देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने करीब 12हजार से ज्यादा नौकरियों को खत्म कर काम-काजी मध्यम वर्ग को सदमें में डाल दिया है। टीसीएस ने मिड और सीनियर मैनेजमेंट स्तर पर इन नौकरियों को खत्म करने का फैसला लिया है। इससे भारत के मध्यम वर्ग को जबरदस्त झटका लगा है। यह कदम न केवल एक कंपनी के आंतरिक पुनर्गठन का संकेत है, बल्कि एआई वाले इस युग में देश की समृद्ध होती मध्यम वर्गीय आकांक्षाओं पर खतरा मंडराने की गंभीर चेतावनी भी है। भारत की आईटी इंडस्ट्री, जो कभी करोड़ों युवाओं के लिए आशा की किरण मानी जाती थी, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के दबाव में ढल रही है। जहां पहले सॉफ्टवेयर कंपनियां वैश्विक ग्राहकों को कम लागत पर सेवाएं देकर तेजी से नौकरियां पैदा कर रही थीं, वहीं अब एआई तकनीक के आगमन ने अनेक प्रक्रियाओं को स्वचालित बना दिया है। परिणामस्वरूप, उन नौकरियों की आवश्यकता घटती जा रही है जो परंपरागत व्हाइट कॉलर वर्ग का आधार रही हैं। टीसीएस के इस फैसले से कंपनी के कुल वर्कफोर्स का दो प्रतिशत प्रभावित होगा, और यह केवल शुरुआत हो सकती है। स्टाफिंग फर्म ‘टीमलीज डिजिटल’ की सीईओ नीति शर्मा ने कहा है कि मैनेजर स्तर के कर्मचारियों को हटाया जा रहा है और सीधे काम करने वाले कर्मचारियों को बनाए रखा जा रहा है। वहीं नई तकनीकों जैसे एआई, क्लाउड, और डेटा सिक्योरिटी में भर्तियां बढ़ी हैं, लेकिन जिस अनुपात में पुराने कर्मचारी हटाए जा रहे हैं, उस अनुपात में नई नौकरियां नहीं आ रहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड देश के स्किल गैप की ओर इशारा करता है। नैसकॉम के मुताबिक, 2026 तक भारत को 10 लाख एआई पेशेवरों की ज़रूरत होगी, लेकिन वर्तमान में केवल 20प्रतिशत आईटी कर्मियों के पास ही आवश्यक एआई स्किल मौजूद हैं। कंपनियां बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग और री-स्किलिंग में निवेश कर रही हैं, परंतु जिन कर्मचारियों की भूमिका पुनर्परिभाषित नहीं हो पा रही, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। इस ट्रेंड का असर न केवल कंपनियों तक सीमित रहेगा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। बीते वर्षों में आईटी सेक्टर ने एक नया मध्यम वर्ग खड़ा किया, जिसने शहरों में रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, बैंकिंग और एफएमसीजी जैसे क्षेत्रों को गति दी। परंतु जब स्थायी और आकर्षक नौकरियां ही सिकुड़ने लगेंगी, तब इस वर्ग की उपभोग शक्ति भी प्रभावित होगी, जिसका सीधा असर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। 2023-24 में ही भारत की छह प्रमुख आईटी कंपनियों में नई नियुक्तियों में 72% की गिरावट दर्ज की गई। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे आईटी हब में हजारों की संख्या में नौकरियां जा चुकी हैं। एक अनुमान के अनुसार, पिछले साल करीब 50,000 आईटी कर्मचारी अपनी नौकरियां गंवा चुके हैं। वहीं, अमेरिका में आईटी सेवाओं की मांग में गिरावट और वहां की संरक्षणवादी नीतियों ने भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व पर असर डाला है। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों और एआई अपनाने की वजह से अमेरिकी कंपनियां लागत कटौती पर जोर दे रही हैं, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं पर दबाव बढ़ा है। एआई की इस क्रांति के बीच सवाल यह है कि भारत कितनी जल्दी अपने वर्कफ़ोर्स को री-स्किल कर पाएगा। अगर इसमें देरी हुई तो लाखों आईटी पेशेवर बेरोजगारी के संकट में फंस सकते हैं और भारत की खपत आधारित अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है। मध्यम वर्ग के सपनों पर मंडराता यह खतरा केवल नौकरी जाने तक सीमित नहीं है, यह भारत के सामाजिक और आर्थिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना होगा कि भारत एआई के युग में खुद को कैसे ढालता है और अपने सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग – मध्यम वर्ग – को कैसे संभाले रखता है। ईएमएस / 03 अगस्त 25