हवा और पानी में फैल रहा प्रदूषण अब मां के दूध में भी जहर बन कर उतर रहा है। सृष्टि की शुरुआत से यह माना जाता है कि माँ का दूध नवजात बच्चों के लिए अमृत समान है, क्योंकि इसमें प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, जो उन्हें संक्रमण के प्रभाव से बचाता है। जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि चिकित्सकों की राय के अनुसार नवजात मां का दूध शिशु के जीवन को न सिर्फ पहली ढाल होता है, बल्कि रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है। साथ ही मस्तिष्क का विकास में सहयोगी और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की प्राकृतिक शक्ति प्रदान करता है। लेकिन सोचिए, अगर वही दूध किसी जहर के साथ मिलकर बच्चे तक पहुंचे, तो कितना खतरनाक हो सकता है। यह विचार ही किसी भी माता-पिता या समाज को हिलाने के लिए काफी है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन ने पूरे देश को चौंका दिया है, जिससे पता चलता है कि माँ का दूध ही बच्चे के लिए जहर बनता जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार बिहार में स्तन दूध के नमूनों में यूरेनियम की मौजूदगी पायी गयी है। इस अध्ययन ने देशभर में चिंता की लहर पैदा कर दी है। पटना स्थित महावीर कैंसर संस्थान द्वारा की गई एक रिसर्च में बिहार की महिलाओं के स्तन दूध में यूरेनियम पाया जितना गंभीर है, उतनी ही चिंताजनक भी, क्योंकि यह सीधे-सीधे नवजात बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। यह अध्ययन अक्टूबर 2021 से जुलाई 2024 के बीच बेगूसराय, भोजपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार और नालंदा जिलों में 17 से 35 वर्ष की 40 महिलाओं पर किया गया। जांच में पाया गया कि सभी नमूनों में यूरेनियम (यू-238) मौजूद था। यह मात्रा ० से 5.25 जी/एल के बीच दर्ज की गई। ब्रिटिश जर्नल साइंटिफिक रिपोर्टस में प्रकाशित इस शोध में कहा गया कि ब्रेस्ट मिल्क के नमूनों में 5 पीपीवी (प्रति अरब भाग) तक यूरेनियम पाया गया। यूरेनियम एक रेडियोधर्मी तत्व है, जो लंबे समय तक शरीर में रहने पर किडनी, हड्डियों, और कोशिकाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। स्टडी में स्पष्ट किया कि इस स्तर का तत्काल प्रभाव कम हो सकता है, परंतु शिशु यूरेनियम के एक्सपोजर के प्रति वयस्कों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं। उनके शरीर में डिटॉक्सिफिकेशन क्षमता सीमित होती है, जिससे कोई भी रेडियोधर्मी तत्य अधिक तेजी से नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि इस रिसर्च में बताया गया है कि 40 माताओं के दूध में यूरेनियम मिला, लेकिन ज्यादातर मामलों में इसका स्तर अनुमेय सीमा से नीचे था। लगभग 70 प्रतिशत शिशुओं में संभावित गैर-कार्सिनोजेनिक जोखिम देखा गया, पर इसका वास्तविक स्वास्थ्य प्रभाव कम होने की संभावना है। इसके बावजूद, यह तथ्य कि सभी महिलाओं के दूध में यूरेनियम मौजूद है, अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है। परमाणु वैज्ञानिक और एनडीएमए के सदस्य डॉ. दिनेश के. असवाल का कहना है कि इसमें डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पाया गया स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से छह गुना कम है। डब्ल्यूएचओ पीने के पानी में यूरेनियम की सुरक्षित सीमा 30 पीपीबी तक मानता है, जबकि बिहार के नमूनों में सिर्फ 5 पीपीबी पाया गया। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि स्तनपान कराने वाली माताओं के शरीर में गया अधिकांश यूरेनियम मूत्र के जरिए बाहर निकल जाता है, और स्तन के दूध में इसकी मात्रा बहुत कम होती है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह नहीं कि स्तर सुरक्षित सीमा से कम है या ज्यादा। असली चिंता यह है कि आखिर महिलाओं के दूध में यूरेनियम पहुंच क्यों रहा है? यह संकेत है कि भूजल में यूरेनियम की उपस्थिति लगातार चढ़ रही है। शोध में बताया गया है कि भारत के लगभग 151 जिलों और 18 राज्यों में भूजल यूरेनियम प्रदूषण पाया जा चुका है। यह आंकड़ा सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिशु अपने शरीर से यूरेनियम को तुरंत बाहर नहीं निकाल पाते, इसलिए वे अपनी माताओं की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं। उनका शरीर विकसित हो रहा होता है और किसी भी रेडियोधर्मी तत्व का असर उन पर अधिक तेजी से पड़ सकता है। शोध में कहा गया है