लेख
03-Aug-2025
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किसी भी सेवक के लिए अपना राष्ट्र सर्वोपरी और सर्वप्रथम होना ही चाहिए। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होगी, लेकिन इसके नाम पर अन्य देशों को हीन और तुच्छ समझा जाना, उन्हें नीचा दिखाना उचित नहीं ठहराया जा सकता है। वहीं खुद लाभ कमाना और दूसरे को घाटे में डालना, ऐसी व्यापार-नीति अच्छी नहीं मानी जा सकती है। इसका दूरगामी परिणाम स्वयं के लिए भी घातक साबित होगा। कुछ ऐसा ही काम इन दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने फैसलों और बयानों के जरिए करते देखे जा रहे हैं। दरअसल राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी चिर-परिचित शैली में भारत सहित दुनियां के अनेक देशों पर 25 फीसद टैरिफ और रूस से व्यापार करने पर सख्त आर्थिक दंड लगाने की जो घोषणा की है, उससे एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल मच गई है। यह भी सही है कि ट्रंप अपने बयानों पर कायम नहीं रह पाते हैं, ऐसे में भरोसा भी नहीं होता कि वो कब क्या कहेंगे और कब क्या लागू करेंगे। इसलिए टैरिफ लगाने का यह फैसला जितना अचानक था, उससे कहीं अधिक राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को अस्थिर करने वाला भी साबित हो सकता है। खासकर तब जबकि दुनिया एक ओर मंदी के खतरे से जूझती नजर आ रही हो और दूसरी ओर अमेरिका खुद उच्च मुद्रास्फीति और आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा हो। इसे लेकर कनाडाई कारोबारी और टेस्टबेड के चेयरमैन किर्क लुबिमोव ने ट्रंप नीति की तीखी आलोचना भी की है। उनका मानना है कि भारत को टैरिफ और जुर्माने के जरिए निशाना बनाना अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं के खिलाफ जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा है, कि भारत आज सिर्फ एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि यह अमेरिका के लिए चीन के दबदबे को संतुलित करने की दिशा में एक संभावित साझेदार भी है। लुबिमोव की यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जबकि भारत वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के विकल्प के तौर पर तेजी से उभर रहा है। यह तो सभी जानते हैं कि चीन ने जिस तरीके से वैश्विक बाजार में अपनी पैठ बनाई है, उससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को खासा नुक्सान पहुंचा है। चीन एवं अन्य ताकतवर देशों से आर्थिक तौर पर निपटने की बजाय ट्रंप ने टैरिफ नीति लांच कर बतला दिया कि उन्हें इससे उबरना नहीं आ रहा है। इसलिए कमजोर को और कमजोर बनाने और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को कुचलने जैसे फैसले ले लिए गए हैं। वैसे अमेरिका के इस कदम से दुनियां में व्यापारनीति को लेकर भी गंभीरता से विचार-विमर्श किया जाने लगा है। नतीजे में डॉलर की जगह अन्य मुद्रा को मजबूत करने जैसी बातें भी होने लग गई हैं। ब्रिक्स ने इसकी शुरुआत भी कर दी है, जिसे लेकर ट्रंप भी चिंतित हैं, लेकिन चिंता का समाधान वो अपने सहयोगी देशों की पीठों पर कोड़े चलाकर निकालने का दुस्साहस कर रहे हैं। इससे यदि यह समझा जा रहा है कि अमेरिका अपने अंदरुनी संकट से उबर जाएगा तो यह सिरे से ही गलत है, क्योंकि समाधान वैश्विक स्तर पर ही संभव है। इसलिए टैरिफ वार रोक कर नए रास्ते खोजने होंगे। यह भी सोचने वाली बात है कि वैश्विक बाजार खत्म नहीं हो रहा है, बल्कि उसका उपयोग कौन कैसे करे इस पर विचार किया जाना चाहिए। बदलती रणनीति और वैश्विक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भारत वर्तमान में रुस से कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन चुका है। देखने वाली बात है कि