई ने नैतिकता के मापदंड के उच्चतम स्तर को बनाए रखने के लिए मात्र एक वोट के खातिर अपनी सरकार की बलि दे दी थी। जबकि उसके पूर्व किस तरह से पीवी नरसिम्हा राव की अल्पमत की सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों का खुल्लम-खुल्ला खरीद फरोख्त कर कांग्रेस ने सरकार बचाई थी। प्रमोद महाजन जो उसे समय के अटल बिहारी वाजपेई के चाणक्य कहे जा सकते थे, ऐसा ही कार्य करके सरकार को बचा सकते थे। परंतु अटल बिहारी वाजपेई ने ऐसा होने नहीं दिया। यह था नैतिकता का उच्चतम मापदंड। ताजा मामला हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक घटनाक्रम का है। राजनीति शतरंज के शह-मात के खेल में अनैतिकता की शह को मात अनैतिकता ने ही दी है । हंसी तब आती है, जब पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर विधानसभा में तथाकथित रूप से बजट पारित होने के बाद ‘‘लोकतंत्र व नैतिकता की दुहाई’’ की बात करते हैं। निश्चित रूप से देश की राजनीति का यह शायद पहला उदाहरण है, जहां दोनों पक्षों ने अनैतिकता को साध्य ही नहीं बल्कि साधन भी बना लिया। परंतु प्रश्न यह है कि यहां पर अनैतिकता का खेल प्रारंभ किसने किया? विपक्षी दल भाजपा ने विधानसभा में कोई अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया था, बल्कि राज्यसभा चुनाव की वोटिंग के समय कांग्रेस के 6 विधायकों को अनैतिक रूप से तोडा, उन्हें केंद्रीय अर्ध सैनिक बल की सुरक्षा में हरियाणा में पंचकूला के सेक्टर एक पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में रखा। क्या यह नैतिक कदम था? यह कहा जा सकता है कि चुने गए, प्रतिनिधियों के बाजार की मंडी में जब कोई बिकने के लिए आया है, तो उसमें बोली लगाने अथवा खरीदने वाली की क्या गलती है? परंतु प्रश्न यह है कि मंडी में माल स्वेच्छा से स्वतः आया अथवा लाया गया? यदि वे स्वेच्छा से आए तो फिर उन्हें उन्मुक्त कर स्वतंत्र क्यों नहीं रहने दिया गया? अर्धसैनिक बल की सुरक्षा में दूसरे राज्य क्यों ले जाया गया? इसलिए जयराम ठाकुर को सरकार गिराने में असफल होने पर नैतिकता की दुहाई व लोकतंत्र की हत्या करने का कोई नैतिक अधिकार बनता नहीं है, ना बचता है। जिस अनैतिकता से सरकार गिराने का प्रयास हिमाचल प्रदेश में किया गया, कमोबेश उसी अनैतिकता का उपयोग कर सरकार बचाने का प्रयास भी सफल हुआ। विधानसभा अध्यक्ष ने जिस तरह से विपक्ष भाजपा के 15 विधायकों को निलंबित कर बजट पारित करवाया, निश्चित रूप से वह संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन और अनैतिक है। संसदीय कार्यप्रणाली में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। परन्तु अनैतिकता ही अनैतिकता पर भारी पड़ गई, ऐसा पहली बार हुआ है। क्योंकि इसके पूर्व अधिकांश मामलों में एक पक्ष को ही अनैतिकता का हथियार उपयोग करने का अवसर मिलता था, दोनों पक्षों को नहीं। झारखंड में ‘‘आपरेशन लोटस’’ असफल होने के बाद भाजपा के लिए यह दूसरा झटका है। यद्यपि वहां पर इस तरह की अनैतिकता का टेस्ट नहीं हो पाया था, क्योंकि ऐसा करने का अवसर ही उत्पन्न नहीं हो पाया था। कहा भी गया है ‘‘लोहा लोहे को काटता है’’। इसीलिए राजनीति में निश्चित सफलता के लिए आज अनैतिकता की काट नैतिकता नहीं, बड़ी अनैतिकता ही रह गई है। गांधी जी का यह सिद्धांत आज की राजनीति में पूरी तरह से खोखला हो गया है, कि ‘‘साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए’’। (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व सुधार न्यास अध्यक्ष है) ईएमएस / 01 मार्च 24