कि किसी-किसी जगह में स्तन दूध के माध्यम से शिशुओं को यूरेनियम का संपर्क खतरनाक स्तर पर है और यह उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकता है। बच्चों पर यूरेनियम का असर सबसे खतरनाक इसलिए भी होता है, क्योंकि उनके शरीर में हेवी मेटल्स को बाहर निकालने की क्षमता बेहद कम होती है। इसके कारण किडनी का विकास प्रभावित हो सकता है, न्यूरोलॉजिकल विकास रुक सकता है, आईक्यू कम हो सकता है और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। यह सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीड़ियों की बौद्धिक क्षमता और राष्ट्रीय विकास से जुड़ा सवाल है। इस स्थिति पर सरकार और समाज दोनों को गंभीरतापूर्वक सोचना होगा। अगर भूजल में भारी धातुओं और रेडियोधर्मी पदार्थों का स्तर बढ़ रहा है, तो इसका असर सिर्फ दूध पर नहीं, बल्कि पेयजल, फसलों और पूरे खाद्य चक्र पर भी पड़ेगा। आपको बता दें कि यह केवल चिकित्सा का मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरण, विज्ञान और प्रशासन का संयुक्त सवाल है। यह भी जरूरी है कि इस मुद्दे को माताओं के दोष के रूप में पेश न किया जाए। महिलाएं इस संकट की वजह नहीं, बल्कि इसकी पीड़ित हैं। स्तनपान बंद करने या डर पैदा करने से समस्या हल नहीं होगी। असली समाधान भूजल की गुणवत्ता सुधारने, जलस्रोतों के परीक्षण को मजबूत करने और प्रदूषण के स्रोतों का पता लगाने से होगा। सरकार को चाहिए कि तत्काल उन इलाकों में पानी की जांच शुरू कराए जहां से नमूने लिए, गए थे। पानी शुद्धिकरण की योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को माताओं और बच्चों की नियमित जांच करानी चाहिए। साथ ही, वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को मिलकर यह समझना होगा कि भूजल में यूरेनियम आखिर क्यों बढ़ रहा है, क्या यह प्राकृतिक कारण हैं, औद्योगिक प्रदूषण है, या किसी और बजह से मिट्टी और पानी में बदलाव हो रहा है? इस समस्या को हल्के में लेना भविष्य की पीढ़ी के साथ अन्याय होगा। यह सिर्फ एक शोध नहीं, बल्कि चेतावनी है कि हमारा पर्यावरण धीरे-धीरे प्रदूषण के ऐसे स्तर तक पहुंच रहा है जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। बच्चों का स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसलिए सरकारों को तुरंत कदम उठाने होंगे। स्तनपान आज भी शिशु के लिए सबसे अच्छा आहार है और इसे किसी भी स्थिति में बंद नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही, यह भी जरूरी है कि महिलाएं जिस वातावरण में रहती हैं, यह सुरक्षित हो। पानी, हवा और मिट्टी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित रखना किसी भी समाज का सबसे बड़ा कर्तव्य है। देखा जाए तो यह अध्ययन देश के स्वास्थ्य ढांचे को आईना दिखाता है। यह बताता है कि पर्यावरण संकट सबसे पहले और सबसे ज्यादा बच्चों को प्रभाक्ति करता है। आज अगर बिहार के 40 नमूनों में यूरेनियम पाया गया है, तो कल यह संख्या बढ़ सकती है। यह समय है कि सरकारें, वैज्ञानिक संस्थान, और समाज मिलकर इस समस्या की जड़ तक जाएं। भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा के लिए आज सख्त कदम उठाएं। शिशुओं के लिए यह खबर किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। डॉक्टर बताते हैं कि नवजातों के अंग विकास के चरण में होते हैं, जिससे वे विषैली धातुओं को बड़ों के मुकाबले अधिक तेजी से अवशोषित करते हैं। शरीर का वजन कम होने के कारण उन पर जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। ब्रेस्ट मिल्क के जरिए शरीर में जाने वाला यूरेनियम बच्चों की किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है, न्यूरोलॉजिकल (दिमागी) दिक्कतें पैदा कर सकता है और आगे चलकर कैंसर का बड़ा कारण बन सकता है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका, कनाडा और चीन जैसे देशों के भूजल में यूरेनियम मिलने की खबरें आती रही हैं, लेकिन बिहार में इसका ब्रेस्ट मिल्क में पाया जाना समस्या को एक नए और गंभीर स्तर पर ले जाता है। हालांकि, इन चौंकाने वाले नतीजों के बावजूद शोधकर्ताओं ने माताओं को सलाह दी है कि वे स्तनपान कराना बंद न करें, क्योंकि मां का दूध शिशुओं के लिए पोषण का सबसे सर्वोत्तम स्रोत है, लेकिन सरकार को इसके स्रोतों का पता लगाकर जल्द रोकथाम करनी होगी। ताकि माँ का दूध अमृत बना रहे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 27 नवम्बर 25