यूक्रेन युद्ध से पहले यह आयात नगण्य समान था, लेकिन अब यह भारत के कुल तेल आयात का 35 फीसद से अधिक हो गया है। ऐसे में अमेरिका की यह कोशिश कि भारत रूसी तेल से दूरी बनाए, न सिर्फ अव्यावहारिक है बल्कि संप्रभुता पर भी हस्तक्षेप करने जैसा है। इसके अलावा, एक तरफ तो ट्रंप भारत को अच्छा मित्र बताते हैं वहीं दूसरी तरफ वो डेड इकोनॉमी जैसा अपमानजनक टैग भी भारत को ही दे देते हैं। ये तो वो भी जानते हैं कि जो वो कह रहे हैं वो सिर्फ नारा है जो तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यूं कहा जाए कि यह भारत-अमेरिका संबंधों में खटास बढ़ाने जैसा है, तो गलत नहीं होगा। राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान के तुरंत बाद ही भारत सरकार की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में स्पष्ट किया कि भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और जल्द ही यह अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने की ओर अग्रसर है। इसी के साथ उन्होंने यह भी बतलाया कि भारत वैश्विक जीडीपी वृद्धि में 16 फीसद तक का योगदान दे रहा है और यह “डेड इकोनॉमी” नहीं बल्कि “ग्रोथ इंजन” है। भारत के डिजिटल, वित्तीय और औद्योगिक सुधारों ने इसे वैश्विक निवेश का एक प्रमुख गंतव्य बना दिया है। यहां विचारणी यह भी है कि अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति बने ट्रंप ने सबसे पहले अपने ही पड़ोसी मुल्कों को डराने और धमकाने का काम किया था, जिसे लेकर उन्हें उसी भाषा में जवाब भी मिला। इसके बाद उनकी नीतियां बदल गईं, लेकिन सुर वही रहे, उन्होंने कार्रवाई तो नहीं की लेकिन व्यंग्य करना नहीं छोड़ा। इसलिए ट्रंप ने यह पहली दफा किया हो ऐसा नहीं है, इससे पहले भी टैरिफ और व्यापार युद्धों के जरिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश वो खूब कर चुके हैं। फिर चाहे वह चीन हो, यूरोपीय संघ हो या मेक्सिको। लेकिन इन प्रयासों का नतीजा अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई के रूप में देखने को मिलता रहा है। अमेरिकी विश्लेषकों ने भी पाया कि टैरिफ युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका की खुद की अर्थव्यवस्था को होता है, क्योंकि इससे आयात महंगा होता है, रोजगार पर असर पड़ता है और वैश्विक बाजारों में अमेरिकी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा घटती है। कीमतों के बढ़ने के साथ ही वस्तु की मांग घट जाती है और इसका वैश्विक बाजार पर खासा असर होता है। इससे आखिर अमेरिका अछूता कैसे रह सकता है। कुल मिलाकर यह टैरिफ वार ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति का हिस्सा तो कतई नहीं हो सकता है, क्योंकि इससे लाभ की जगह नुक्सान ज्यादा होने वाला है। वैसे भी दुनियां जब एक गांव में तब्दील हो चुकी हो तब ऐसे वैश्विक साझेदारी के युग में पुराने जमाने की नीति कैसे सफल हो सकती है? भारत जैसे महान लोकतांत्रिक, विशाल और उभरते बाजार को आंख दिखाना अमेरिका के लिए दीर्घकालिक कूटनीतिक और आर्थिक आत्मघात जैसा हो सकता है। इस नीति से भले ही ट्रंप ने चुनावी जनसमर्थन हासिल कर लिया हो, लेकिन यह अमेरिका को विश्व मंच पर एक गैर-विश्वसनीय और एकपक्षीय शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है। दूसरी ओर भारत, अपनी आर्थिक प्रगति और वैश्विक संबंधों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण के जरिए एक स्थिर और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। अंतत: ट्रंप को समझना होगा कि मौजदूा सदी में दुनियां भू-राजनीति टैरिफ और धमकियों से नहीं, बल्कि आापसी साझेदारी और समझ से संचालित होती है, वर्ना यह टैरिफ वार उन्हीं पर भारी पड़ सकता है। ईएमएस / 03 अगस्त 25